क्यों रद्द हुआ 'गौ-माता एग्जाम', कैसे विवादों में घिरी यह परीक्षा?

कामधेनु आयोग करवाने वाला था गौ विज्ञान आधारित परीक्षा.

कामधेनु आयोग करवाने वाला था गौ विज्ञान आधारित परीक्षा.

विदेशी गाय की तुलना में भारतीय गाय इमोशनल होती है; कूबड़ में अद्भुत शक्तियां होती हैं; दूध में सोने के कण होते हैं... ऐसे तथ्यों के आधार पर 'गौ-विज्ञान' परीक्षा होनी थी. क्या है यह परीक्षा, क्यों होने वाली थी, क्या विवाद हुआ, अब क्या होगा?

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 24, 2021, 1:25 PM IST
  • Share this:
देश भर के छात्र किताबें खंगालकर गाय के बारे में जितना हो सके, पढ़ लेने की जुगत में थे. और वो भी सौ या हज़ार नहीं, लाखों स्टूडेंट्स. क्यों? केंद्र सरकार (Government of India) के राष्ट्रीय कामधेनु आयोग (RKE) की वेबसाइट के मुताबिक 'कामधेनु गौ-विज्ञान प्रचार-प्रसार परीक्षा' 25 फरवरी को आयोजित की जाना थी, जिसके लिए 5 लाख लोगों ने रजिस्टर (Cow Exam Registration) भी कर लिया था. लेकिन 21 फरवरी को होने वाले मॉक टेस्ट से ऐन पहले आयोग ने इस परीक्षा को स्थगित कर देने की बात कही और अगली तारीख भी नहीं बताई, तो सवाल और चर्चाएं शुरू हो गईं.

जिस गौ-विज्ञान परीक्षा को लेकर काफी प्रचार-प्रसार किया गया, उसे ऐन वक्त पर रद्द किए जाने से पहले विज्ञान और शिक्षा से जुड़े कई संगठनों व व्यक्तियों ने इसका विरोध किया था क्योंकि उनके हिसाब से दिए गए तथ्य अवैज्ञानिक थे. इस विरोध ने तूल पकड़ा और कहा जा रहा है कि यही परीक्षा टाले जाने का बड़ा कारण है.

ये भी पढ़ें : Toolkit Case : कोर्ट ने क्यों दी अभिव्यक्ति-असहमति को दिशा? 10 अहम वजहें



क्यों टली गौ-माता परीक्षा?
21 फरवरी 2019 को नरेंद्र मोदी सरकार ने राष्ट्रीय कामधेनु आयोग जब बनाया था, तो कहा गया था कि यह संस्था गाय के संरक्षण और वंश विकास के लिए काम करेगी. पेशे से सर्जन और भाजपा से जुड़े रहे वल्लभभाई कथीरिया को इसका प्रमुख बनाया गया और सुनील मानसिंह का व हुकुमचंद सावला भी इस आयोग में दो साल के लिए नियुक्त किए गए. इस साल 20 फरवरी को इनका कार्यकाल खत्म हो गया.

cow science exam, essay on cow, cow essay, cow breed, scientific facts of cow, गाय विज्ञान परीक्षा, गाय पर निबंध, गाय का निबंध, गाय की नस्ल
कामधेनु आयोग की वेबसाइट पर गौ विज्ञान परीक्षा की अगली तारीख नहीं बताई गई.


औपचारिक तौर पर कहा गया कि कार्यकाल खत्म होने के कारण परीक्षा रोक दी गई और अब नया पैनल या बोर्ड जो आएगा, वही परीक्षा के बारे में फैसला लेगा. लेकिन, परीक्षा की तारीख तो पहले से तय थी और कार्यकाल की भी इसलिए लोगों को बात पच नहीं रही. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में आयोग के सदस्य सावला के हवाले से कहा गया कि केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह से जब आयोग ने परीक्षा करवाने की गुज़ारिश की तो उनका जवाब था 'हम नहीं कर पाएंगे'.

क्या है विवादों में घिरी परीक्षा?
आयोग की मानें तो गौ-वंश के संवर्धन और उससे जुड़े वैज्ञानिक तथ्यों के बारे में जागरूकता लाने के लिए यह परीक्षा करवाई जा रही थी, जिसके लिए प्रतियोगियों को प्रमाण पत्र दिए जाने थे. बताया गया कि इस परीक्षा के लिए भारत ही नहीं, विदेशों से भी रजिस्ट्रेशन हुआ. यही नहीं, यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन ने तमाम यूनिवर्सिटियों से कहा कि वो स्टूडेंट्स को इस परीक्षा के लिए प्रोत्साहित करें. लेकिन इस परीक्षा के लिए जो 54 पेज का रिफरेंस मटेरियल जारी किया गया, उसने विवादों को जन्म दिया.

ये भी पढ़ें : जयललिता बतौर एक्ट्रेस ज़्यादा कामयाब रहीं या बतौर पॉलिटिशियन?

क्या है विवाद की जड़?
खबरों के मुताबिक रिफरेंस मटेरियल में गाय से जुड़े विज्ञान के बारे में कई चैप्टरों में तथ्य बताए गए हैं, इनमें से जिन्हें लेकर बहस और विवाद खड़े हुए, उन पर एक नज़र डालिए :

1. भारतीय गाय यानी कूबड़ वाली ज़ेबू गाय गर्मी, सूखे को सह सकती है, कई रोगों के खिलाफ प्रतिरोध रखती है, हालांकि दूध कम देती है.
2. गाय के कूबड़ में सोलर पल्स होता है जिससे वह विटामिन डी सोखती है, जो उसके दूध में पाया जाता है. बगैर कूबड़ वाली जर्सी गाय में यह गुण नहीं होता.
3. विदेशी गायें आलसी होती हैं, जबकि देसी गाय ज़्यादा इमोशनल, अलर्ट और मज़बूत होती है.
4. दूध कम देने के बावजूद गाय उपयोगी है क्योंकि इसका गोबर और मूत्र कीमती है. भोपाल गैस ट्रैजडी में वो लोग बचे जो गोबर या मूत्र का सेवन करते थे. गाय के गोबर में एंटी रेडिएशन गुण होते हैं.
5. गौ-वंश की हत्या और भूकंप के बीच वैज्ञानिक लिंक है.
6. गौ-मांस खाने वाले नेता के समय में भारत बीफ का लीडिंग एक्सपोर्टर बना.

cow science exam, essay on cow, cow essay, cow breed, scientific facts of cow, गाय विज्ञान परीक्षा, गाय पर निबंध, गाय का निबंध, गाय की नस्ल
कामधेनु आयोग पहले भी गाय से जुड़े फैक्ट्स को लेकर विवादों को हवा देता रहा है.


गौ-विज्ञान परीक्षा की तैयारी के लिए आयोग ने इस तरह के और भी कई तथ्य प्रोवाइड करवाए थे, जिन्हें लेकर ​वैज्ञानिकों व अन्य विशेषज्ञों ने आपत्तियां उठाईं और आयोग पर दबाव बना कि ऐसी कोई परीक्षा न करवाई जाए, जिसे लेकर भ्रांतियां फैलें.

विशेषज्ञों ने क्या कहा?
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट की मानें तो आलोचक कह रहे हैं कि यह सिर्फ सत्ताधारी पार्टी और उसकी विचारधारा से मेल खाते संगठनों की विचारधारा को शिक्षा में थोपने की कवायद है, जो वैज्ञानिक नज़रिये पर आधारित नहीं है. शैक्षणिक समूह इंडिया नॉलेज एंड साइंस सोसायटी की कोमल श्रीवास्तव ने कहा 'अगर हम बच्चों को गाय के बारे में पढ़ाना चाहते हैं, तो वैज्ञानिक तथ्य दें, मनगढ़ंत या पौराणिक नहीं.'

ये भी पढ़ें:- कौन हैं मटुआ, क्यों यह समुदाय बंगाल चुनाव में वोटबैंक राजनीति का केंद्र है?

आयोग के पुरीश कुमार के हवाले से कहा गया कि किसी को इस परीक्षा के लिए बाध्य नहीं किया गया और परीक्षा सिर्फ गाय की उपयोगिता के बारे में शिक्षा देने के मकसद से की जा रही थी. जबकि क्रिटिक्स के हवाले से रिपोर्ट कहती है कि आयोग की इस परीक्षा को लेकर यह बात फैलाई गई कि इस परीक्षा का सर्टिफिकेट भविष्य में स्टूडेंट के करियर में फायदा देगा, साथ ही टॉप स्कोर करने वालों को पुरस्कार राशि भी मिलेगी.

cow science exam, essay on cow, cow essay, cow breed, scientific facts of cow, गाय विज्ञान परीक्षा, गाय पर निबंध, गाय का निबंध, गाय की नस्ल
विशेषज्ञों ने गाय पर आयोग द्वारा जारी फैक्ट्स की आलोचना की.


इसी तरह, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल थ्योरी की प्रोफेसर निवेदिता मेनन ने कहा कि इस तरह की परीक्षा के ज़रिये सरकार की कोशिश यही रही कि 'रिसर्च और तार्किक सोच को पूरी तरह मिटा' दिया जाए.

क्या घबरा गया सिस्टम?
रिफरेंस मैटेरियल के आधार पर परीक्षा को लेकर जब विरोध तेज़ हुआ तो राष्ट्रीय कामधेनु आयोग ने अपनी वेबसाइट से यह मैटेरियल हटा दिया. इसके कुछ ही समय बाद अचानक कथीरिया के आयोग से हटने परीक्षा टलने की खबरों ने सबको चौंका दिया. मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से एक्सप्रेस की रिपोर्ट कहती है कि केंद्र सरकार में कई लोग कथीरिया से खुश नहीं थे और मान रहे थे कि यह 'छद्मविज्ञान' को बढ़ावा देने का कदम था.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज