पाकिस्तान में क्यों नहीं हो पाए थे आजादी के 23 साल बाद तक आम चुनाव

पाकिस्तान ने 23 मार्च 1956 को अपना संविधान तैयार किया इस्लामिक रिपब्लिक बना. यह तय हुआ कि साल 1959 में पाकिस्तान में पहले आम चुनाव कराए जाएंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

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Updated: April 12, 2019, 10:48 AM IST
पाकिस्तान में क्यों नहीं हो पाए थे आजादी के 23 साल बाद तक आम चुनाव
प्रतीकात्मक तस्वीर
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Updated: April 12, 2019, 10:48 AM IST
हिन्दुस्तान से अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ने के दौरान हिन्दुस्तानियों ने आपसी भरोसा खो दिया. धार्मिकता के आधार पर मुहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान बनाने पर अमादा हुए. उन्होंने भारत से एक दिन पहले ही 14 अगस्त, 1947 को आजाद पाकिस्तान अपने हाथ में ले लिया. लेकिन उनके पास ना तो ऐसे नेता थे, ना कोई ऐसी व्यवस्‍था जो एक देश में लोकतंत्र की स्‍थापना और उसकी सुरक्षा कर पाए.

जिन्ना 11 सितंबर 1948 को दुनिया को अलविदा कह गए. तब पाकिस्तान में संविधान का बीज भी नहीं पड़ा था. पाकिस्तान ने 23 मार्च 1956 को अपना संविधान तैयार किया और इस्लामिक रिपब्लिक बना. यह तय हुआ कि साल 1959 में पाकिस्तान में पहले आम चुनाव कराए जाएंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. 7 अक्टूबर 1958 को पाकिस्तानी राष्ट्राध्यक्ष इस्कंदर मिर्जा ने मार्शल लॉ लगा दिया. इसके तहत पाकिस्तानी आर्मी के चीफ को देश के शासन व्यवस्‍था की जिम्मेवारी मिल गई और जनरल अयूब खान देश के सबसे ताकतवर इंसान बन गए.

पाकिस्तान का सबसे ताकतवर आदमी बनते ही पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल अयूब खान ने देश को चुनाव की तरफ ले जाने के बजाए खुद को फील्ड मार्शल नियुक्त कर मुहम्मद मूसा खान को नया सेनाध्यक्ष बना दिया. यह सिलसिला यहीं नहीं रुका, अयूब खान ने 17 फरवरी 1960 को खुद को पाकिस्तान का नया राष्ट्रपति घोषित कर लिया. साथ ही मुहम्मद शाहबुद्दीन को पाकिस्तान का चीफ जस्टिस बनाकर पूरे देश की राजनीति को अपने इर्द-गिर्द घूमने पर मजबूर कर दिया.

इतना ही नहीं जब देश में उनके खिलाफ आवाजें उठनी शुरू हुई तो अयूब खान ने 1 मार्च 1962 को देश में एक नया संविधान पेश कर दिया. इसके तहत देश में संसदीय व्यवस्‍था के बजाए राष्ट्रपति व्यवस्‍था लागू कर दी गई. इसमें राष्ट्रपति का चुनाव तो होता लेकिन जनता के द्वारा नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष वोटिंग के जरिए. इसे आप कमोबेश भारत में राष्ट्रपति चुनाव से जोड़कर देख सकते हैं.

इसके बाद अयूब खान पाकिस्तान में शासनकाल साल 1970 तक चला. इस बीच जिसने भी अयूब खान खिलाफ आवाज़ उठाने की कोशिश की जसे अयूब खान ने शांत कर दिया. लेकिन साल 1967-68 आते आते पाकिस्तान में सरकार विरोधी यानी अयूब खान विरोधी ताकतें आवाज़ उठाने लगीं. इनमे सबसे सशक्त आवाज़ अवामी लीग के नेता मुजबिर खान की थी. इसके बाद अयूब खान के ही विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने अपने पद से इस्तीफा देकर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी बना ली.

आखिरकार साल 1970 में अयूब खान को देश में आम चुनाव कराने पड़े. तब पाकिस्तान में कुल 300 संसदीय सीटों के लिए चुनाव कराए गए. इसमें अयूब खान की विरोधी पार्टी अवामी लीग ने एकतरफा जीत हासिल की. पाकिस्तान के पहले चुनाव में अवामी लीग को कुल 160 सीटें मिलीं.

1970 तक भारत में चार आम चुनाव हो चुके थे और अगले साल भारत फिर से लोकतंत्र के इस पर्व को मनाने जा रहा था. हालांकि इस समय के पांच सालों के अंदर इंदिरा गांधी भारतीय लोकतंत्र पर आपातकाल का धब्बा लगाने वाली थीं लेकिन तब तक भारत के साथ ही आजाद हुए पाकिस्तान ने लोकतंत्र का स्वाद तक नहीं चखा था.
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