एक रिसर्च चाय को बताती है खराब तो दूसरी इसे फायदेमंद... आखिर ऐसा क्यों?

रेस्तरां के तौर चायवाला की शुरुआत 2015 में हुई थी. तब से लेकर अब तक उसके ब्रिटेन में 15 स्टोर हैं, उसकी योजना 2020 तक इसे बढ़ाकर 45 करने की है.
रेस्तरां के तौर चायवाला की शुरुआत 2015 में हुई थी. तब से लेकर अब तक उसके ब्रिटेन में 15 स्टोर हैं, उसकी योजना 2020 तक इसे बढ़ाकर 45 करने की है.

सारे रिसर्च पर भरोसा नहीं करना चाहिए. फिर भी आप इन वेबसाइट पर छपे रिसर्च के जरिए अपनी सेहत और खान-पान का रख सकते हैं ख्याल.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 19, 2018, 1:26 PM IST
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अक्सर आप अख़बारों में चाय-कॉफी और चॉकलेट से जुड़ी नई-नई स्टडीज के बारे में पढ़ते होंगे. कुछ रिसर्च ऐसी होती हैं, जिनमें चाय-कॉफी और चॉकलेट आदि के स्वास्थ्य पर बुरे असर के बारे में चेताया जाता है. कहा जाता है कि चाय में निकोटिन होता है. जिसके चलते चाय आपके स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकती है. वहीं कुछ ही दिनों बाद आप अख़बारों में कोई रिसर्च पढ़ते हैं जिसकी हेडलाइन होती है, 'रिसर्च में सामने आया चाय से होते हैं अनेकों फायदे.' आप कंफ्यूज हो जाते हैं कि आखिर ऐसे में आप किसे सही मानें? ऐसा कैसे हो जाता है कि चार दिन में ही रिसर्चर ठीक उल्टे रिजल्ट स्टडी से निकाल लेते हैं. यहां हम रिसर्च में ऐसे रिजल्ट के कारणों के बारे में बात कर रहे हैं -

ऐसे रिसर्च पर कंपनियों के हित साधने का होता है दबाव
दरअसल आजकल बाजार के हाथों में दुनिया घूम रही है. और ऐसे में अक्सर यह देखा जाता है कि किसी खाने वाले प्रोडक्ट को बनाने वाली कंपनी अक्सर उसके बारे में रिसर्च कराती है. चूंकि रिसर्च उसके प्रोडक्ट के लिए किया जा रहा होता है और उसे करने में कंपनी का पैसा लग रहा होता है तो कंपनी चाहती है कि उसे मनमुताबिक रिसर्च का रिजल्ट मिले. वह अपने रिसर्चर को भी यह बात बता देती है. अब रिसर्चर के जिम्मे होता है कि कैसे वह लोगों को यह यकीन दिला सके कि जिस कंपनी ने उसे काम दिया है वह किसी साधारण प्रॉडक्ट की शक्ल में आपको अमृत बेच रही है. इसे अंग्रेजी में 'कंफ्लिक्ट ऑफ इंट्रेस्ट' का मसला कहते हैं.

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मनमुताबिक रिजल्ट के लिए कैसे इकट्ठे किए जाते हैं सैंपल


ऐसे में रिसर्चर उसके हिसाब से ही रिसर्च के लिए सैंपल इकट्ठा करते हैं. जैसे चाय पर रिसर्च करना है तो अक्सर वे ठंडी जगहों के लोगों को लेकर रैंडम सैंपल सर्वे कर लेंगे. जाहिर है ऐसे में ज्यादातर सर्द जगहों के लोग चाय की तारीफ ही करते हैं.

रिजल्ट को पेश करते हुए भी होता है खेल
जैसे कि कई बार कंपनियां कोई रिजल्ट केवल 10 लोगों पर करें यानी सैंपल साइज मात्र 10 लोगों का हो जिसमें से 7 लोग पॉजिटिव रिजल्ट दे दें. तो इसे यूं पेश किया जाता है कि इस प्रॉडक्ट को दूसरे प्रॉडक्ट के मुकाबले 70 परसेंट लोगों ने पसंद किया.

दुनिया भर पर नहीं लागू होते ऐसे रिजल्ट
जब कोई रिजल्ट दुनिया के किसी खास हिस्से में साबित हुआ हो तो ऐसा नहीं कि सारी दुनिया पर वह उसी तरह से लागू होगा. इसलिए ऐसा दावा करना भी ठीक नहीं होता. लेकिन रिसर्चर फिर भी ऐसे दावे करते हैं. अगर उन्हें साबित करना है कि उनका रिसर्च दुनिया भर पर लागू होता है तो ऐसे में दुनिया के उन हिस्सों में भी वह एक्सपेरिमेंट या स्टडी फिर से की जानी चाहिए.

ऐसे में आप भी रहें सावधान और सीधे इंटरनेट पर कभी भी न करें बीमारियों के बारे में सर्च
आप जब भी सीधे गूगल पर अपनी बीमारी के बारे में सर्च करेंगे तो वह आपको हर बीमारी कैंसर के पहले के लक्षण बताएगा. छोटी सी फुंसी से लेकर बुखार तक सबको. ऐसे में सीधे बीमारियों के बारे में इंटरनेट पर खोजने के बजाए विशेषज्ञों से कंसल्ट करना उचित होता है.

लेकिन ऐसा न सोचें कि तो फिर इंटरनेट का क्या फायदा?
इंटरनेट पर कई ऐसे प्लेटफॉर्म हैं जिनपर जाकर आप अपनी बीमारी के बारे में जान सकते हैं. इनमें से सबसे ज्यादा विश्वसनीय हैं The Lancet, NCIB और Pub Med. इन पर आपकी हर बीमारी और उसके लक्षणों और इलाजों से जुड़े रिसर्च आपको मिल जायेंगे. इन्हें पढ़ने में आपको थोड़ी मेहनत तो करनी पड़ेगी लेकिन यहां पर पढ़ी चीजें आपको गुमराह नहीं करेंगीं. यहां आपको ऑथेंटिंक रिसर्च मिलेंगे.

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