पूर्णिमा पर चंद्रग्रहण के वक्त क्यों लाल दिखता है चंद्रमा?

कुछ शताब्दियों पहले तक लोग मानते थे कि चांद को एक दानव ने निगल लिया है, जिसके चलते चांद का रंग लाल पड़ गया है. लेकिन ये भी जानें कि चंद्रमा के रंग के बारे में वैज्ञानिक आधार क्या हैं.

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Updated: July 16, 2019, 8:34 AM IST
पूर्णिमा पर चंद्रग्रहण के वक्त क्यों लाल दिखता है चंद्रमा?
पूर्ण चंद्रग्रहण के वक्त चंद्रमा लाल रंग का दिखाई देने लगता है
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Updated: July 16, 2019, 8:34 AM IST
साल का दूसरा चंद्र ग्रहण 16 जुलाई 2019 मंगलवार को लगने वाला है. ये चंद्र ग्रहण भारत में भी देखा जा सकेगा. अषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष को चंद्र ग्रहण के दिन ही गुरु पूर्णिमा और कर्क संक्रांति भी है, जिसके चलते इस दिन का महत्व बढ़ना बताया जा रहा है. ऐसे में चंद्रग्रहण संबंधी एक रोचक पहलू जानें. यूं तो हमें कई बार चांद अलग अलग रंगों में दिखता है. लेकिन तब चांद बिल्कुल लाल हो जाता है तब उसका आकर्षण ही अलग होता है. चांद केवल पूर्ण चंद्रग्रहण के वक्त यानि पूर्णिमा को ही लाल हो सकता है. लेकिन इसके पीछे क्या कारण है, हम यहां यही बता रहे हैं.

यूं तो चांद के अलग-अलग रंगों के पीछे मुख्य कारण खुद धरती का वातावरण होता है. क्योंकि सूर्य का जो प्रकाश चंद्रमा से परावर्तित होकर धरती पर आता है, धरती के वातावरण में मौजूद हवा और कणों से परावर्तित होकर उसका रंग बदल जाता है. या यूं कहें कि उसका रंग हमारी आंखों के लिए बदल जाता है, क्योंकि कई सारे रंगों को धरती का वातावरण सोख लेता है.

धरती के वातावरण में भी बड़ा रोल इसके वातावरण में उपस्थित प्रदूषण का होता है. बाकि अलग-अलग मौसम के दौरान धरती की अपेक्षा चांद की स्थिति आदि का इसपर बहुत प्रभाव पड़ता है. इससे हमें धरती पर चांद अलग-अलग रंगों का दिखता है.

वैसे चांद जब धरती के क्षितिज पर होता है (उगते और डूबते हुए) तो धरती का मोटा वातावरण खुद को पार करके आने वाला प्रकाश की नीली-हरी और बैंगनी प्रकाश किरणों को सोख लेता है. बहुत ही वैज्ञानिक ढंग से कहें तो बैंगनी, हरे आदि रंग की तरंगदैर्ध्य कम होने के चलते वे धरती के वातावरण को पार नहीं कर पाते, वहीं लाल रंग की तरंगें, ज्यादा तरंगदैर्ध्य के कारण धरती के इस वातावरण को पार कर जाती हैं और हम तक लाल-पीले रंग की रौशनी पहुंचती है इसलिए धरती से चांद पीला और लाल दिखाई देता है.

लेकिन चांद बड़ा और लाल कब दिखता है?
धरती सूर्य के चक्कर लगाती है और चांद धरती के चक्कर लगाता है. ऐसे में कई बार ऐसा होता है कि धरती और चांद के बीच में पृथ्वी आ जाती है. ऐसी हालत में पृथ्वी की परछाई चांद पर पड़ने लगती है, और चांद के जितने हिस्से पर पृथ्वी की परछाई पड़ रही होती है, उतने हिस्से का चांद हमें नहीं दिखता है.

लेकिन जब चांद धरती की परछाई के ठीक बीच में होता है तो धरती के चारों तरफ से परावर्तित होने (छिटकने) वाली रौशनी भी उसी वक्त चांद पर पड़ती है. ऐसे में एक ओर जहां चांद पर टेढ़ी रौशनी जा रही होती है, तो वहीं दूसरी ओर चांद पर धरती की परछाई भी पड़ रही होती है. ऐसे में चांद से निकलने वाली हल्की रौशनी में शामिल नीले, हरे और बैंगनी रंग की प्रकाश किरणें धरती के वातावरण को पार करके धरती तक पहुंच ही नहीं पाती हैं और हमें दिखाई देता है एक बड़ा सा लाल चांद.
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लाल इसलिए क्योंकि रौशनी और परछाई का खेल चल रहा होता है. बड़ा इसलिए क्योंकि चांद उस वक्त धरती के सबसे पास होता है.

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First published: July 16, 2019, 7:51 AM IST
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