खरगोश खाते हैं अपनी ही पॉटी, जानिए इसके पीछे की अजीब वजह

खरगोश अधिकतर घास खाकर ही अपना जीवन बिताते हैं. इसीलिए उनके शरीर से बहुत से जरूरी न्यूट्रिएंट्स बिना पचे ही बाहर निकल जाते हैं इसीलिए खरगोश उसे खाकर एकबार फिर से अधिक से अधिक पोषक तत्व पचाते हैं.

News18Hindi
Updated: March 16, 2019, 1:39 PM IST
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Updated: March 16, 2019, 1:39 PM IST
ये दुनिया अलग-अलग किस्म की विचित्र बातों और कहानियों से भरी है. क्या आप कभी सोच भी सकते हैं कि पॉटी यानी मल जिसका नाम पब्लिक में लेने से लोग झिझकते हैं, कोई उसे खा सकता है! वो भी अपनी ही पॉटी! लेकिन ये बात 100 फीसदी सही है और इसके पीछे विज्ञान छुपा हुआ है. दुनिया में एक ऐसा जानवर है जो दिखने में बहुत प्यारा होता है, लेकिन खुद की ही पॉटी खाता है. ये जानवर है खरगोश और उसके द्वारा अपनी ही पॉटी खाने की इस प्रक्रिया का नाम है,'ऑटोकॉर्पोफेजी'.

खरगोश क्यों खाते हैं अपनी पॉटी:

अपनी ही पॉटी खाना खरगोशों के बेहतर स्वास्थ्य केलिए एक जरूरी प्रक्रिया है. दरअसल खरगोश एक ऐसा जीव है जिसका पाचन तंत्र बहुत अधिक विकसित नहीं होता. खरगोश अधिकतर घास खाकर ही अपना जीवन बिताते हैं. इसीलिए उनके शरीर से बहुत से जरूरी न्यूट्रिएंट्स बिना पचे ही बाहर निकल जाते हैं इसीलिए खरगोश उसे खाकर एकबार फिर से अधिक से अधिक पोषक तत्व पचाते हैं. ये बिलकुल वैसा ही है जैसे गाय और भैंस जैसे अधिकतर चौपाया जानवर अपने पचे हुए भोजन को मुंह में वापस लाकर उसे फिर से पचाते हैं.

इस प्रक्रिया के पीछे का विज्ञान:

खरगोश की पॉटी दो किस्म की होती है. एक लिक्विड के रूप में और दूसरी टैबलेट जैसी. पहली टाइप की पॉटी को सीकोट्रोप कहा जाता है. यह पोषक तत्वों से भरपूर होती है जो द्रव्य रूप से शरीर से बाहर निकल जाती है. इसी को ख़रगोश खा लेते हैं और इसे पूरी तरह से पचा कर टैबलेट के रूप में पॉटी करते हैं. सीकोट्रोप यानी इस द्रव्य पॉटी में टैबलेट वाली पॉटी की तुलना में दोगुने पोषक तत्व होते हैं. इनमें बहुत अधिक मात्रा में विटामिन के और विटामिन बी 12 होता है. अगर खरगोश द्रव्य पॉटी को नहीं खाएंगे तो उनके शरीर से अधिकतर पोषकतत्व बिना पचे ही निकल जाएंगे.

खरगोश शाकाहारी जानवर होते हैं जो सिर्फ घास, सब्जियां ही खाते हैं. उनके शरीर के लिए फाइबर बहुत जरूरी है. उनका पाचन तंत्र रात में तेजी से काम करते हुए बहुत से भोजन को बिना पचाए ही बाहर निकाल देता है. इसीलिए वो अक्सर ये द्रव्य पॉटी रात को ही करते हैं और उसी समय इसे खा लेते हैं. इसके बाद वो उसे पूरी तरह से पचाकर बाहर निकलते हैं. इस टैबलेट के आकार की पॉटी को वो नहीं खाते.

जैसा कि हमनें ऊपर बताया, यह प्रक्रिया बहुत हद तक बड़े चौपाया जानवरों की जुगाली जैसी ही है. गाय भैंस अपना भोजन खाने के बाद एक बाद फिर उसे अपने गले में लेकर आते हैं और पूरी तरह से पचाते हैं. यहां पर बैक्टीरिया द्वारा उनके भोजन के फाइबर को पचाया जाता है. इससे उन्हें अपने भोजन से अधिक से अधिक पोषक तत्व मिल पाते हैं.
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सिर्फ खरगोश ही नहीं, और जानवर भी हैं:

लेकिन जानवरों की दुनिया में सिर्फ खरगोश ही ऐसा जीव नहीं है जो अपनी पॉटी खाता है. गिनी पिग, छोटे चूहों और ऐसे ही मिलते-जुलते शाकाहारी जानवरों में यह प्रवृत्ति पायी जाती है वैसे दूसरों की पॉटी खाने वाले जीव भी हमारे पर्यावरण के लिए बहुत फायदेमंद हैं. छोटे बैक्टीरिया से लेकर सुअर जैसे बड़े जीव भी दूसरों की पॉटी खाकर वातावरण साफ रखने में मदद करते हैं.

इंसानों में भी दिखती है ये प्रवृत्ति लेकिन...

लेकिन अपनी ही पॉटी खाने की प्रवृत्ति अगर इंसानों में दिख जाए तो ये मानसिक बीमारी को दर्शाती है. स्किज़ोफ्रेनिआ और अन्य मानसिक बीमारियों के मरीजों में यह प्रवृत्ति दिखती है तो उसका सही समय पर इलाज करवाना बहुत जरूरी है.
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