हजारों किलोमीटर दूर से कुम्भ में गंगा स्नान के लिए आते हैं ये पक्षी

इनका सफर इतना आसान नहीं होता. रास्ते में बहुत सी मुश्किलें आती हैं. आंधी, तूफान और तेज हवाओं से कई पक्षी अपनी जान से भी हाथ धो बैठते हैं. लेकिन फिर भी हर साल भयानक ठंड से भागते हुए वो भारत की ओर रुख करते हैं.

Moulshree Kullkarni | News18Hindi
Updated: February 8, 2019, 6:29 PM IST
हजारों किलोमीटर दूर से कुम्भ में गंगा स्नान के लिए आते हैं ये पक्षी
हजारों किलोमीटर दूर से क्यों भारत आते हैं ये पक्षी
Moulshree Kullkarni | News18Hindi
Updated: February 8, 2019, 6:29 PM IST
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में इन दिनों कुम्भ मेला चल रहा है. इस कुम्भ मेले में पूरी दुनिया से लोग संगम में डुबकी लगाने आए हैं. इस ठंड में भी अपनी आस्था के चलते लोग सुबह-सुबह ठंडे पानी में डुबकी लगाते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस मेले में सिर्फ इंसान ही नहीं, एक खास किस्म के पक्षी भी आते हैं? ये पक्षी विदेशी मेहमान हैं जो हजारों किलोमीटर से हर साल भारत आते हैं. प्रयागराज में हर 12 साल में कुम्भ मेला लगता है लेकिन हर साल भी यहां गंगा, जमुना के संगम पर माघ का मेला लगता है. ये सफेद पक्षी हर साल दिसंबर से मार्च के बीच संगम के किनारे नजर आते हैं.

हर साल कहां से आ जाते हैं पक्षी:

ये पक्षी रूस के साइबेरिया इलाके से आते हैं. इन्हें साइबेरियन पक्षी कहते हैं. ये आपको हजारों की संख्या में यहां नजर आ जाएंगे. ये ऐसे पक्षी हैं जो हवा में उड़ते हैं और पानी में भी तैरते हैं. सफेद रंग के इन पक्षियों की चोंच और पैर नारंगी रंग के होते हैं. साइबेरिया बहुत ही ठंडी जगह है जहां नवंबर से लेकर मार्च तक तापमान जीरो से बहुत 50, 60 डिग्री नीचे चला जाता है. इस तापमान में इन पक्षियों का जिंदा रह पाना बहुत मुश्किल हो जाता है. इसीलिए ये पक्षी हजारों किलोमीटर की दूरी करके भारत आते हैं. उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में साइबेरिया की तुलना में बहुत कम ठंड पड़ती है और यहां संगम का खुला छोर इन पक्षियों के जीवित रहने के लिए अच्छा माहौल तैयार करता है.



इतनी दूर से क्यों आते हैं ये पक्षी:

जीवों में माइग्रेशन यानी प्रवास एक बहुत आम प्रक्रिया है. एक ही प्रजाति के जीवों में मौसम की वजह से बहुत बड़ी संख्या में एकसाथ दूसरे स्थान पर चले जाने की प्रक्रिया को माइग्रेशन कहते हैं. यह माइग्रेशन अक्सर एक तय तरीके से बार-बार हर साल किया जाता है. यानी जैसे ही मौसम खराब हुआ, ये जीव अपना घर छोड़कर किसी दूसरी जगह चले गए और मौसम ठीक होते ही वापस अपने घर आ जाते हैं. साइबेरियन पक्षियों के अलावा भी इसके बहुत से उदाहरण हैं. अधिकतर यही होता है कि जिन इलाकों में बहुत अधिक ठंड पड़ती है, वहां के जीव दूसरी जगह बेहतर भोजन, प्रजनन और सुरक्षा के लिए चले जाते हैं.

कितना लम्बा सफर तय करते हैं:

साइबेरियन पक्षियों की सैकड़ों ऐसी प्रजातियां हैं जो हर साल अपना घर छोड़कर दुनियाभर में पनाह पाती हैं. भारत आने के लिए ये पक्षी 4000 किलोमीटर से भी ज्यादा लम्बा सफ़र उड़कर पूरा करते हैं. ये पक्षी ताजिकिस्तान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान को पार करते हुए भारत आते हैं. इतना लम्बा सफ़र ये 10,20 के समूह में नहीं लाखों के ग्रुप में उड़ते हुए पूरा करते हैं. भारत में भी इनका एक लैंडिंग स्थान है. ये पक्षी सबसे पहले महाराष्ट्र के बारामती पहुंचते हैं. यानी अगर सफ़र में कोई पक्षी बाकियों से अलग भी हो गया तो उसे पता है कि उसके साथी उसे बारामती में स्थित
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'बिग बर्ड सेंचुअरी' में मिलेंगे. यहां इकठ्ठा होकर ये पक्षी भारत के कोने-कोने में जाते हैं और पूरी ठंड यहीं बिताते हैं.

कैसे करते हैं भारत आने की तैयारी:

माइग्रेशन करने से करीब दो महीने पहले से ही ये पक्षी इसकी तैयारी करना शुरू कर देते हैं. जैसे ही गर्मियां ख़त्म होती हैं और दिन छोटे होने लगते हैं, इन पक्षियों के दिमाग के फोटोरिसेप्टर इनके शरीर में हॉर्मोन में बदलाव करने लगते हैं. हॉर्मोन में इन बदलावों से उनके शरीर पर पंख बढ़ जाते हैं जो लंबे समय तक उड़ने के लिए जरूरी हैं. इसके साथ ही ये पक्षी अपने शरीर पर फैट इकठ्ठा करने के लिए ख़ूब खाते हैं और वजन बढ़ाते हैं. बॉडी फैट बढ़ जाने से इन्हें लंबे सफर में गर्माहट मिलती है और भोजन की भी कमी नहीं खलती. इस तरह करीब 2 महीनों की तैयारी के बाद ये पक्षी लाखों की संख्या में इकट्ठे उड़ान भरते हैं.

लेकिन इनका सफर इतना आसान नहीं होता. रास्ते में बहुत सी मुश्किलें आती हैं. आंधी, तूफान और तेज हवाओं से कई पक्षी अपनी जान से भी हाथ धो बैठते हैं. लेकिन फिर भी हर साल भयानक ठंड से भागते हुए वो भारत की ओर रुख करते हैं.

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