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इसलिये रेलवे विंडो पर लगती है लंबी लाइन और जल्दी नहीं मिल पाते टिकट!

आखिर इस तकनीकी में ऐसा क्या है कि रेलवे इसका मोह नहीं छोड़ पा रहा है?

आखिर इस तकनीकी में ऐसा क्या है कि रेलवे इसका मोह नहीं छोड़ पा रहा है?

आखिर इस तकनीकी में ऐसा क्या है कि रेलवे इसका मोह नहीं छोड़ पा रहा है?

    भारत में 1832 में पहले-पहल रेल अंग्रेजों की बदौलत चली थी. इसे रेल को ऑर्थर कॉटन ने बनाया था. ये इमारतें बनाने के लिए ग्रेनाइट ले जाने वाली मालगाड़ी थी. मद्रास के पास चलती थी, रेड हिल से चिंताद्रिपेट के बीच. लेकिन भारत की पहली पैसेंजर ट्रे चली 21 साल बाद. ठीक-ठीक तारीख थी 16 अप्रैल, 1853. मात्र 24 किमी चली इस ट्रेन में 400 लोग थे. 14 डिब्बों की यह ट्रेन बोरी बंदर (मुंबई) से थाणे के बीच चली थी. औक इसे तीन इंजन खींच रहे थे, जिनके नाम थे, साहिब, सिंध और सुल्तान. ट्रेन में सफर करने वाले समझ चुके थे कि इस देश में संचार और यातायात क्रांति हो चुकी है लेकिन ये शायद ही किसी ने सोचा था कि कभी 100 से भी ज्यादा किमी की रफ्तार से दौड़ती भारत की रेलें कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश के हर शहर को माला के मनकों की तरह गूंथ देंगीं.

    हालांकि पहली ट्रेन चलने के बाद डेढ़ शताब्दी तक भारतीय रेलवे की शक्ल धीरे-धीरे बदली. लेकिन पिछले तीन दशकों में विज्ञान - तकनीकी की प्रगति के साथ इसमें ऐसा बदलाव आया है कि आप अगर आज पलटकर उस दौर की ट्रेनों को देखेंगे तो आप सकते में आ जायेंगे. ठीक तीस साल पहले, 1988 में देश में पहली शताब्दी ट्रेन चली थी. जो देश की सबसे तेज चलने वाली ट्रेनों में से एक थी. और दिल्ली से झांसी के बीच चलती थी. जिसे बाद में भोपाल तक बढ़ा दिया गया. दो साल बाद 1990 में  नई दिल्ली में पहली 'सेल्फ टिकट प्रिंटिंग मशीन' लगी.

    आज ट्रेन जैसी दिखती है, वैसी 1993 में बनी थी
    1993 में पहली बार एसी के तीनों अलग-अलग तरह के कोच और स्लीपर कोच भारतीय रेलों में लगे. इससे पहले भारत में रेल के केवल दो तरह के डिब्बे हुआ करते थे, फर्स्ट क्लास और सेकेंड क्लास. अब फर्स्ट क्लास में फर्स्ट एसी, सेकेंड एसी, थर्ड एसी और स्लीपर और सेकेंड क्लास में जनरल डिब्बे होने लगे. इसके बाद सितंबर, 1996 में कम्प्यूटरीकृत रिजर्वेशन की शुरुआत नई दिल्ली, मुंबई और चेन्नई के बीच कर दी गई. फरवरी, 2000 में भारतीय रेलवे की वेबसाइट बनी. 3 अगस्त, 2002 से रेलवे ने ऑनलाइन ट्रेन टिकट और रिजर्वेशन शुरू किया. आज भारतीय रेलवे 17 जोन में बंटा हुआ है. रेलवे नई से नई तकनीकी हर तकनीकी को भारतीय रेलवे में लाने को उत्साहित है. फिर भी आज वह कुछ पुरानी तकनीकों पर कई मामलों में निर्भर है.

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    1832 में मद्रास के पास चली चली भारत की पहली ट्रेन.


    हम जानते हैं भारतीय रेलवे दुनिया का सबसे बड़ा रेलवे है और लगातार दुनिया के बेहतरीन रेलवे में अपना नाम दर्ज कराने का प्रयास कर रहा है. ऐसे में रेलवे हर चीज को अपडेट करने में लगा है. टिकट बुकिंग से कोच तक और ट्रैकिंग सिस्टम से टाइमिंग तक में नई-नई चीजें जोड़ी जा रही हैं. लेकिन ऐसी भी तकनीकें हैं जिन्हें रेलवे बदलना नहीं चाहता. और ऐसी ही एक तकनीक है भारतीय रेलवे का टिकट बुकिंग प्रिंटर. रेलवे में रिजर्वेशन बुकिंग की शुरुआत से अभी तक रेलवे टिकट प्रिंटिंग के लिये 'डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर' का ही इस्तेमाल किया जा रहा है. आखिर ऐसा क्या खास है डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर में कि मार्केट में अच्छे से अच्छे और तेज प्रिंटर होने के बावजूद रेलवे खड़खड़ाहट वाला और प्रिंटिंग में सबसे देर करने वाला प्रिंटर यूज करता है?

    डॉट मैट्रिक्स ही एक के साथ तीन फ्री दे सकता है
    डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर एक ही वक्त में एक मेन कॉपी और तीन कार्बन कॉपी प्रिंट कर देता है. टिकट बुकिंग के वक्त इतनी ही कॉपी की जरूरत होती है. इन चार में से एक मेन कॉपी होती है. जिसे हेड ऑफिस भेज दिया जाता है. बाकी तीन कॉर्बन कॉपियों में से पहली प्लेटफॉर्म पर लगाई जाती है. दूसरी टिकट चेकर को दी जाती है और तीसरी कॉपी ट्रेन पर लगाई जाती है. इस तरह से सबसे कम खर्चे में प्रिंटिंग हो जाती है. साथ ही जो कागज इस छपाई में प्रयोग होता है, बहुत सस्ता होता है. वह रील में आता है. यही वजह है कि चाहे टिकट हो या टिकट की लिस्ट दोनों के ही कागज में दोनों ओर छेद होते हैं.

    सस्ता भी, सबसे अच्छा भी
    डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर बहुत ही सस्ता होता है. इसमें प्रयोग की जाने वाली स्याही भी सस्ती होती है. इसे भी इसके अनेक फायदों में से एक माना जाता है. साथ ही एक बार सर्विसिंग के बाद कई दिनों तक चलता रहता है. जबर होता है. इसकी खटखटाहट सुनिए, समझ जायेंगे कि हैवी ड्यूटी मैटेरियल है. आसानी से नहीं खराब होगा. उठा के पटक दीजिये तो बात अलग. ऊपर से कुछ बिगड़ जाये तो कम पैसे में मरम्मत हो जाती है. इसलिये मेंटिनेंस कॉस्ट भी लो है. तो बस छापते जाओ, छापते जाओ, छापते जाओ. रोज लाखों लोग भारतीय रेलवे में सफर करते हैं ऐसे में किसी और प्रिंटर का सहारा लें तो रोज बेचारे प्रिंटर बीमार पड़े रहेंगे.

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    एक डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर. तस्वीर साभार : यूट्यूब


    जैसा चाहेंगे वैसा छाप देगा ये प्रिंटर
    डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर से प्रिंटिंग के लिए पेपर के साइज की कोई लिमिटेशन नहीं होती. टिकट खिड़की पर टिकट बुक कराते समय आपने झांककर देखा होगा तो जरूर जानते होंगे कि चाहे बड़ी वाली लिस्ट छप रही हो, या छोटा सा जनरल का टिकट, दोनों एक ही प्रिंटर यानि डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर से छपते हैं. माने चाहे वो लोकल टिकट हो, इंटर स्टेट टिकट हो या ऑफिशियल डॉक्यूमेंट्स सभी को डॉट मैट्रिक्स एक साथ प्रिंट कर सकता है. माने इसका वर्किंग स्टाइल है, वर्सेटाइल. वैसे अब इसे छापते देखने के चक्कर में टिकट देने वाले से डांट मत खा जाइयेगा.

    रेलवे के सॉफ्टवेयर से इसकी अच्छी बनती है
    रेलवे आज भी टिकट और टिकट लिस्ट छापने के लिए एमएस डॉस सॉफ्टवेयर का प्रयोग करता है. माने दोनों की बैकवर्ड कांपैटिबिलिटी फिट बैठती है. वैसे डॉट मैट्रिक्स नये सॉफ्टवेयर के साथ भी जोड़ी बना लेता है. और इसमें पेपर को आसानी से लगाया जा सकता है. फिर जैसा चाहो वैसा पेपर लगा लो. ऊपर से छापते हुये भी दिखता है कि क्या छाप रहा है? इतने फायदों वाला प्रिंटर केवल आउटडेटेड होने के चलते रेलवे कैसे छोड़ सकता था. आखिर पर्सनल रिलेशन भी कोई चीज होती है कि नहीं? हां, लेकिन इससे यात्रियों को टिकट विंडो पर कुछ और सेकेंड ज्यादा खड़े रहना पड़ता है.

    यह भी पढ़ें : रेलवे का करोड़ों यात्रियों को नया तोहफा, अब और आसान हुआ ट्रेन का सफर

    Tags: Indian railway, Indian Railway Catering and Tourism Corporation, Mumbai, Rail tickets, Railway, Thane

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