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सुभाषचंद्र बोस को लेकर क्यों लगाए जाते हैं जवाहरलाल नेहरू पर आरोप?

कई बार यह आरोप लगाया जाता है कि नेहरू सुभाष की मौत के बारे में कई राज जानते थे जिनका खुलासा उन्होंने नहीं किया

कई बार यह आरोप लगाया जाता है कि नेहरू सुभाष की मौत के बारे में कई राज जानते थे जिनका खुलासा उन्होंने नहीं किया

बोस और नेहरू के रिश्तों, मतभेदों और बनते-बिगड़ते रिश्तों को पारिभाषित करना असमंजस भरा है.

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    हाल के दिनों में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की चर्चाएं लगातार हुई हैं. कुछ दिनों पहले वरिष्ठ बीजेपी सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा कि नेताजी की मौत हवाई दुर्घटना में नहीं, बल्कि साइबेरिया की जेल में हुई थी. उन्होंने ये भी दावा किया कि नेताजी के साइबेरिया की जेल में होने की जानकारी नेहरू को थी. हाल ही में नेताजी के परिजनों ने ये आरोप भी लगाया कि नेहरू तब उनके परिवार पर नजर रखने के लिए लगातार उनकी जासूसी कराते थे.

    बोस और नेहरू के रिश्तों, मतभेदों और बनते-बिगड़ते रिश्तों को पारिभाषित करना कम असमंजस भरा नहीं है. नेहरू और बोस शुरुआती दौर में अच्छे दोस्त थे. शुरुआत में वह नेहरू को मित्र, शुभचिंतक और बड़ा भाई मानते थे. बाद में दूरियां इतनी बढ़ीं कि उन्हें लिखना पड़ा, जितना नेहरू ने उन्हें नुकसान पहुंचाया, उतना शायद ही किसी ने किया हो.

    पहले दोनों में थे बेहद गहरे संबंध
    वर्ष 1936 के दौरान दोनों यूरोप में थे. बोस वहां निर्वासित जीवन बिता रहे थे तो नेहरू अपनी बीमार पत्नी कमला का जिनेवा में इलाज करा रहे थे. कमला का निधन हुआ तो सुभाष तुरंत मदद के लिए पहुंचे. अंतिम संस्कार की व्यवस्था की. उदास नेहरू को ढांढस बंधाया. दोनों में एक अपनापा बढ़ा. वैसे उस वक्त तक दोनों के राजनीतिक विचारों में भी काफी समानता थी.

    हालांकि बाद में नेहरू जितने गांधी जी के करीब आए, बोस से दूर होते गए. हवाई दुर्घटना में बोस की मौत की ख़बर आई, लेकिन कई लोगों ने आशंका जताई कि वे हवाई दुर्घटना में नहीं मरे थे. वो चोरी-छिपे रूस पहुंच गए थे. आरोप लगाने वाले यह भी कहते हैं कि यह बात जवाहरलाल नेहरू को मालूम थी. खोसला आयोग के समक्ष 31 दिसंबर 1961 को श्याम लाल जैन के बयान में यह बात कही गई.

    आमतौर पर लोगों ने धारणा बना ली है कि नेहरू जी को मालूम था कि वह कहां हैं, लेकिन उन्होंने घोषित तौर पर इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा.

    सुभाष को लेकर नेहरू पर यह आरोप भी लगाए जाते हैं
    चर्चाएं ये भी रहीं कि विजयलक्ष्मी पण्डित जब 1948 के आसपास सोवियत संघ से लौटीं तो उन्होंने शांताक्रूज हवाई अड्डे पर घोषणा की कि वह भारतवासियों के लिए एक अच्छी खबर लाई हैं, लेकिन नेहरू के दबाव में आकर उन्होंने जिंदगी भर अपनी जबान नहीं खोली.

    कहा तो ये भी जाता है कि उनकी मुलाकात वहां सुभाष से हुई थी. अगर चर्चाओं को मानें तो नेताजी की बाद में कई जगह मौजूदगी की बात की गई. मसलन- वह 1960 तक तिब्बत में एकनाथलाता के रूप में रहे! 1960 से 1970 तक शारदानन्द के रूप में पश्चिम बंगाल में शौलमारी आश्रम में रहे! 1964 में नेहरू जी की मत्यु के बाद उनके शव के साथ देखे गए. वह गुमनामी बाबा के रूप में फैजाबाद में 1985 तक रहे!

    जवाहरलाल नेहरू ने 13 मई, 1962 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बड़े बाई सुरेशचन्द्र बोस को पत्र क्रमांक-604, पी.एम. / 62 में लिखा था कि हमारे पास सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु का कोई प्रमाण नहीं है. आज की तारीख में भी ज्यादातर लोगों को लगता है कि बोस के बारे में नेहरू को बहुत कुछ पता था, लेकिन वो नहीं चाहते थे कि इस बात पर से पर्दा उठे.

    यह भी पढ़े: 11 बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित जवाहरलाल नेहरू की जिंदगी से जुड़े किस्से

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