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Why Electricity Crisis In India: जरूरतें पूरी करने में क्यों विफल साबित हुए परमाणु रिएक्टर?

कुल जरूरत का केवल 3.3 फीसदी परमाणु बिजली पैदा करता है भारत.

कुल जरूरत का केवल 3.3 फीसदी परमाणु बिजली पैदा करता है भारत.

Why Electricity Crisis In India: देश में पिछले कुछ दिनों से संभावित बिजली संकट को लेकर हाहाकार मचा हुआ है. कोयले की आपूर्ति में कमी और बिजली की मांग बढ़ने की वजह से देश की जरूरत के हिसाब बिजली का उत्पादन नहीं हो पा रहा है.

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    Why Electricity Crisis In India: देश में पिछले कुछ दिनों से संभावित बिजली संकट को लेकर हाहाकार मचा हुआ है. कोयले की आपूर्ति में कमी और बिजली की मांग बढ़ने की वजह से देश की जरूरत के हिसाब से बिजली का उत्पादन नहीं हो पा रहा है. खैर, आज हम कोयले की समस्या पर बात नहीं कर रहे हैं. सीधे मुद्दे पर आते हैं. आखिर क्या कारण है कि तमाम प्रयासों के बावजूद भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों में परमाणु बिजली की हिस्सेदारी बढ़ाने में विफल रहा है.

    दरअसल, वर्ष 2005 में भारत और अमेरिका के बीच जब ऐतिहासिक परमाणु समझौता हुआ था तो उस समय कहा गया था कि यह भारत की भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाला सबसे अहम कदम है.

    आप इस समझौते के महत्व को इसी से समझ सकते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस समझौते के लिए अपनी सरकार को दांव पर लगा दिया था. इस समझौते के विरोध में वाम दलों ने सरकार से अपना समर्थन खींच लिया था और इस कारण मनमोहन सरकार को अविश्वास मत का भी सामना करना पड़ा था.

    घट गई परमाणु बिजली की हिस्सेदारी
    इस अहम समझौते को हुए आज डेढ़ दशक से अधिक समय हो चुके हैं, लेकिन भारत के कुल ऊर्जा उत्पादन में परमाणु बिजली की हिस्सेदारी करीब-करीब स्थिर है. एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2001 में भारत के कुल बिजली उत्पादन में परमाणु बिजली की हिस्सेदारी 3.7 फीसदी थी वहीं वह आज घटकर केवल 3.3 फीसदी रह गई है.

    वहीं कुछ विकसित देशों जैसे फ्रांस में परमाणु बिजली की हिस्सेदारी 70.6 फीसदी और यूक्रेन में परमाणु बिजली की हिस्सेदारी 51.2 फीसदी है.

    ये हैं दुनिया के शीर्ष परमाणु बिजली पैदा करने वाले देश
    अपनी बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए परमाणु बिजली का इस्तेमाल करने वाले देशों में सबसे ऊपर फ्रांस है. फ्रांस अपनी जरूरत की 70.6 फीसदी बिजली परमाणु संयंत्रों में पैदा करता है. इसके बाद दूसरे नंबर यूक्रेन है जो 51.2 फीसदी जरूरतें पूरी करता है.

    तीसरे नंबर पर कोरिया (29.6 फीसदी), चौथे नंबर पर रूस (20.6 फीसदी) और पांचवे नंबर पर अमेरिका (19.7 फीसदी) है. कनाडा (14.6 फीसदी), इंग्लैंड (14.5 फीसदी), जापान (5.1 फीसदी), चीन (4.9 फीसदी) और भारत (3.3 फीसदी) परमाणु बिजली पैदा करते हैं.

    अमेरिका में जहां 93 परमाणु रिएक्टर हैं वहीं भारत के पास 23 परमाणु रिएक्टर हैं. दक्षिण कोरिया के पास 24 परमाणु रिएक्ट हैं, जिससे वह 23.2 गीगावाट बिजली पैदा करता है. वहीं भारत 23 परमाणु रिएक्टरों से 6.9 गीगावाट बिजली पैदा करता है. वैसे, भारत का लक्ष्य इन रिएक्टरों से 2031 तक 22.48 गीगावाट बिजली पैदा करने का है.

    भारत में 388.1 गीगावाट की क्षमता
    भारत के पास अभी तक कुल 388.1 गीगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता है. इसमें से 234 गीगावाट का उत्पादन थर्मल प्लांटों से होता है. बाकी के 154 गीगावाट में से 85 फीसदी का उत्पादन सोलर, पवन और पानी से होता है. इस तरह परमाणु बिजली की हिस्सेदारी काफी कम है.

    वैसे परमाणु बिजली की लागत करीब-करीब कोयले से पैदा बिजली जितनी ही है. लेकिन सौर और पवन बिजली की लागत में पिछले कुछ वर्षों में भारी कमी आई है. इसके साथ ही परमाणु बिजली के साथ सुरक्षा संबंधी चिंता एक बेहद गंभीर विषय रहा है. इस कारण भारत सहित दुनिया में इस पर से फोकस कम हुआ है.

    क्या कम हो गया परमाणु बिजली उत्पादन पर फोकस?
    इसी साल 3 फरवरी को संसद में एक सवाल के जवाब में प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा था कि परमाणु बिजली स्वच्छ और पर्यावरण अनुकूल बिजली का स्रोत है. इसमें व्यापक क्षमता है. इससे लंबे समय तक भारत की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी.

    लेकिन जितेंद्र प्रसाद के जवाब के बावजूद ऐसा देखा जा रहा है कि बीते एक दशक में परमाणु बिजली का उत्पादन अपेक्षित तेजी से नहीं बढ़ा है. दूसरी तरफ बीते कुछ सालों में देश ने पवन और सौर ऊर्जा में शानदार प्रगति की है. ऐसे में एक बार फिर यह बहस छिड़ गई है कि भारत के लिए कौन सी ऊर्जा बेहतर है.

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