Explained: क्या है Fake News, क्यों आग की तेजी से फैलती है?

भ्रामक खबरों की खासियत ये होती है कि ये एकदम झूठ होने के बाद भी सच लगती हैं-सांकेतिक फोटो (pixabay)

मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) की एक स्टडी के मुताबिक ट्विटर पर झूठी खबरें लगभग 70% तेजी से फैलती (fake news travels faster than true news) हैं. वहीं सही खबरों को लगभग 15 सौ लोगों तक पहुंचने में फेक खबर से 6 गुना ज्यादा वक्त लगता है.

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    गाजियाबाद में एक बुजुर्ग के साथ मारपीट के मामले में फेक न्यूज (Ghaziabad attack on elderly fake news) फैलाने के आरोप में उत्तर प्रदेश पुलिस कई लोगों के खिलाफ एफआईआर (FIR) कर चुकी है. दरअसल फेक न्यूज फैलाने के आरोपियों ने कहा था बुजुर्ग को एक खास धार्मिक समुदाय का नारा लगाने को कहा गया. अब फेक न्यूज के जरिए धार्मिक भावनाएं भड़काने के मामले में आरोपियों पर कार्रवाई हो सकती है, लेकिन सवाल ये है कि फेक न्यूज आखिर क्या है और क्यों इसपर कानूनी सख्ती की जरूरत महसूस होती रही.

    क्या है फेक न्यूज
    जैसा कि नाम से ही साफ है, फेक न्यूज, किसी व्यक्ति, संस्था, क्षेत्र, धर्म या भाषा-बोली की इमेज को नुकसान पहुंचाने की कोशिश है. इसके तहत किसी खबर में झूठी बातें कही या लिखीं जाती है. जरूरी नहीं कि ये खबर किसी अखबार या टीवी में आए. आजकल सोशल मीडिया के जरिए फेक न्यूज खूब फैलाई जा रही हैं.

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    किस तरह से फैलती है
    भ्रामक खबरों की खासियत ये होती है कि ये एकदम झूठ होने के बाद भी सच लगती हैं. कई बार इसमें गलत डाटा और बयान भी होते हैं. कई बार बड़े राजनेताओं के बयान ऐसे तोड़-मरोड़कर पेश होते हैं कि उनका मतलब बदल जाता है. ये भी फेक न्यूज की श्रेणी में आता है. इस तरह की झूठी खबरें राजनीति के अलावा जीवन से जुड़े हर मामले में दिखती हैं. मिसाल के तौर पर वैक्सीन को ही लें तो कई सारे टीकों के बारे में कहा गया कि उनसे नपुंसकता आ जाती है या फिर दूसरी समस्याएं होती हैं.

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    फेक न्यूज का कंटेट ही इस तरह से बुना जाता है कि वो आग की तरह फैले- सांकेतिक फोटो (flickr)


    साल 2010 में फेक न्यूज की चर्चा शुरू हुई
    तब अमेरिकी चुनाव के दौरान फेक न्यूज फैलाने की तुलना मास हिस्टीरिया से हुई. यानी किसी खबर को पढ़कर या सुनकर बहुत सारे लोगों में घबराहट का फैल जाना. फेक न्यूज के कारण कोई व्यक्ति, संस्था या किसी मजहब के लोगों के खिलाफ किसी दूसरे तबके में गुस्सा फैल जाता है. कई बार फेक न्यूज इस हद तक चली जाती हैं कि इससे दंगे भड़कने तक की नौबत आ जाती है.

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    तेजी से फैलती हैं झूठी खबरें 
    फेक न्यूज, आम और सच्चाई पर आधारित खबरों की बजाए ज्यादा तेजी से फैलती हैं. इसपर कई शोध भी हो चुके हैं. मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) ने एक रिसर्च में पाया कि फेक न्यूज का कंटेट ही इस तरह से बुना जाता है कि वो आग की तरह फैले. ये जानकारी MIT की ही वेबसाइट पर आ चुकी है.

    रिसर्च में क्या निकल कर आया?
    झूठी खबर सोशल मीडिया पर असली की तुलना में तेज, व्यापक और अधिक तीव्रता से बढती है. इसके अलावा मजेदार बात ये है कि झूठी खबरों का प्रवाह नकली प्रोफाइल से नहीं बढ़ाया जाता. वास्तव में, लोग झूठी खबरों को ही सच्ची समझकर अधिक शेयर करते हैं. अध्ययन से पता चला कि ट्विटर पर वास्तविक समाचार की तुलना में झूठी खबरें 70 फीसदी अधिक शेयर होने की आशंका रहती है.

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    आजकल सोशल मीडिया के जरिए फेक न्यूज खूब फैलाई जा रही हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)


    क्या झूठी खबर और फेक खबर एक ही बात है ?
    'फेक न्यूज' शब्द को छोड़कर शोध के लेखकों ने 'सच्ची या झूठी खबर का उपयोग ठीक समझा है. हालांकि, "फेक न्यूज" जानबूझ कर फैलाई गई गलत या झूठी खबर के लिए इस्तेमाल होता है. हमें नहीं मालूम होता कि कौन, किस खबर को, किसलिए फैला रहा है इसलिए उसे फेक न्यूज के बजाए शोध में सच्ची या झूठी खबर कहा गया.

    शोध में किस तरह की खबरों का अध्ययन किया गया?
    इसमें लगभग 1.26 लाख स्टोरीज हैं, जो 2006 से 2017 के बीच 45 लाख बार करीब 30 लाख लोगों द्वारा ट्वीट की गईं. ये स्टोरीज, जो अनुसंधान पर केंद्रित है, उन्हें छह स्वतंत्र उन वेबसाइटों ने सत्यापित किया, जो तथ्यों की जांच-पड़ताल करती हैं.

    झूठी खबर अधिक वायरल क्यों होती है ?
    शोधकर्ताओं का कहना है कि लोग सोशल मीडिया पर नई जानकारी को अधिक शेयर करते हैं. झूठी खबरें सच समाचारों की तुलना में ज्यादातर नई और बेहद रोचक नजर आती हैं. यही कारण है कि लोग नएपन के फेर में दूसरों तक उसे भेजते हैं. फेक न्यूज को वायरल करने वालों में बहुतों को पता ही नहीं होता कि वे झूठी बात का प्रचार कर रहे हैं.

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    झूठी खबरें सच समाचारों की तुलना में ज्यादातर नई और बेहद रोचक नजर आती हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)


    क्या इसका कोई राजनीतिक प्रभाव है?
    झूठी राजनीतिक खबर ज्यादा दूर तक और बड़े स्तर पर फैलती है. आम फेक खबरों की तुलना में राजनीति की फेक खबरें तीन गुना अधिक तेजी से फैलती हैं. जैसे-जैसे अधिक लोग अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पहुंचते हैं, झूठी राजनीतिक न्यूज को पढ़ने से राजनीतिक प्रभाव पड़ सकता है.

    भारत में कंट्रोल में क्या है मुश्किल
    हमारे यहां फेक न्यूज पर अक्सर बात होती रही. खासकर आज के समय में जबकि सोशल मीडिया पर इतने लोग एक्टिव हैं, फेक और सही खबरों में फर्क न होने पर काफी मुश्किल आ सकती है. यही कारण है कि सरकार समय-समय पर फेक न्यूज को लेकर सतर्क करती रहती है. यहां तक कि साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने ये तक कह दिया था कि हमें ऐसी गाइडलाइन की जरूरत है, जिससे ऑनलाइन अपराध करने वालों और सोशल मीडिया पर भ्रामक जानकारी फैलाने वालों को ट्रैक किया जा सके.

    आईटीएक्ट के तहत कई नियम लेकिन सख्ती की कमी
    राज्यों को पुलिस को एक्ट की खास जानकारी नहीं. ऐसे में आम लोगों से जानकारी की अपेक्षा नहीं ही की जा सकती. यही कारण है कि बहुत से लोग बगैर सोचे-समझे किसी भी वायरल पोस्ट को फारवर्ड कर देते हैं. सर्च इंजन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी इस बारे में काफी ढील दिए हुए हैं और कई बार सरकार को अपने यूजर की जानकारी देने से मना कर देते हैं.

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