गुमनामी बाबा के नेताजी होने पर क्यों संदेह जाहिर करते रहे हैं जांच आयोग

श्रीजीत सरकार की फिल्म "गुमनामी बाबा" करीब एक महीने बाद रिलीज होने वाली है लेकिन इससे पहले ही गुमनामी बाबा को लेकर विवाद शुरू हो गया है. सबसे ज्यादा सवाल नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रिश्तेदार उठा रहे हैं. फिर ना तो नेताजी की बेटी अनीता और ना ही जांच आयोगों ने कभी उन्हें नेताजी माना

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: September 5, 2019, 9:44 PM IST
गुमनामी बाबा के नेताजी होने पर क्यों संदेह जाहिर करते रहे हैं जांच आयोग
गुमनामी बाबा पर फिल्म रिलीज होने से पहले विवाद भी शुरू हो चुका है
Sanjay Srivastava
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: September 5, 2019, 9:44 PM IST
गुमनामी बाबा को लेकर चर्चाएं, कयास और विवाद फिर जोरों पर है. वजह है गुमनामी बाबा पर आने वाली फिल्म, जो कुछ ही दिनों में रिलीज होने वाली है. इसके रिलीज होने के साथ गुमनामी बाबा को लेकर ये सवाल भी उभरेंगे कि क्या वो वाकई नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे. हालांकि नेताजी के परिवारवाले खासे नाराज हैं कि गुमनामी बाबा को क्यों नेताजी साबित करने की कोशिश की जा रही है. गुमनामी बाबा को लेकर जांच आयोग क्या कहते हैं.

फिल्म निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी ने कहा कि मुझे बेशक जेल में ही क्यों ना डाल दिया जाए लेकिन मैं अपनी फिल्म गुमनामी बाबा को जरूर रिलीज करूंगा. ये फिल्म उस दिन रिलीज हो रही है, जिस दिन पूरा देश महात्मा गांधी का जन्मदिन मनाता है. गांधी और बोस में गहरे मतभेद भी थे.

अब जरा जानते हैं कि सुभाष चंद्र बोस के परिवारवाले गुमनामी बाबा को लेकर क्या रखते हैं. नेताजी की बेटी लंबे समय से इनकार करती रही हैं कि गुमनामी बाबा नेताजी हो सकते हैं. वो इस संभावना को सिरे से काटती रही हैं. सुभाष का परिवार लंबे समय से इस पर चुप रहा लेकिन अब इस परिवार का एक हिस्सा साफतौर पर गुमनामी बाबा पर ही सवाल खड़ा कर रहा है. इस परिवार ने हमेशा गुमनामी बाबा से दूरी बनाकर रखी.

तीन जांच आयोग और उनकी बातें 

ये तो परिवार की बात थी. सुभाष चंद्र बोस के रहस्यमय निधन की जांच के लिए देश में अब तक तीन जांच आयोग बन चुके हैं. पहला शाहनवाज खान जांच आयोग जब बना, तब गुमनामी बाबा परिदृश्य में ही नहीं थे. 70 के दशक में जब खोसला आयोग बना तब देश में कई जगह लोग दावा कर रहे थे कि वो नेताजी हैं. हालांकि गुमनामी बाबा ने अपने जीवन में ये दावा कभी नहीं किया लेकिन उनका नाम 70 और 80 के दशक में जगह जगह नेताजी के रूप में लिया जाने लगा था.



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खोसला आयोग ने कहा-ये गढ़ी हुई बात 
खोसला आयोग ने अपनी रिपोर्ट के निष्कर्ष में साफ लिखा, 1945 के बाद बोस के कई स्थानों पर होने और दिखने की कहानियां सामने आईं लेकिन वो ना केवल गढ़ी हुई हैं बल्कि अस्वीकार्य भी. अपनी रिपोर्ट में ये लिखकर ही उन्होंने नेताजी के वर्चस्व पर फुल स्टॉप लगा दिया.

खोसला आयोग ने कहा कि जगह जगह नेताजी के होने का जो लोग दावे कर रहे हैं, वो केवल मनगढंत है और इन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता


मुखर्जी ने कहा-क्यों गुमनामी बाबा नहीं थे नेताजी 
1999 में जब सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस मनोज मुखर्जी को लेकर फिर नेताजी के निधन संबंधी गुत्थी को सुलझाने के लिए एक जांच आयोग बनाया तो इस जांच आयोग निष्कर्ष कई मायनों में एकदम अलग थे. जस्टिस मुखर्जी ने उनके सामने पेश हुए तमाम दस्तावेजों के जरिए ये साफ किया कि नेताजी ताइवान के तायहोकु में 18 अगस्त 1945 में हुए हवाई हादसे में नहीं मरे थे. बल्कि उन्होंने ये भी कहा कि दस्तावेज ये बताते हैं कि ना तो उस दौरान तायहोकु में ऐसा कोई हादसा हुआ था और ना ही उस दिन सुभाष चंद्र बोस नाम का कोई शख्स वहां मिलिट्री अस्पताल में भर्ती कराया गया था. यहां तक कि वहां के शवदाह गृह में भी सुभाष चंद्र बोस के दाह संस्कार का भी कोई प्रमाण नहीं है, जबकि उस समय वहां ना तो डेथ सर्टिफिकेट शवदाह गृह में किसी का क्रिमेशन नहीं हो सकता था. हर क्रिमेशन को शवदाह गृह के रजिस्टर में ना केवल दर्ज किया जाता था बल्कि प्रमाण पत्र भी जारी होता था लेकिन वहां भी ऐसे कोई रिकॉर्ड नहीं हैं.

बेशक मुखर्जी आयोग ने ये भी माना कि गुमनामी बाबा नेताजी नहीं थे. उसके बारे में आयोग ने कई कारण थे. उसमें दो तीन बड़े कारण ये हैं. जिसका जिक्र जस्टिस मुखर्जी ने अपनी रिपोर्ट में किया
1- बाबा को करीब से जानने वाले लोग स्वर्गवासी हो चुके हैं, अत: वे गवाही के लिए उपलब्ध नहीं हो सकते.
2- बाबा का कोई छायाचित्र उपलब्ध नहीं है.
3- सरकारी फोरेंसिक लैब ने उनके 'हस्तलेख और 'दाँतों की डी.एन.ए. जाँच का रिपोर्ट ऋणात्मक दिया है.

मुखर्जी आयोग ने गुमनामी बाबा के बारे में कहा कि वो तीन वजहों से नेताजी नहीं हो सकते


बेटी भी कह चुकी है गुमनामी बाबा नहीं हो सकते नेताजी 
इस तरह दो जांच आयोग और नेताजी की बेटी के साथ उनके परिवार ने एक सिरे से ये खारिज कर दिया कि गुमनामी बाबा कहीं से भी नेताजी हो सकते हैं. गुमनामी बाबा 70 और 80 के दशक में फैजाबाद में रहते थे. वो पर्दे के पीछे से लोगों से मिलते थे. उनके पास आजाद हिन्द फौज के लोग आया करते थे. रात में उनसे मुलाकात करने वाले गाड़ियों में आते थे.

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जब 1985 में उनका निधन हुआ तो उनके कमरे से जो सामान निकले, उससे लोग हैरान रह गए. उसमें बहुत से सामान ऐसे थे, जो नेताजी इस्तेमाल करते थे. कुछ सामान ऐसे थे, जो नेताजी के परिवार से करीबी बताने वाले थे. इन सामानों से ये लगा कि गुमनामी बाबा या तो खुद नेताजी होने चाहिए या फिर उनके बहुत करीबी.

नेताजी की एकमात्र बेटी अनीता ने हाल ही में साफ कहा कि गुमनामी बाबा किसी हाल में नेताजी नहीं हो सकते


उत्तर प्रदेश में भी गठित हुआ एक आयोग 
नेताजी के निधन के बाद उनकी भतीजी ललिता जी जब वहां आईं तो उन्होंने इन सामानों को देखा. उसके बाद वो हाईकोर्ट की शरण में गईं. कोर्ट ने उत्तर प्रदेश को आदेश दिया कि एक ऐसा जांच आयोग गठित किया जाए जो इस पहलू की जांच करे कि गुमनामी बाबा कौन थे और उनके नेताजी सुभाष चंद्र बोस से क्या रिश्ते थे.
2013 में जस्टिस विष्णु सहाय जांच आयोग का गठन हुआ. हाल ही में सहाय आयोग ने अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार के सामने पेश कर दी. रिपोर्ट का कहना है कि बेशक नेताजी और गुमनामी बाबा में काफी समानताएं हैं लेकिन इससे ये नहीं कहा जा सकता कि गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे.

ये रहस्य और चर्चाओं में आने वाला है
ये तो तय है कि गुमनामी बाबा फिल्म रिलीज का समय पास आने के साथ और चर्चाओं में आते जाएंगे. नेताजी का रहस्य अब भी देश के सामने ऐसा सवाल है, जो अनुत्तित है. लिहाजा ये मांग फिर जोर पकड़ सकती है कि नेताजी की उन अस्थियों की जांच हो, जो जापान के मंदिर में रखी हैं. नेताजी की बेटी अनीता ने हाल में यूपीए सरकार से ये मांग की थी. अब उनका परिवार भी इस पर राजी होता नजर आ रहा है.

नेताजी के परिवारवालों ने भी कभी नहीं माना कि गुमनामी बाबा असल में सुभाष चंद्र बोस थे


कहां से आये थे गुमनामी बाबा
1960 के दशक में 'दशनामी सम्प्रदाय के एक संन्यासी नेपाल के रास्ते भारत में प्रवेश करते हैं. नीमशहर और बस्ती में वे अपना एकाकी जीवन बिताते हैं. उन्हें 'भगवानजी के नाम से जाना जाता है.
बताया जाता है कि नेताजी को पहले से जानने वाले कुछ लोग- जैसे उनके कुछ रिश्तेदार, कुछ शुभचिन्तक, कुछ स्वतंत्रता सेनानी, कुछ आजाद हिन्द फौज के अधिकारी उनसे गुप-चुप रूप से मिलते रहते थे. खासकर, 23 जनवरी और दुर्गापूजा के दिन मिलने-जुलने वालों की तादाद बढ़ जाती थी. भगवानजी इतने गोपनीय ढंग से रहते थे कि उन्हें 'गुमनामी बाबा का नाम मिल जाता है, जो गुमनाम ही रहना चाहता हो. उन्होंने अपनी जिंदगी में कभी ये दावा नहीं किया कि वो नेताजी हैं.

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First published: September 5, 2019, 8:56 PM IST
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