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क्यों हमेशा सूर्योदय से पहले ही दी जाती है फांसी, क्या है असली वजह?

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: December 10, 2019, 9:09 PM IST
क्यों हमेशा सूर्योदय से पहले ही दी जाती है फांसी, क्या है असली वजह?
देश में सौ सालों से कहीं अधिक समय से फांसी सुबह तड़के ही दी जाती रही है

ये सवाल अक्सर पूछा जाता है कि आमतौर पर फांसी की सजा हमेशा भोर में ही क्यों दी जाती है. देशभर में जब भी फांसी हुई है, उसका समय चार से पांच बजे के बीच रहा है. क्या इसकी कोई खास वजह होती है. आखिर किन कारणों की वजह से फांसी की सजा देश में भोर में होती है.

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  • Last Updated: December 10, 2019, 9:09 PM IST
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ये सवाल अक्सर पूछा जाता रहा है कि भारत (India) में फांसी (Capital Punishment) लंबे समय से सूर्योदय से पहले (तड़के) ही क्यों दी जाती है. अंग्रेजों के जमाने में भी फांसी की सजा जेल में सुबह सूरज की पहली किरण से पहले ही दी जाती थी. वैसा ही अब भी हो रहा है. भारत में आखिरी फांसी पुणे जेल में वर्ष 2012 में हुई थी. तब आतंकवादी अजमल कसाब को फांसी पर लटकाया गया था. ये भी भोर में ही दी गई थी.

केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर में जहां कहीं भी फांसी देने का रिवाज अभी जारी है, वहां फांसी भोर में ही दी जाती है. हालांकि भारत के जेल मैन्यूल में फांसी के समय के बारे में स्पष्ट दिशा निर्देश हैं. जेल मैन्युअल कहता है कि फांसी सुबह तड़के ही दी जानी चाहिए, ये हमेशा सूरज की पहली किरण से पहले संपन्न हो जाए.

हालांकि हर मौसम के हिसाब से फांसी का समय सुबह बदल जाता है लेकिन ये समय भी तय करने का काम केंद्र और राज्य सरकारें ही करती हैं. फांसी को सुबह तड़के शांत बेला में देने की तीन वजहें भी हैं, जो प्रशासनिक, व्यावहारिक और सामाजिक पहलुओं से जुड़ी हैं.

क्या है फांसी देने के समय को लेकर प्रशासकीय पहलू

आमतौर पर फांसी एक खास घटनाक्रम होता है. अगर ये दिन के दौरान होंगी तो जेल का सारा फोकस इसी पर टिक जाएगा. इससे बचने की कोशिश की जाती है ताकि जेल की दिनभर की अन्य गतिविधियों पर कोई असर नहीं पड़े. सारी गतिविधियां सुचारू तौर पर काम करती रहें. फांसी होने के बाद मेडिकल परीक्षण होता है और उसके बाद कई तरह की कागजी कार्यवाहियां. इन सबमें भी समय लगता है.



व्यावहारिक पहलू फांसी पाने से जुड़ा हैये माना जाता है कि जिस फांसी दी जा रही है, उसका मन सुबह भोर के समय में ज्यादा शांत रहता है. सोकर उठने के बाद फांसी देने पर वो ज्यादा शारीरिक तनाव और दबाव का शिकार नहीं होता. अगर फांसी दिन में हो तो सजायाफ्ता का तनाव और मानसिक स्थिति बिगड़ सकती है.

जिसे फांसी होती है, उसे सुबह तीन बजे ही उठना होता है ताकि वो अपने सारे काम फांसी से पहले निपटा ले, जिसमें प्रार्थना और अकेले में कुछ समय के लिए अपने बारे में सोच-विचार करना आदि भी शामिल है. सबसे बड़ी बात है कि फांसी के बाद उसके परिजनों को शव सौंप दिया जाए, ताकि वो उसे लेकर अपने गंतव्य तक जा सकें और दिन में ही अंतिम संस्कार कर लें.

सामाजिक पहलू यानि हंगामा नहीं हो
फांसी का तीसरा पक्ष सामाजिक है. चूंकि ये खास घटना होती है लिहाजा बड़े पैमाने पर लोगों का ध्यान आकर्षित करती है. इसके चलते जेल के बाहर बड़े पैमाने पर तमाशबीन इकट्ठा होने और हंगामा होने के भी आसार होते हैं. लिहाजा कोशिश होती है कि जब तक लोग सोकर उठें तब तक फांसी हो जाए.

किस तरह होती है फांसी की तैयारियां
फांसी के करीब 10-15 दिन पहले खास प्लेटफार्म तैयार कर दिया जाता है. ये जमीन से करीब चार फुट ऊंचा होता है. इस प्लेटफॉर्म पर सजायाफ्ता को एक लकड़ी के पटरे पर खड़ा किया जाता है, जिसे गोलाकार तौर पर चिन्हित किया जाता है.

जिस टी शेप खंबे से रस्सी का फंदा लटकाया जाता है, वो करीब दस फीट ऊंचा होता है. साथ ही इसमें छह मीटर की रस्सी का इस्तेमाल होता है


यही वो पटरा होता जो जल्लाद के लिवर खींचते ही हट जाता है और सजायाफ्ता शख्स गर्दन पर लगे फंदे के साथ झूल जाता है.

जिस टी शेप खंबे से रस्सी का फंदा लटकाया जाता है, वो करीब दस फीट ऊंचा होता है. साथ ही इसमें छह मीटर की रस्सी का इस्तेमाल होता है

फंदा गर्दन पर कसते ही शरीर में क्या होता है
जैसे ही जल्लाद लिवर को खींचता है, वैसे ही जिस पटरे पर फांसी पाने वाला शख्स खड़ा होता है, वो पटरा नीचे चला जाता है, तब वो तुरंत लटकने लगता है और रस्सी का दबाव गर्दन पर कसने लगता है. शरीर का पूरा वजन नीचे की ओर जाने लगता है.

ऐसे में पहले गर्दन लंबी होती है और फिर गर्दन की मांसपेशियां टूटने लगती हैं. इससे मस्तिष्क का संपर्क शरीर से टूट जाता है, चेतना खत्म हो जाती है. जिसे फांसी दी जा रही है, वो अचेत हो जाता है. साथ ही हृदय की ओर खून का बहाव रुक जाता है और सांस लेने की प्रक्रिया भी गला घुटने से बंद हो जाती है.

आमतौर पर फांसी लगने के बाद पांच मिनट से लेकर 20-25 मिनट के भीतर मौत हो जाती है. उसके बाद डॉक्टर बॉडी को चेक करता है और सजायाफ्ता शख्स को मृत घोषित करता है.

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First published: December 10, 2019, 9:09 PM IST
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