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सिख हवलदार ईश्वर सिंह का क्यों सम्मान कर रहा है ब्रिटेन

ईश्वर सिंह (Havildar Ishwar Singh) की प्रमिता का लगना सारागढ़ी युद्धाओं की बहादुरी का सम्मान है. (तस्वीर:  Twitter @JSinghSohal)

ईश्वर सिंह (Havildar Ishwar Singh) की प्रमिता का लगना सारागढ़ी युद्धाओं की बहादुरी का सम्मान है. (तस्वीर: Twitter @JSinghSohal)

  • News18Hindi
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    अंग्रेजों के भारत (India) और उसके आसपास के देशों में शासन काल में कई युद्ध ऐसे लड़े गए जिसमें भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजी हुकूमत के लिए बहुत बहादुरी से लड़ाई लड़ी. इसमें दोनों विश्वयुद्ध के अलावा सारागढ़ी का युद्ध (Battle of Saragarhi) में प्रमुखता से याद किया जाता है.  इसमें 1897 में केवल 21 सिखों ने शहीद होने से पहले1000 से ज्यादा अफगानी कबाइलियों को सारागढ़ी किले पर कब्जा करने से रोके रखा था. हाल ही में ब्रिटेन में इन सिख सैनिकों का नेतृत्व करने वाले हवलदार ईश्वर सिंह (Havildar Ishwar Singh)  की कांसे की प्रतिमा  का अनावरण किया गया.

    सारागढ़ी के नायकों के सम्मान के ले  लिए
    इंग्लैंड के वॉल्वरहैम्प्टन के वेडन्सफ़ील्ड ईश्वर सिंह की 10 फुट ऊंची कांसे प्रतिमा सारागढ़ी के युद्ध में शहीद होने वाले नायकों के सम्मान लोकार्पित की गई है. सारागढ़ी के ऐतिहासिक युद्ध और इंग्लैंड में सिख समुदाय को ना जानने वालों के लिए यह बहुत हैरानी की बात हो सकती है. लेकिन ब्रिटेन ने इन 21 सिखों का सम्मान किया है, इसके पीछे यहां के सिख समुदाय और सारागढ़ी की हैरतअंगेज लड़ाई में ईश्वर सिंह और उनके 20 बहादुर सैनिकों का शौर्य है.

    यह था अफगानों का इरादा
    इस युद्ध में अफगानों का इरादा आज के खैबर पख्तून प्रांत के सारागढ़ी किले पर कब्जा कर अंग्रेजों के कुछ अन्य इलाकों पर कब्जा करना था. उन्हें लगा कि सारागढ़ी किले पर मौजूद 36वीं सिख रेजिमेंट के 21 सैनिक 10 हजार से ज्यादा कबाइलियों के आगे कुछ समय से ज्यादा नहीं टिक सकेंगे. लेकिन ईश्वर सिंह ने उनके सामने समर्पण करने से ना केवल इनकार कर दिया और काफी लंबे समय तक कबाइलियों को किले पर कब्जा करने रोका भी रखा.

    पूरे नहीं हुए थे कबाइलियों के मंसूबे
    यह लड़ाई छह घंटे से लंबी चली. इसमें करीब 180 से 200 अफगानी कबीलाई भी मारे गए.  जिससे अफगान कबाइलियों को पूरी योजना पर पानी फिर गया और वे आगे नहीं बढ़ सके. इस लिहाज से इस लड़ाई में भले ही अफगान कबाइलियों ने जीत ली हो, लेकिन उनके मंसूबे पूरे नहीं हो सके. भारतीय सेना की सिख रेजिमेंट की चौथी बटालियन 12 सितंबर को सारागढ़ी दिवस के रूप में मनाती है.

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    ईश्वर सिंह (Havildar Ishwar Singh) की प्रमिता कल्पना पर आधारित है कि क्योंकि उनकी कोई तस्वीर उपलब्ध नहीं हैं. (फाइल फोटो)

    लंबे समय से इसके लिए चल रहे थे प्रयास
    वेडन्सफ़ील्ड के काउंसलर भूपिंदर गखल का लंबे समय का एक सपना था कि वे 21 बहादुर सिख सैनिकों और सारागढ़ी की लड़ाई का कहानी को साझा करें. गखल ने बीबीसी बताया कि जब वे 41 साल पहले 14 साल की उम्र में भारत आए थे, तब उन्होंने भारतीय स्टेट बैंक की एक शाखा में एक कैलंडर में एक खंडहर के दिखा. उसके  बारे में जब उन्होंने बैंक मैनेजर से पूछा तब उन्होंने कहा, ‘यह तुम्हारा इतिहास है, इसकी जानकारी खुद हासिल करो.

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    सभी के लिए जानना जरूरी है ये इतिहास
    गखल का कहना है कि यह सिख समुदाय के लिए गर्व का पल है. आने वाली सिख पीढ़ी को इससे सारागढ़ी के इतिहास की जानकारी मिलती रहेगी. वहीं बर्मिंघम में रहने वाले तराइन सिंह का कहना है कि यह केवल सिखों के लिए ही नहीं, बल्कि सभी भारतीयों और अंग्रेज़ों के लिए भी जानना ज़रूरी है कि यह इतिहास की अहम लड़ाई में से एक थी.

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    सारागढ़ी (Saragarhi) की लड़ाई अंग्रेजों के लिए बहुत फायदेमंद रही थी. (तस्वीर: Twitter @Jane_Stevenson_)

    कुछ और होता इतिहास
    सारागढ़ी के युद्ध में अफगानों का इरादा गुलिस्तान किले पर कब्जा करना था, लेकिन सारागढ़ी में ही उन्हें इतना समय लग गया, कि वे गुलिस्तान तक नहीं पहुंच सके. इसके बाद 14 सितंबर को अंग्रेजों की फौज ने सारागढ़ी पर फिर से कब्जा कर लिया था. बताया जाता है कि अगर सारागढ़ी पर कबाइलियों का जल्दी कब्जा हो जाता, तो वे गुलिस्तान पर भी कब्जा कर लेते.

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    इस युद्ध की सबसे खास बात 21 योद्धाओं की बहादुरी थी जिसके अंग्रेज तक कायल हो गए थे. कई सैन्य इतिहासकारों का मानना है कि सारागढ़ी का युद्ध शहीद होने से पहले लड़े गए इतिहास के महानतम युद्धों में से एक है. बाद में उन सभी 21 सैनिकों को उनके अदम्य साहस और बहादुरी के लिए मरणोपरांत उस समय के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार ‘इंडियन ऑर्डर ऑफ़ मेरिट’ दिया गया था जो कि माना जाता है कि उस समय भारतीयों को दिया जाने वाला सर्वोच्च वीरता पुरस्कार था.

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