भारत में क्यों बढ़ रहा डॉक्टरों और नर्सों पर कोरोना का ख़तरा

भारत में क्यों बढ़ रहा डॉक्टरों और नर्सों पर कोरोना का ख़तरा
मध्य प्रदेश जनसंपर्क विभाग के एक अधिकारी ने बताया, 'जो छह मरीज बुधवार को संक्रमित पाये गये हैं, उनमें एक स्थानीय टीवी न्यूज चैनल का पत्रकार भी शामिल है. (प्रतीकात्मक फोटो)

कोरोना वायरस (coronavirus) संक्रमितों के इलाज के दौरान देश में डॉक्टर और नर्सें भी वायरस की चपेट में आ रहे हैं. इससे ये डर बढ़ गया है कि कहीं अस्पताल (hospitals) ही वायरस के हॉटस्पॉट (hot spots of virus) न बन जाएं.

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चीन में हुई एक स्टडी (study in China) में देखा गया कि मरीजों में से 29% लोग खुद हेल्थकेयर प्रोफेशनल थे, जो इलाज के दौरान संक्रमित हुए थे. यहां तक कि एक मरीज, जिसमें कोरोना का कोई लक्षण नहीं था, उससे 11 डॉक्टरों और नर्सों को ये वायरस फैल गया. इटली में भी कमोबेश यही हालात हैं. Group for Evidence-based Medicine के अनुसार इटली में फरवरी में कोरोना की शुरुआत में ही 2,629 अस्पतालकर्मी कोरोना पॉजिटिव हो गए, जो कि कुल मरीजों का 8.3 प्रतिशत था. ये हालात तब हैं, जबकि उस देश में हेल्थकेयर सिस्टम काफी अच्छा माना जाता है.

ऐसे में भारत के हालात देखें तो ये खतरा बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, जहां मरीजों की संख्या में डॉक्टर नहीं के बराबर हैं. World Health Organization (WHO) की मानें तो यहां हर 1000 मरीज पर 1 डॉक्टर है. ऐसे समय में कई ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं जहां डॉक्टरों और नर्सों में संक्रमण के कारण पूरे अस्पताल को बंद करना पड़ा. यानी हेल्थ वर्कर्स कोरोना वायरस के खिलाफ जंग तो लड़ रहे हैं लेकिन इसका खामियाजा भी भुगत रहे हैं. साल 2003 में सार्स के कहर के दौरान भी यही दिखा. WHO के अनुसार 2002-03 में फैले सार्स संक्रमण के दौरान 21 फ़ीसदी संक्रमित लोग स्वास्थ्यकर्मी थे.

डॉक्टरों के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद एक अस्पताल को प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित कर दिया गया है




हेल्थकेयर प्रोफेशनल वायरस के लिए संवेदनशील क्यों
क्योंकि ये आम लोगों की अपेक्षा रोज ही पैथोजन के संपर्क में आ रहे हैं. भले ही वे personal protective equipment पहनें लेकिन तब भी एक छोटी सी भूल भी उन्हें संक्रमित कर सकती है. दूसरी वजह ये है कि अधिकतर डॉक्टर और नर्सों को प्रोटेक्टिव गेयर नहीं मिल पाते हैं. तीसरी वजह ये भी है कि मरीजों में बढ़त के कारण डॉक्टरों और नर्सों को इन उपकरणों की कमी पड़ रही है.

वायरल लोड भी जिम्मेदार
इनके अलावा वायरल लोड भी को डॉक्टरों और नर्सों के बीमार होने की वजह माना जा रहा है. जैसे ही वायरस शरीर की किसी एक होस्ट कोशिका से स्पाइक प्रोटीन के जरिए जुड़ते हैं, वे कोशिका में प्रवेश कर जाते हैं और धीरे-धीरे फैलने लगते हैं. इस तरह से मरीज के शरीर में वायरस की कई प्रतियां हो जाती हैं. इसे वायरल लोड कहते हैं. ये जितना ज्यादा होगा, मरीज के संक्रमण से प्रभावित होने की आशंका भी उतनी ही ज्यादा होगी. चूंकि हेल्थवर्कर्स लगातार मरीजों के जरिए वायरल लोड के संपर्क में रहते हैं, उनके भी वायरस से प्रभावित होने का खतरा बढ़ता ही जाता है.

अस्पताल बने रहे हॉटस्पॉट
मुंबई के वोकहार्ट (Wockhardt) अस्पताल में 26 नर्सों और 3 डॉक्टरों के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद अस्पताल को प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित कर दिया गया है. कहा जा रहा है कि अस्पताल में भर्ती एक मरीज से वायरस संक्रमण नर्सों के जरिए बाकी स्टाफ में फैला. जसलोक (Jaslok) अस्पताल से भी इसी तरह की खबर आई है, जहां नर्सों ने आरोप लगाया था कि स्टाफ के कई लोगों को वायरस का संक्रमण फैल चुका है. दिल्ली में भी ऐसे मामले आ रहे हैं. यहां राज्य कैंसर संस्थान को 1 अप्रैल को बंद करना पड़ा क्योंकि वहां काम करने वाला एक डॉक्टर कोरोना पॉजिटिव आया है. इससे उस अस्पताल में भर्ती गंभीर हालत वाले कैंसर मरीजों पर भी वायरस के संक्रमण का खतरा बढ़ चुका है, हालांकि अभी तक ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं आई है.

डॉक्टर और नर्सें आम लोगों की अपेक्षा रोज ही पैथोजन के संपर्क में आ रहे हैं


गड़बड़ा रही व्यवस्था
फर्स्टपोस्ट में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार जसलोक अस्पताल का कहना है कि वे COVID-19 के मरीजों की देखभाल में जुटे स्टाफ को Personal Protection Equipment दे रहे हैं, जिनमें मास्क, ग्लव्स, आई प्रोटेक्शन ग्लास शामिल हैं ताकि उन्हें वायरस के लीकेज पर संक्रमण से बचाया जा सके. साथ ही वॉटर रेजिस्टेंट गाउन भी दिए जा रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद अस्पताल स्टाफ में संक्रमण को रोका नहीं जा सका. अब मरीजों या संक्रमित अस्पताल स्टाफ के संपर्क में आए सभी लोगों को क्वारेंटीन में रखा गया है. यहां तक कि OPD भी कुछ दिनों के लिए बंद की जा चुकी है. लेकिन इससे वे मरीज भी प्रभावित हो रहे हैं जो अलग-अलग बीमारियों के इलाज के लिए रोज अस्पताल आते हैं. साथ ही अस्पताल बंद होने से कोरोना के खिलाफ जंग भी कमजोर पड़ेगी. COVID-19 से अस्पताल कर्मियों के इंफेक्टेड होने की खबरें सिर्फ मुंबई या दिल्ली से नहीं, बल्कि देश के कई राज्यों से आ रही हैं, जिनमें केरल, राजस्थान, कर्नाटक, यूपी और बिहार शामिल हैं.

डॉक्टरों पर कितना बोझ
पिछले लोकसभा सत्र में एक सवाल के जवाब में बताया गया कि हमारे यहां 1,445 मरीजों पर 1 डॉक्टर है. जो कि WHO के उस आंकड़े से भी कम है जिसके अनुसार 1000 मरीज पर 1 डॉक्टर है. एक और अनुमान से पता चलता है कि एक ऑन-ड्यूटी डॉक्टर 1 सप्ताह में अस्पताल के 100 बिस्तरों पर आए मरीजों को देखता है और इतने ही मरीज OPD में भी देखता है. अब अगर डॉक्टर ही कोरोना से संक्रमित होकर क्वारेंटीन में चले जाएंगे तो इस दौरान ये सारे मरीज भी बीमारी से जूझते रहेंगे. इससे स्वस्थ डॉक्टरों पर काम का दबाव और बढ़ जाएगा.

जैसे-जैसे कोरोना के मरीज बढ़ रहे हैं, Personal protective equipment (PPE) की कमी हो रही है


PPE की कमी से जूझ रहा अस्पताल स्टाफ
जैसे-जैसे कोरोना के मरीज बढ़ रहे हैं, Personal protective equipment (PPE) की कमी हो रही है, यहां तक कि इमरजेंसी रूम में काम कर रहे डॉक्टर भी सिर्फ N95 मास्क के भरोसे रह रहे हैं, जबकि ये मास्क 2 से 3 दिनों के भीतर किसी काम का नहीं रह जाता है. बिहार के एक अस्पताल में कोरोना के मरीजों की देखभाल में लगे डॉक्टर को सामान्य सर्जिकल मास्क पहनना पड़ा. कुछ दिनों बाद जब कई डॉक्टरों में कोरोना के लक्षण दिखने लगे तो उन्हें तो क्वारेंटीन में भेज दिया गया लेकिन जिन डॉक्टरों में कोई लक्षण नहीं थे, उन्हें ड्यूटी पर आने को मजबूर किया गया, जबकि वे संदिग्ध डॉक्टरों के सहकर्मी हैं. यूपी के कई डॉक्टर PPE की कमी के कारण HIV मरीजों के इलाज के दौरान पहना जाने वाला मास्क पहनने को मजबूर हैं. जबकि कोरोना और HIV के लक्षण और उनके फैलने का ढंग एकदम अलग है. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर में बताया गया है कि कोलकाता के Medical College Hospital में कोरोना के मरीजों का इलाज कर रहे डॉक्टरों को PPE की कमी के कारण रेनकोट पहनने को कहा गया.

अलजज़ीरा की एक रिपोर्ट में इसके लिए सरकारी व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया गया. इसके अनुसार World Health Organization (WHO) ने 27 फरवरी को ही भारत को PPE की कमी के लिए चेताया था लेकिन तब ध्यान नहीं दिया गया. अब जब केस बढ़ रहे हैं तब जाकर सरकार ने दूसरे देशों में इसका निर्यात रोका, जबकि इससे पहले हमारे यहां से ये उपकरण बनाने के लिए दूसरे देशों को कच्चा माल भेजा जा रहा था. अब बढ़ते केसों के देखते हुए माना जा रहा है कि लॉकडाउन खुलने के बाद अगर संक्रमण फैलता है तो भारत में रोज 50000 PPE की जरूरत हो सकती है, जबकि सरकार ने फिलहाल मई के अंत तक के लिए 7,00000 PPE बनाने की तैयारी करने को कहा है.

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