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क्यों अपने पुश्तैनी अफगानिस्तान को छोड़कर भागे हिंदू और सिख?

News18Hindi
Updated: December 12, 2019, 5:24 PM IST
क्यों अपने पुश्तैनी अफगानिस्तान को छोड़कर भागे हिंदू और सिख?
2018 में अफगानिस्तान के जलालाबाद शहर में सिखों के इलाके पर आत्मघाती हमला हुआ था. हमले में 13 लोगों की मौत हो गई थी. हमले के बाद अपने परिजन के शव के साथ एक सिख परिवार.

बीते कुछ दशकों के दौरान तालिबान (Taliban) और कट्टर इस्लामिक (Radical Islam) संगठनों की मौजूदगी ने यहां दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों का रहना दूभर कर दिया है. तालिबान और फिर बाद में अल-कायदा ने अफगानिस्तान को अपना गढ़ बनाया और फिर एक-एक कर इतिहास की सभी चमकदार धरोहरों को खत्म करते चले गए.

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  • Last Updated: December 12, 2019, 5:24 PM IST
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भारत में नागरिकता संशोधन बिल (Citizenship Amendment Bill) संसद के दोनों सदनों से पास हो गया है. इस बिल को लेकर विपक्ष के भारी विरोध के अलावा देश के कई इलाकों विशेषतौर पर उत्तर पूर्व (North-East India) में उग्र प्रदर्शन हो रहे हैं. सरकार का तर्क है कि बांग्लादेश (Bangladesh), पाकिस्तान (Pakistan) और अफगानिस्तान (Afghanistan) में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिक देकर हम बड़ा दिल दिखाएंगे तो वहीं विपक्ष का कहना है कि इसमें से मुस्लिमों को बाहर किया जाना संविधान की मूल आत्मा के साथ खिलवाड़ है.

विपक्षियों का विरोध इस बिल में अफगानिस्तान के जिक्र को लेकर भी है. लेकिन सरकार का कहना है कि हम वहां के भी प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को अपने यहां नागिरकता देंगे. अफगानिस्तान के जिक्र के साथ ही इस बात का भी सिलसिला निकल पड़ा है कि आखिर वहां पर अल्पसंख्यकों की स्थिति कैसी है? पाकिस्तान में हिंदू और सिख धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ अत्याचार की खबरें तो भारत में प्रमुखता के साथ प्रकाशित होती रही हैं. लेकिन अफगानिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार को लेकर कम ही रिपोर्ट आई हैं. ऐसे में यह जायजा लेना जरूरी है कि आखिर अफगानिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के हालात कैसे हैं?

बहुसंस्कृति लंबे समय तक फली-फूली
अफगानिस्तान रणनीतिक तौर पर ऐसी जगह पर मौजूद है जो व्यापार के मुख्य रूट के तौर पर लंबे समय से इस्तेमाल किया जाता रहा. लंबे समय तक ये इलाका कई संस्कृतियों के संगम तौर पर मजबूत होता रहा. लेकिन बीते कुछ दशकों के दौरान तालिबान और कट्टर इस्लामिक संगठनों की मौजूदगी ने यहां दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों का रहना दूभर कर दिया है. तालिबान और फिर बाद में अल-कायदा ने अफगानिस्तान को अपना गढ़ बनाया और फिर एक-एक कर इतिहास की सभी चमकदार धरोहरों को खत्म करते चले गए.

काबुल स्थित एक गुरुद्वारे की तस्वीर
काबुल स्थित एक गुरुद्वारे की तस्वीर


इंडिया टाइम्स प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक स्थिति इतनी खराब है कि बीते तीन दशक के दौरान तकरीबन 99 प्रतिशत हिंदू और सिख नागरिक अफगानिस्तान छोड़कर भागने को मजबूर हो गए हैं. 1980 की की शुरुआत में जब तक मुजाहिदिनों ने देश में अपनी जड़ें नहीं जमायी थीं तब तक अफगानिस्तान में हिंदू और सिखों की संख्या करीब 2 लाख 20 हजार के आस-पास थी. मुजाहिदीनों के आतंक के कारण इस संख्या में तेजी से कमी आई और हिंदू-सिख जान बचाने के लिए देश छोड़कर भाग खड़े हुए. 1990 के दशक में जब तालिबान ने देश पर कब्जा किया तब तक हिंदुओं की संख्या हजारों में आ चुकी थी. वर्तमान के आंकड़े के मुताबिक अफगानिस्तान में कुल डेढ़ हजार के आस-पास हिंदू और सिख बचे हैं. अब इन समुदायों के नेताओं का कहना है कि वो लंबे समय से देश में प्रताड़ित किए जा रहे हैं.

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इन समुदाय के लोगों का आरोप है कि उनके साथ देश में दूसरे दर्जे के नागरिक के तौर पर व्यवहार किया जाता है. हिंदू और सिख समुदाय के जिन लोगों के पास पहले बिजनेस और संपत्तियां थीं वो उनसे छीन लिए गए. इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों ने बड़ी संख्या में लोगों धार्मिक कन्वर्जन भी कराया और अब भी लगातार दबाव डालते रहते हैं.लंबे समय की प्रताड़ना झेलकर देश से जान बचाकर भागे हिंदू और सिखों ने भारत और यूरोपीय देशों में शरण ली है. सिखों की दयनीय स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया की निगाह तब गई जब 2014 में 35 सिख ब्रिटेन के कंटेनर में छिपे मिले. ये सिख लोग अवैध रूप से ब्रिटेन के भीतर दाखिल होने की कोशिश कर रहे थे.

अफगानिस्तान बौद्ध धर्म का सफाया
इस इलाके में इस्लाम आने के पहले यहां बौद्ध धर्म का बड़ा केंद्र हुआ करता था. वर्तमान हालत ये है कि अब देश में बौद्ध धर्म का नामो निशान है. हालांकि बौद्ध धर्म से जुड़ी कुछ बड़ी इमारतें और मूर्तियां यहां जरूर मौजूद हैं लेकिन उन पर भी हमले होते रहे हैं.

बामयान में गौतम बुद्ध की इस विशालकाय मूर्ति को डायनामाइट लगाकर तालिबानी आतंकियों ने उड़ा दिया था. ये तस्वीर 2001 से पहले की है. (विकीपीडिया से साभार)
बामयान में गौतम बुद्ध की इस विशालकाय मूर्ति को डायनामाइट लगाकर तालिबानी आतंकियों ने उड़ा दिया था. ये तस्वीर 2001 से पहले की है. 


साल 2001 में बामियान में गौतम बुद्ध की दो विशालकाय मूर्तियों को तालिबान ने डायनामाइट लगाकर उड़ा दिया था. ये मूर्तियां 5वीं सदी में बनाई गई थीं यानी इनका इतिहास करीब 1500 साल पुराना था. इन मूर्तियों को उड़ाने का आदेश तालिबान के नेता मुल्ला उमर ने दिया था. उसने मूर्ति पूजा के विरोध में ऐसा करवाया था. इस घटना की पूरे विश्व में निंदा हुई थी. 2015 में एक चीनी कंपनी ने इन मूर्तियों का जीर्णोद्धार कराया था लेकिन पुराने आकार में वापस लाना तकरीबन नामुमकिन था.

अफगानिस्तान में हिंदू शाही
अफगानिस्तान में हिंदू शाही का पुराना इतिहास है. पश्चिमी एशिया में जब इस्लाम का उदय हुआ उस समय यहां पर हिंदू शाही का शासन था. कपीश शब्द का उल्लेख आचार्य पाणिनी की किताब में आता है. पाणिनी ने अपनी कपीशी शहर का जिक्र किया है जो कपीश राज्य का हिस्सा थी. 7वीं सदी में यहां पर खलीफा के आदेश पर पहली बार अब्दुर रहमान ने इस इलाके पर चालीस हजार सैनिकों के साथ हमला किया लेकिन कामयाब नहीं हो पाया.

इसके बाद भी समय-समय पर इन इलाकों पर इस्लामिक आक्रमण हुए और धीरे-धीरे कई इलाकों पर कब्जा भी किया. जयपाल देव काबुल का आखिरी बड़ा हिंदू राजा माना जाता है. वो 964 ईस्वी से 1001 ईस्वी तक यहां का राजा था. उसके बाद धीरे-धीरे अगले 200 सालों में यहां से हिंदू शासन का लगभग पूरा अंत हो गया.
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First published: December 12, 2019, 3:49 PM IST
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