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इस साल सूरज ढाएगा सितम! झुलसती गर्मी की डाल लें आदत...

इस साल सूरज ढाएगा सितम! झुलसती गर्मी की डाल लें आदत...

झुलसती गर्मी अब सामान्य बात होती जा रही है

झुलसती गर्मी अब सामान्य बात होती जा रही है

हर साल गर्मियां आती हैं और हम साल कहते हैं कि इस बार गर्मी ज्यादा ही है. लेकिन क्या अब गरमी का ज्यादा होना सामान्य बात नहीं हो गई है. प्राकृतिक और मानव निर्मित बदलावों ने मिलकर पृथ्वी का तापमान बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. ऐसे में कुल्हाड़ी पर पैर मारकर सवाल करना कि हमें चोट क्यों लगी, थोड़ा अजीब है...पढ़िए क्यों अब आपको झुलसती गर्मियों की आदत डाल लेनी चाहिए.

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    ‘इस बार गरमी ज्यादा पड़ेगी’ – हर साल की तरह इस बार भी यही लाइन सुनने को मिल रही है. गर्मियों ने दस्तक दे दी है. मार्च आते ही इस बात का एहसास होने लगा है कि इस बार सूरज और ज्यादा कहर ढाएगा. मौसम विभाग के अनुमान के मुताबिक, मार्च से लेकर मई तक देश भर में तापमान सामान्य से कहीं ज्यादा गर्म होने वाला है. हालांकि यह चकित कर देने वाली बात नहीं होनी चाहिए, क्योंकि बीते सालों के आंकड़ों के मुताबिक धरती गर्म और गर्म होती जा रही है. 1880 से लेकर अब तक 18 में से 17 सबसे गर्म साल 2001 से शुरू हुए हैं. हालांकि 1998 इसमें एक अपवाद था. यही नहीं, साल 2016 को तो धरती का सबसे गर्म साला बताया ही जाता है.

    उसके बाद बारी आई 2017 की जो आंकड़ों के हिसाब से दूसरा सबसे गर्म साल रहा. तो क्या अब अगला नंबर 2018 का है. क्या इस तरह की असामान्य गर्मी अब हमें सामान्य लग जानी चाहिए?

    वैज्ञानिकों को पृथ्वी का तापमान (धरती और समुद्र) मापते हुए 136 साल से ज्यादा हो गए हैं. 1880 में यह काम शुरू किया गया जिसके बाद अलग अलग एजेंसियों - जिसमें नासा भी शामिल है - ने भूमंडलीय तापमान को मापने का काम अपने जिम्मे पर ले रखा है. 1977 से हर साल का तापमान 20वीं सदी के औसत से ऊपर ही दर्ज हुआ है. और इस काम में 2016 ने रिकॉर्ड ही तोड़ दिया. इस साल भूमंडलीय औसत तापमान .94 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म रहा.

    तेल की गर्म कढाई होती जा रही है पृथ्वी

    2017 में भी इसका असर पड़ता दिखाई दिया. यह चिंता की बात है कि अल निनो का असर 2017 में कम था, उसके बावजूद वह अब तक का दूसरा सबसे गरम साल रहा. अल निनो समुद्र के गर्म पानी को सतह पर लेकर आता है जिसकी वजह से अस्थाई तौर पर भूमंडल की सतह का तापमान बढ़ जाता है. लेकिन 2016-17 के तापमान को देखकर लग रहा है कि अल निनो हो या न हो, पृथ्वी तो मानो तेल की गर्म कढ़ाई होती जा रही है.

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    अभी नहीं, कुछ करोड़ों साल बाद पृथ्वी, गरमी के हवाले हो ही जाएगी


    मौसम की इस अति के लिए क्लायमेट चेंज यानि जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराया जाता है. वैसे धरती के लिए यह कोई नई बात नहीं है. पृथ्वी के 400 करोड़ पुराने इतिहास में झांका जाए तो हमने तापमान मे कई उतार चढ़ाव देखे हैं. एक बर्फ का गोला बनने से लेकर तपती गरमी तक सब कुछ. लेकिन इन सभी बदलावों के बावजूद पृथ्वी मानो स्प्रिंग की तरह वापस तापमान को अपनी रेंज में ले ही आती है. तापमान को काबू करने के पृथ्वी के अपने कुछ तरीके हैं. मसलन ग्रीनहाउस इफेक्ट.

    कैसे तापमान को कंट्रोल करती हैं ग्रीन हाउस गैसें 

    ग्रीनहाउस गैस हवा में मौजूद Co2, मिथेन और वाष्प हैं जो सूरज से निकलने वाली किरणों को मानो अपने अंदर लेपट लेती हैं और ग्रह के लिए एक तरह के थर्मल के कंबल का काम करती हैं. ग्रीनहाउस इफेक्ट के बगैर पृथ्वी का तापमान औसतन -18 डिग्री सेल्सियस होता और बर्फ से ढका होता. इसमें कोई शक नहीं कि ग्रीनहाउस इफेक्ट पृथ्वी के लिए अच्छा है लेकिन अति किसी भी चीज़ की बुरी होती है.

    हालांकि हम इंसानों को पृथ्वी पर कब्ज़ा किए बहुत ज्यादा वक्त नहीं हुआ है. इसके बावजूद ग्रह की जलवायु को बदलने में हमारा बहुत बड़ा हाथ है. ईंधन जलाने और पेड़ काटने जैसे गतिविधियों ने हवा में ज्यादा से ज्यादा Co2 छोड़ने का काम किया. नतीजा – तापमान का बढ़ना. ऐसा कहा जा रहा है कि इस सदी के अंत तक दुनिया, औद्योगिक क्रांति से पहले के मुकाबले 4 डिग्री और गर्म हो जाएगी. पिछले दशक के मुकाबले हमारे उत्सर्जन की दर चौगुनी हो गयी है. आने वाले वक्त में इसके पीछे जाने की संभावना कम ही नज़र आती है.

    भविष्य में हमारा ग्रह किस हाल में होगा, यह जानने के लिए वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसे मॉडल तैयार किए हैं जो धरती के मौसम की एक तरह से कॉपी करते हैं. मानव निर्मित और प्राकृतिक बदलावों को मिलाकर ये मॉडल्स अंदाजा लगा सकते हैं कि किस तरह एक निर्धारित ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन से प्रकृति में बदलाव आएगा.

    इन्हीं सब प्रयोगों के बीच एक डर यह भी सामने आ रहा है कि कहीं हमारा हश्र पड़ोसी ग्रह शुक्र जैसा न हो जाए. वैज्ञानिक बताते हैं कि 300 करोड़ साल पहले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन ने शुक्र को मौजूदा हाल में लाकर छोड़ दिया है. यह सही है कि पृथ्वी के मुकाबले शुक्र, सूरज के ज्यादा करीब है. लेकिन एक वक्त में उसकी सतह पर तापमान इस कदर बढ़ गया कि उसका सारा पानी हवा में उड़ गया. वाष्प ने और अधिक गरमी को अपने अंदर लिया और सतह पर जब पानी ही नहीं बचा तो Co2 के पास जमा होने के लिए कोई जगह ही नहीं बची. ग्रीनहाउस के हालात अधिकतम सीमा तक पहुंच गए. शुक्र का सारा वाष्प ब्रह्मांड में बह गया और वह 96% Co2 के साथ रह गया. फिलहाल शुक्र ग्रह का तापमान 462 ड्रिग्री सेल्सियस है.

    वैसे तो घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह सब कुछ होने में अभी 100-200 करोड़ साल लगेंगे. लेकिन जिस तरह प्रकृति के सामने औद्योगिकरण ने बांहे तान ली है, उससे लगता है कि अगले कुछ करोड़ सालों में हमारे ग्रह का हाल भी कुछ ऐसा ही होने वाला है. उसकी शुरुआत हर साल गरमी के भीषण और भीषण होने से होगी. सिर्फ गरमी ही नहीं, हर मौसम की अति, उस आने वाले खतरे की पहचान है जो हमारे बाद की कई पीढ़ियों को झेलनी पड़ सकती है.

    Tags: Global warming

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