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कोरोना से जंग: भारत और चीन के सामने फिसड्डी है अमेरिकी पब्लिक हेल्थ केयर सिस्टम

करीब 3 करोड़ अमेरिकियों के पास कोई हेल्थ इंश्योरेंश नहीं है. पूरी व्यवस्था प्राइवेट अस्पतालों के हाथों में है.

करीब 3 करोड़ अमेरिकियों के पास कोई हेल्थ इंश्योरेंश नहीं है. पूरी व्यवस्था प्राइवेट अस्पतालों के हाथों में है.

भारत और चीन की तरह अमेरिका के पास पब्लिक हेल्थ केयर सिस्टम की कोई व्यवस्था नहीं है. इलाज के लिए लोगों को महंगे प्राइवेट अस्पतालों के भरोसे रहना पड़ता है.

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    अमेरिका में कोरोना वायरस (Corona Virus) का कहर तेजी के साथ बढ़ रहा है. कोरोना की वैश्विक स्थिति के ताजे आंकड़े देने वाली वेबसाइट worldometers.info के मुताबिक अब तक अमेरिका में संक्रमित लोगों की संख्या 5000 के करीब पहुंचने वाली है. मृतकों की संख्या का आंकड़ा 90 के पार पहुंच चुका है. शुरुआत में इस संक्रमण को हल्के में लेने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप संदेह के कारण खुद की भी जांच करवा चुके हैं. उनकी बेटी इवांका ट्रंप सेल्फ आइसोलेशन में हैं. अमेरिकी वैज्ञानिक इस मर्ज के टीके का इजाद करने की घोषणा कर चुके हैं. लेकिन इन सब के बीच अगर अमेरिकी हेल्थ सिस्टम की बात की जाए तो पता चलता है कि वह बेहद दयनीय हालात में है और बेहद खर्चीला होने के साथ ही आम लोगों की पहुंच से बाहर है.

    अमेरिका स्थापित वैश्विक महाशक्ति है, लेकिन अगर उसके सामने चीन और भारत के हेल्थ केयर सिस्टम की बात की जाए तो ये कहीं बेहतर स्थिति में हैं. ऐसा नहीं है चीन और भारत के हेल्थ सिस्टम में खामियां नहीं हैं. विशेष रूप से भारत में बड़ी खामियां हैं. लेकिन फिर भी भारत के पास  सरकारी अस्पतालों की एक लंबी चेन है, जिसके जरिए इस महामारी से मुकाबला करने की कोशिश की जा रही है. चीन ने तो इसे पछाड़ने में अपने पूरी ताकत झोंक दी थी और इसमें पब्लिक हेल्थ केयर की बड़ी भूमिका है.

    कोरोना वायरस से पीडि़त होने के संदेह में तीन युवकों को आइसोलेशन वार्ड में भेजा गया है. On suspicion of suffering from Corona virus, three youths have been sent to isolation ward.

    ब्रिटिश अखबार द गार्जियन की एक रिपोर्ट में अमेरिकी पब्लिक हेल्थ केयर सिस्टम बखिया उधेड़ी गई हैंं. रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिजीज के डायरेक्टर डॉ. एंथनी एस फाउसी ने साफ किया है कि देश का सिस्टम कोरोना की त्रासदी के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है. उन्होंने कहा है कि हमें स्वीकार करना होगा कि हम अभी कोरोना के सामने फेल हो रहे हैं.

    दरअसल ये सच्चाई है जो जल्द ही दुनिया के सामने उजागर हो जाएगी कि अमेरिका के पास कोई पब्लिक हेल्थ केयर सिस्टम नहीं है. इसे कोरोना के संदर्भ में समझना होगा. अमेरिका में भी इस समय कोरोना वैसे ही फैल रहा है जैसे ये चीन के वुहान में फैला था. लेकिन इसके बाद चीन ने सरकारी अस्पतालों के जरिए इसके रोकने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी. लेकिन अमेरिका में तो प्राइमरी हेल्थ केयर से लेकर गंभीर रोगों तक का इलाज प्राइवेट सेक्टर के हाथों में ही है. ये प्राइवेट सेक्टर के अस्पताल प्रॉफिट के लिए काम करते हैं. साथ ही अमेरिका का हेल्थ केयर सिस्टम पूरी तरीके से इंश्योरेंस पर काम करता है. इलाज बेहद महंगा है. वहां प्राइवेट अस्पताल मुसीबत के वक्त भी आम लोगों की जरूरत के मुताबिक काम करने की बजाए प्रॉफिट को ध्यान में रखकर काम करते हैं.

    भारत, चीन या यूरोपीय देशों की तरह अमेरिका में पब्लिक शब्द से शुरू होने वाली सुविधाएं जैसे पब्लिक हेल्थ, पब्लिक एजूकेशन, पब्लिक वेलफेयर का मतलब है व्यक्तिगत जरूरत. यानी सरकार इसके लिए जिम्मेदार नहीं है. ये पूरी तरह से प्राइवेट सेक्टर के हाथों में है. शायद इसी वजह से इस समय अमेरिका में कोरोना वायरस का टेस्ट कराना भी काफी महंगा है. और इस को खर्च भी लोग अपनी जेब से दे रहे हैं. हालांकि सरकार ने यह घोषणा कर दी है कि कोरोना का टेस्ट फ्री में किया जाएगा.

    कोरोना वायरस केे कारण अमेरिका मेें अब तक 93 लोगों की मौत हो चुकी है. फोटो.एपी


    गार्जियन के एक लेख में कहा गया है कि अगर अमेरिका इस वक्त कोरोना का टीका बनाने में भी कामयाब हो जाएगा तो कोई ऐसा तंत्र नहीं है, जिससे ये करोड़ों लोगों को फायदा पहुंचा सके. इसका कारण ये है कि साल 2008 के बाद से राज्यों में मौजूद लोकल हेल्थ डिपार्टमेंट से बड़ी संख्या में छंटनी की जा चुकी है. ये डिपार्टमेंट कर्मचारियों की भारी कमी से जूझ रहा है.

    आंकड़ों के मुताबिक करीब 30 प्रतिशत अमेरिकी वर्कर्स के पास कोई सिक लीव नहीं होती है. ऐसे में अगर उसे कोरोना ने जकड़ा तो महंगे अस्पताल का खर्च उठाना मुश्किल हो जाएगा. इंश्योरेंस पर चलने वाली अमेरिकी व्यवस्था में करीब 3 करोड़ अमेरिकियों के पास कोई मेडिकल इंश्योरेंस नहीं है. यही वजह है कि ऐसे लोग एक बार इलाज के जाल में फंसते है तो फंसते चले जाते हैं.

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