माउंटबेटन की हत्या पर भारत में क्यों मना था 7 दिन का शोक?

भारत के विभाजन (India Partition) की अनिवार्य शर्त पर भारत की आज़ादी (India Independence) के सूत्रधार बनने वाले आखिरी वायसराय (Last Viceroy of India) का भारत से आखिर ऐसा क्या रिश्ता था कि उसकी मौत पर पूरा देश दुखी था?

News18Hindi
Updated: August 27, 2019, 1:22 PM IST
माउंटबेटन की हत्या पर भारत में क्यों मना था 7 दिन का शोक?
भारत के आखिरी वायसराय माउंटबैटन
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Updated: August 27, 2019, 1:22 PM IST
भारत के आखिरी वायसराय रहे माउंटबेटन जब छुट्टियों पर अपने परिवार के साथ घूमने निकले थे, तब 27 अगस्त 1979 को आयरिश उग्रवादियों ने उनकी नाव को एक बम धमाके से उड़ा दिया था, जिसमें लुइस माउंटबेटन और उनके दो पोते निकोलस व पॉल मारे गए थे. उनसे पहले उग्रवादियों ने 17 ब्रिटिश सैनिकों को भी मौत के घाट उतारा था. माउंटबेटन की हत्या की खबर दुनिया में आग की तरह फैली और भारत में उन्हें श्रद्धांजलि इस तरह दी गई थी कि 7 दिन का राजकीय शोक घोषित कर दिया गया था.

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असल में, भारत को आज़ादी यानी शक्तियां सौंपने के लिए ब्रिटिश सरकार ने आखिरी वायसराय के तौर पर माउंटबेटन को नियुक्त किया था और नेहरू व जिन्ना जैसे कई भारतीय नेताओं के साथ मिलकर माउंटबैटन ने ही भारत विभाजन और आज़ादी का मसौदा तैयार किया था. आज़ादी के बाद वह भारत के पहले गवर्नर जनरल के बतौर भी नियुक्त रहे थे. नेहरू समेत कई भारतीय नेताओं के साथ उनके दोस्ताना संबंध थे और कहा जाता है कि भारत की जनता अंग्रेज़ होने के बावजूद उन्हें सम्मान की नज़र से देखती थी. जानिए कि कैसे माउंटबैटन के मारे जाने पर भारत में शोक मना था.

7 दिन झुका रहा था तिरंगा

माउंटबेटन की हत्या की खबर आने के बाद भारत सरकार ने उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए देश में 7 दिन के राजकीय शोक की घोषणा की. स्कूलों व कई सरकारी संस्थानों में अवकाश घोषित कर दिया गया था और 7 दिन के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को आधा झुका दिया गया था. ये भारत में माउंटबेटन की लोकप्रियता का भी सूचक था और दुनिया भर के मीडिया में इसकी चर्चा भी हुई थी.

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माउंटबैटन के काफिले के साथ भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू.

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इंदिरा गांधी ने क्या कहा था?
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ माउंटबेटन के दोस्ताना संबंध हमेशा याद किए जाते रहे. नेहरू ने उनसे भारत के गवर्नर जनरल के पद पर बने रहने के लिए भी आग्रह किया था. माउंटबेटन की हत्या के समय अपने पिता के साथ उनके संबंधों को याद करते हुए देश की प्रधानमंत्री रह चुकीं इंदिरा गांधी ने कहा था :

गवर्नर जनरल रहते हुए उन्होंने उस समय की पेचीदा परिस्थितियों को लेकर पूरी संवेदना व समझ दिखाई थी. उनकी यही खूबी मेरे पिता के साथ, हमारे परिवार के साथ और कई भारतीय नेताओं के साथ उनकी दोस्ती की वजह थी. वे इतिहास के बेहतरीन जानकार थे और भारत की आज़ादी के वक्त उन्होंने हर कदम सावधानी से उठाया और छोटी से छोटी बात को तवज्जो दी. यही उनकी सफलता का सीक्रेट था. भारत ने अपना एक समर्पित दोस्त खो दिया.


माउंटबेटन को और नेताओं ने कैसे याद किया था?
उस वक्त भारत के कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे चौधरी चरण सिंह ने माउंटबैटन की हत्या की खबर के बाद कहा था :

ये हमारा उनके लिए प्यार था, उनकी निष्पक्षता के प्रति हमारा सम्मान था और भारत की आज़ादी को लेकर उनकी भावनाओं की कद्र थी कि आज़ादी के बाद पूरे देश ने उन्हें पूरे प्यार के साथ उन्हें पहले गवर्नर जनरल के तौर पर स्वीकारा था.


तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने माउंटबेटन की मौत पर शोक व्यक्त किया था. वहीं, पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने कहा था 'मेरा सौभाग्य रहा कि मैंने उन्हें व्यक्तिगत तौर पर जाना और मैं उनके साहस व बुद्धिमत्ता का हमेशा कायल रहा. वह बातचीत को नतीजे तक पहुंचाने की कला और हल निकालने में एक स्रोत बनने का हुनर बखूबी जानते ​थे.'

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नेहरू और जिन्ना व अन्य नेताओं के साथ माउंटबैटन.


क्यों रहा माउंटबेटन से देश को लगाव?
27 अगस्त 1979 के द गार्जियन के संस्करण में माउंटबेटन के भारत के साथ रिश्तों पर एक रिपोर्ट में कहा गया था कि जब आज़ादी के बाद वह गवर्नर जनरल रहे और 1948 में ब्रिटेन वापस लौटे, तब तक पूरे भारत से कई लोग उन्हें चिट्ठियां लिखकर मदद और सुझाव मांगा करते थे. ये भी कहा गया कि 1948 में ब्रिटेन लौटने के बाद भी भारत के साथ उनके रिश्ते खत्म नहीं हुए थे. उन्होंने जवाहरलाल नेहरू फंड की स्थापना करने के लिए मदद की थी और काफी फंड जुटाने की कवायद भी.

इसके साथ ही, माउंटबेटन ने भारतीय छात्रों के ब्रिटेन में पढ़ने के लिए रास्ते बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. हालांकि कुछ लोग देश में तब भी माउंटबेटन को 'अंग्रेज़ी राजशाही' के प्रतीक के तौर पर देखते थे, लेकिन कई लोगों के लिए माउंटबेटन भारत में अपने अंतिम समय के दौरान अनौपचारिक रूप से एक लोकपाल की तरह हो गए थे जो सीधे जनता के साथ जुड़े थे. मोरारजी देसाई के शब्दों में - 'आज़ादी के बाद अपने कारवां को आगे ले जाने में भारत को जिस तरह माउंटबैटन ने सहयोग देकर सक्षम बनाने में मदद की, वास्तव में देश के लिए वही उनकी विरासत है'.

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First published: August 27, 2019, 4:20 AM IST
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