Explained: दशकों बाद एकाएक वापस क्यों लौट रहे हैं अमेरिकी सैनिक?

अमेरिका से सेना की बहुतेरी टुकड़ियां युद्ध प्रभावित देशों में हैं - सांकेतिक फोटो

अमेरिका से सेना की बहुतेरी टुकड़ियां युद्ध प्रभावित देशों में हैं - सांकेतिक फोटो

आतंक के खात्मे के लिए दुनिया के 70 से ज्यादा देशों में अमेरिकी आर्मी (American army in foreign land to eliminate terrorism) तैनात रही. उनका खर्च अमेरिकी टैक्सपेयर (American taxpayer) को ही देना होता है. 

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 6, 2020, 1:31 PM IST
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अमेरिकी प्रशासन लगातार आतंक-प्रभावित देशों से अपनी सेनाओं को वापस बुला रहा है. ये फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने राष्ट्रपति काल के आखिरी समय में ले रहे हैं. यही वो वादा था, जिसके बूते ट्रंप ने साल 2016 का चुनाव जीता था. बता दें कि अमेरिका से सेना की बहुतेरी टुकड़ियां युद्ध प्रभावित देशों में हैं ताकि आतंक का मुकाबला कर सकें. अमेरिकी लोग इससे खास खुश नहीं.

क्या है ताजा मामला

हाल ही में ट्रंप ने सोमालिया से भी अपनी आर्मी को वापस बुलाने का फैसला सुनाया. अफ्रीकी देश सोमालिया में कई चरमपंथी समूह हैं, जिसमें इस्लामिक स्टेट (ISIS) जैसा खूंखार संगठन भी है. यहां अमेरिका के लगभग 700 सैनिक हैं. इनका काम चरमपंथियों से मुकाबले के अलावा स्थानीय सेना को उनके निपटने की ट्रेनिंग देना भी है.

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इराक और अफगान से भी सैनिक लौटेंगे

सोमालिया से पहले इराक और अफगानिस्तान से भी ट्रंप ने सेना की घर वापसी का एलान कर दिया था. इसपर उन देशों के अलावा पड़ोसी देशों में भी खलबली मच गई. राजनैतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी फौज की घर वापसी से पड़ोसी देशों में भूचाल आ सकता है.

इस्लामिक स्टेट (ISIS) के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के तहत इराक में करीब 5,000 अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं- सांकेतिक फोटो (pikist)




इराक का मुद्दा समझें तो फिलहाल आतंकवादी समूह इस्लामिक स्टेट (ISIS) के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के तहत इराक में करीब 5,000 अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं. इन सैनिकों को न केवल आतंक का सफाया करना था, बल्कि साथ ही साथ दोनों देशों में सैनिकों को आतंक से निपटने की ट्रेनिंग भी देनी थी.

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इराक पर हो सकता है ईरानी ताकतों का कब्जा

माना जा रहा है कि अगर अमेरिका सेना हटा लेता है तो इराक को नुकसान होगा, जिसका सीधा फायदा ईरान को मिलेगा. इस बारे में अलजजीरा मीडिया में छपी रिपोर्ट में वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट के फैलो डेविड पोलॉक कहते हैं कि अगर अमेरिका अपनी फौज को इराक में रहने दे तो मिडिल ईस्ट में उसकी स्थिति मजबूत रहेगी, जबकि उसके दुश्मन देश ईरान को आतंक मचाने का मौका नहीं मिल सकेगा.

वहीं अगर फौज देश छोड़ दे तो ईराक सीधे ईरान के हाथों में जा सकता है. बता दें कि इराक में कताइब हिजबुल्लाह संगठन सक्रिय है, जिसे शिया देश ईरान से भारी मदद मिलती है.

जनता का मानना है कि अमेरिकी सैनिक बेवजह ही दशकों से युद्ध के हालात में रखे गए- सांकेतिक फोटो (flickr)


यही हाल अफगानिस्तान में भी

साथ ही साथ अफगानिस्तान से भी अमेरिकी फौजें हटाई जाने लगी हैं. मालूम हो कि वर्तमान में करीब 14 हजार अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में तैनात हैं. पाकिस्तान की इमरान सरकार को डर है कि अमेरिकी सैनिकों के हटने के बाद आतंकी मजबूत हो जाएंगे और पाकिस्तान में आतंक फैलाएंगे. बता दें कि पाक और अफगानिस्तान लगभग 2500 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करते हैं जिसे डूरंड रेखा कहते हैं. इस सीमा पर और आसपास आए-दिन तनाव होते रहते हैं.

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तब क्यों बुलाया जा रहा है वापस

अगर सैनिकों से लौटने से देशों में इतनी अस्थिरता आ सकती है तो ट्रंप सरकार क्यों उन्हें वापस बुला रही है. इसका जवाब है अमेरिकी जनता का असंतोष. जनता का मानना है कि अमेरिकी सैनिक बेवजह ही दशकों से युद्ध के हालात में रखे गए हैं. साथ ही इस असंतोष की एक और वजह ये भी है कि विदेशी जमीन पर सैनिकों की तैनाती का ज्यादातर खर्च अमेरिकी लोगों से टैक्स के तौर पर वसूला जाता है.

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इतना भरना होता है टैक्स

शोध करने वाली संस्था RAND कॉर्पोरेशन के मुताबिक अमेरिकी टैक्सपेयर सालाना 10000 से 40000 डॉलर के लगभग टैक्स इसी मकसद से देते हैं. इनमें अमेरिका से विदेशी धरती, जहां सैनिक तैनात होंगे, वहां जाना, रहना, खाना, अस्पताल और अगर परिवार साथ हो, तो बच्चों के स्कूल का खर्च भी अमेरिकी टैक्सपेयर को देना होता है. जबकि इसका बहुत छोटा हिस्सा होस्ट देश देता है.

विदेशी जमीन पर सैनिकों की तैनाती का ज्यादातर खर्च अमेरिकी लोगों से टैक्स के तौर पर वसूला जाता है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


मानवीय समस्याएं भी काफी ज्यादा

पैसों के अलावा सैनिकों को कई मानवीय समस्याओं से भी जूझना पड़ता है. जैसे चरमपंथी समूह कभी भी उनपर हमला कर देते हैं. अक्सर ये भी देखा गया है कि स्थानीय लोग चरमपंथियों के बहकावे में आकर अमेरिकी सैनिकों को दुश्मन की तरह देखते हैं. इस तरह से सैनिक विदेशी धरती पर एकदम अकेले पड़ जाते हैं. साथ में अगर परिवार हो तो उनपर भी खतरा रहता है और अगर अमेरिका में रहें तो भी अकेलापन झेलना पड़ता है.

दुनिया में अमेरिका के 800 मिलिट्री बेस

ये समस्याएं ज्यादा बड़ी इसलिए भी हैं क्योंकि अमेरिकी सेना एक या दो देशों में ही तैनात नहीं, बल्कि दुनिया के 70 से ज्यादा देशों में है. पॉलिटिको की एक रिपोर्ट के मुताबिक इन देशों में उसके 800 के लगभग मिलिट्री बेस हैं. दूसरी तरफ ब्रिटेन, फ्रांस और रूस- इन तीनों देशों के सैनिक कुल मिलाकर 30 देशों में तैनात हैं. यही बात अमेरिकियों के बीच गुस्से और असंतोष का कारण बनती रही.
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