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तीस हजारी कोर्ट हिंसा: इस वजह से वकीलों से डरते हैं पुलिसवाले?

News18Hindi
Updated: November 7, 2019, 2:26 PM IST
तीस हजारी कोर्ट हिंसा: इस वजह से वकीलों से डरते हैं पुलिसवाले?
पुलिस वकीलों पर चढ़ने की शुरुआत नहीं करती (प्रतीकात्मक फोटो)

Delhi Police-Lawyers Conflict: वकीलों और पुलिसवालों को आमतौर पर साथियों की तरह देखा जाता है. लेकिन पहली बार दोनों में भिड़ंत की इतनी चर्चा हो रही है.

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  • Last Updated: November 7, 2019, 2:26 PM IST
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2 नवंबर की दोपहर तीस हजारी कोर्ट (tis hazari court) में वकीलों और पुलिस शुरू विवाद अब भी जारी है. एक दिन पहले 6 नवंबर को दिल्ली हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई हुई. हालांकि, मामला अब भी गरमाया हुआ है. वकीलों की हड़ताल और पुलिसवालों से कथित मारपीट के बाद गुस्साई पुलिस ने भी धरना-प्रदर्शन किया. साथ ही साथ वे कई नारे लगा रहे थे, जैसे काला कोट, हाय-हाय और हम पुलिस वाले हैं, गुलाम नहीं.

पुलिस की प्रतिक्रिया पर राय जताते हुए जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने कहा कि पहले लगता था कि पुलिसवाले राजनेताओं के अलावा किसी से नहीं डरते, लेकिन ये जानकर हैरत हो रही है कि उन्हें शायद वकीलों से भी डर लगता है. वकीलों के पास तो डंडे या गन नहीं हैं, फिर उनसे डरने की क्या वजह हो सकती है? पुरानी घटनाओं के हवाले से काटजू कहते हैं कि इससे पहले भी अगर पुलिस ने वकीलों पर लाठियां चलाई हैं, तो शुरुआत वकीलों की तरफ से ही हुई होती है, जैसे पुलिस पर पथराव या मारपीट करना. पुलिस चाहे तो जवाबी कार्रवाई कर सकती है, लेकिन कभी भी पुलिस की तरफ से हिंसा की शुरुआत नहीं हुई.

साकेत और कड़कड़डूमा कोर्ट परिसर में वकीलों के पुलिसवालों पर चढ़ने के हवाले से काटजू कहते हैं कि पुलिस वकीलों पर चढ़ने की शुरुआत नहीं करती, तो इसकी वजह शायद वो हथियार है जो वकीलों के पास होता है- आपराधिक शिकायत (criminal complaint).

'वकीलों की रचनात्मकता भी सरकारी लोगों को डराती है'


यही वो वजह है जिससे पुलिस बुरी तरह से डरती है. भारत में एक आपराधिक मामला दो तरीकों से दर्ज हो सकता है- एक तो है एफआईआर ( first information report) और दूसरा तरीका है धारा 200 Cr.P.C के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज करना.

पुलिस एफआईआर से तो डरती नहीं है क्योंकि ये उनके या उनकी ही बिरादरी के लोगों के अधीन होता है. यानी यहां मामला 'मैनेज' किया जा सकता है. वहीं, न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत जाना पूरी तरह से अलग मामला है. यहां मामला न्यायाधीश के समाने होता है और वे और वकील एक बिरादरी से हैं. ऐसे में हो सकता है कि मजिस्ट्रेट की संवेदना वकीलों के पक्ष में हो, क्योंकि दोनों का अक्सर मिलना-जुलना होता है.

जब मजिस्ट्रेट के सामने पुलिस द्वारा किसी वकील पर अन्याय की शिकायत मिले तो चाहे शिकायत सच्ची हो, या मनगढ़ंत, वो धारा 204 Cr.P.C के तहत अभियुक्तों को समन जारी करेगा. इसके बाद मुकदमा शुरू होगा, जिसका अंत पुलिस के जेल जाने या उसके करियर के खत्म होने पर खत्म हो सकता है. जैसे ही समन जारी होता है, इन संभावनाओं की शुरुआत हो जाती है. तो शायद यही वजह है जो पुलिस वकीलों से डर जाती है.
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काटजू घटना के बारे में आगे बताते हुए कहते हैं कि वकीलों की रचनात्मकता भी सरकारी लोगों को डराती है. मिसाल के तौर पर एक घटना लें-

जब मैं इलाहाबाद हाईकोर्ट (1971-91) में प्रैक्टिस किया करता था, तब इलाहाबाद जिला न्यायालय के एक वरिष्ठ वरिष्ठ वकील थे. वकालत का लंबा-चौड़ा अनुभव होने के बावजूद न उन्होंने कभी आयकर रिटर्न (income tax returns) भरा और न ही कभी आयकर का भुगतान किया. एक बार एक ईमानदार और जवान आयकर अधिकारी की शहर में तैनाती हुई. उन्होंने फलां वकील को उनके सामने आने के लिए नोटिस दिया.

भारत में एक आपराधिक मामला दो तरीकों से दर्ज हो सकता है


वकील के आने पर अधिकारी ने कहा- आपके बारे में हर कोई जानता है कि आप इलाहाबाद जिला न्यायालय के काफी नामी-गिरामी वकील हैं. तब भी आप न रिटर्न दाखिल नहीं करते हैं और न कभी आयकर देते हैं. कहने के बाद अधिकारी ने वकील पर टैक्स और पेनल्टी की भारी रकम लगा दी. वकील दलील देने लगे कि वो एक गरीब वकील हैं, जिनकी प्रैक्टिस बिल्कुल नहीं चलती है. इतने भारी जुर्माने से वे बर्बाद हो जाएंगे. उनके कहने का कोई फायदा नहीं हुआ.

कहानी अभी खत्म नहीं हुई. आगे काटजू बताते हैं कि थोड़े दिनों बाद आयकर अधिकारी को एक वकील (वो वकील नहीं, जिसपर जुर्माना लगा था) की तरफ से एक चिट्ठी मिली. इसके लिखा था कि उक्त अधिकारी ने उनकी एक महिला क्लाइंट से शादी का झूठ वादा किया और अब महिला उसके बच्चे की मां बन चुकी है. बच्चे के लिए अधिकारी को भारी मुआवजा देना होगा, या फिर रेप के आरोप में कानूनी कार्रवाई होगी.

अधिकारी सदमे में था. उसके कभी किसी महिला से ऐसे संबंध नहीं थे. वो एक वकील के पास पहुंचा. उसने अधिकारी को उसी सीनियर वकील के पास जाने की सलाह दी. आखिरकार अधिकारी उस वकील के पास पहुंचा और जुर्माना लगाने के लिए माफी मांगी. दोनों के बीच करार हुआ. अधिकारी ने सीनियर वकील पर से जुर्माना हटा लिया और तब अधिकारी पर लगा इलजाम भी वापस ले लिया गया.
(ये लेख सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के पूर्व जज जस्टिस मार्कंडेय काटजू के विचारों पर आधारित है.)

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First published: November 7, 2019, 12:54 PM IST
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