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नागरिकता बिल को लेकर असम के हिंदू इलाकों में क्यों हो रहा है विरोध?

Vivek Anand | News18Hindi
Updated: December 12, 2019, 1:23 PM IST
नागरिकता बिल को लेकर असम के हिंदू इलाकों में क्यों हो रहा है विरोध?
असम में नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध हो रहा है

नागरिकता संशोधन बिल (Citizenship Amendment Bill) को लेकर असम (Assam) में सबसे ज्यादा विरोध प्रदर्शन जोरहाट, शिवसागर, डिब्रूगढ़ और गुवाहाटी में हुए हैं. ये सभी हिंदु बहुल (Hindu dominated) इलाके हैं...

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  • Last Updated: December 12, 2019, 1:23 PM IST
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असम (Assam) में नागरिकता संशोधन बिल ( Citizenship Amendment Bill ) को लेकर हंगामा मचा है. नए नागरिकता कानून का सबसे ज्यादा विरोध असम में हो रहा है. वहां के हालात चिंताजनक हो गए हैं. गुवाहाटी (Guwahati) और डिब्रूगढ़ (Dibrugarh) में कर्फ्यू लगाना पड़ा है. कई इलाकों में आगजनी और पथराव की घटनाएं हुई हैं.

हालात इतने बिगड़ गए हैं कि प्रधानमंत्री मोदी को वहां के लोगों को भरोसा दिलाने के लिए कहना पड़ा है कि वो असम के नागरिकों के अधिकारों पर आंच नहीं आने देंगे. प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट करके कहा कि असम के लोगों के राजनीतिक, भाषाई, सांस्कृतिक और जमीनी अधिकारों की सुरक्षा के लिए सरकार वचनबद्ध है. पीएम मोदी ने कहा है कि मैं असम के सभी भाई बहनों को आश्वस्त करना चाहता हूं कि उन्हें नागरिकता संशोधन बिल के पास होने के बाद किसी भी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है.

असम के हिंदू बहुल इलाकों में हो रहे हैं विरोध प्रदर्शन
असम के हालात सामान्य नहीं हैं. हैरान करने वाली बात ये है कि असम के हिंदू बहुल इलाकों में सबसे ज्यादा विरोध प्रदर्शन हो रहा है. आमतौर पर नए नागरिकता कानून को हिंदुओं का पक्षधर कहके प्रचारित किया जा रहा है. लेकिन असम के हिंदू इसके विरोध में हैं. सबसे ज्यादा उग्र प्रदर्शन हिंदू इलाकों में हुए हैं, जबकि मुस्लिम इलाकों में शांतिपूर्ण विरोध हो रहा है.

नॉर्थ ईस्ट में नए नागरिकता कानून को कोई भी एंटी मुस्लिम मानने को तैयार नहीं है. उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि इससे हिंदुओं का फायदा होगा या नहीं. वो बस इस बिल के विरोध में हैं. असम के हिंदू बहुल ब्रह्मपुत्र वैली में सबसे ज्यादा उग्र विरोध प्रदर्शन हुए हैं. बंद के दौरान ब्रह्मपुत्र वैली में प्रदर्शनकारियों ने सरकारी संपत्ति का काफी नुकसान किया है. पत्थरबाजी और आगजनी की कई घटनाएं हुई हैं. यहां तक की बीजेपी नेताओं और उनके घरों पर हमले हुए हैं. अपने घरों से निकलकर हजारों लोग विरोध प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतरे हैं.

असम में सबसे ज्यादा विरोध प्रदर्शन जोरहाट, शिवसागर, डिब्रूगढ़ और गुवाहाटी में हुए हैं. ये सभी हिंदु बहुल इलाके हैं. इसी तरह त्रिपुरा के हिंदू भी इस बिल का विरोध कर रहे हैं. त्रिपुरा में करीब 84 फीसदी हिंदू हैं. मुसलमानों की आबादी यहां सिर्फ 9 फीसदी है. त्रिपुरा में भी जबरदस्त विरोध चल रहा है.

Why is there protest in the hindu areas of assam over the citizenship amendment bill
बुधवार को असम में CAB के खिलाफ प्रदर्शन करती उग्र भीड़ (फोटो- PTI)
बिल के विरोध में क्या कहते हैं हिंदू समुदाय के लोग?
इन इलाके के हिंदुओं का कहना है कि बात हिंदू मुसलमान की नहीं है. इस बिल के बाद बाहरी लोगों को यहां की नागरिकता मिल जाने की वजह से उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा. असम का हिंदुइज्म भी देश के दूसरे हिस्सों से अलग है. वहां के हिंदू 16वीं सदी के वैष्णव संत श्रीमंत शंकरदेव की धार्मिक प्रेरणा के मुताबिक चलते हैं. वो बाहरी हिंदू और मुसलमान दोनों को अपनी पहचान के लिए खतरा मानते हैं.

असम के लोगों को लगता है कि बाहरी लोगों को यहां की नागरिकता मिल गई तो यहां की डेमोग्राफी, भाषा और संस्कृति सब नष्ट हो जाएगी. ये लोग असमी अस्मिता के नाम पर लड़ाई लड़ रहे हैं. इन्हें लगता है कि नया नागरिकता कानून बन जाने के बाद असमी भाषा से ज्यादा बांग्ला बोलने वाले हो जाएंगे. ये उनकी सांस्कृतिक विरासत पर सबसे बड़ी चोट होगी.

असम के लोगों के बीच नागरिकता बिल को लेकर कंफ्यूजन
असम के लोग चिंताग्रस्त हैं. उनमें कई तरह के कंफ्यूजन हैं. उन्हें लगता है कि नया नागरिकता कानून लागू होने के बाद लाखों लोग यहां रहने आ जाएंगे. उन्होंने इस बात की कल्पना कर ली है कि बांग्लादेशियों के लिए यहां के दरवाजे खुल जाएंगे और वहां से लाखों लोग यहां अपना ठिकाना जमा लेंगे.

असम के लोग ये नहीं समझ पा रहे हैं कि नए नागरिकता कानून के मुताबिक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के सिर्फ वही हिंदू, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं, जो 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत में आ चुके हों. असम के लोगों में नागरिकता कानून को लेकर कई तरह की गलतफहमी और भ्रम है.

बाहरी लोगों को खिलाफ पहले भी हुए हैं विरोध प्रदर्शन
असम में बाहरी घुसपैठ को लेकर पहले भी उग्र आंदोलन हुए हैं. अस्सी के दशक में असम से बाहरी लोगों को निकालने के लिए तेज आंदोलन उठा था. आंदोलन इतना जबरदस्त था कि सरकार को अवैध घुसपैठियों को हिरासत में लेने के लिए एक एक्ट बनाना पड़ा. हालांकि बाद में Illegal Migrants Detection Act (IMDT) को 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने हटा दिया.

Why is there protest in the hindu areas of assam over the citizenship amendment bill
नॉर्थ ईस्ट के राज्य नागरिकता संशोधन बिल का विरोध कर रहे हैं


इसके बाद असम में बाहरी घुसपैठियों की पहचान के लिए नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन यानी एनआरसी आया. पिछले दिनों इसके फाइनल लिस्ट से 19 लाख लोग बाहर रह गए. हालांकि ये पता नहीं है कि इसमें कितने हिंदू हैं और कितने मुसलमान.

असम में बड़ी संख्या में हैं बाहरी लोग
असम में बड़ी संख्या में बांग्लादेश से भागकर आए हिंदू और मुसलमान समुदाय के लोग हैं. लेकिन इनकी सही संख्या के बारे में अंदाजा नहीं लगाया जा सका है. भाषाई आधार पर इनकी पहचान की गई है. 2011 की जनगणना के मुताबिक असम में 90 लाख बांग्ला भाषा बोलने वाले लोग रहते हैं. जबकि असमी बोलने वाले लोगों की संख्या 1.5 करोड़ है. 90 लाख बांग्ला भाषा बोलने वालों में कितने हिंदू और कितने मुसलमान हैं, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता.

2001 की जनगणना के मुताबिक असम में बांग्ला भाषा बोलने वालों की संख्या 73 लाख थी. वहीं असमी भाषा बोलने वाले लोग 1.3 करोड़ थे. दोनों भाषा बोलने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है. लेकिन असमी लोगों को लगता है कि जिस हिसाब से बांग्ला भाषा बोलने वाले बढ़ रहे हैं, उसमें वो थोड़े वर्षों में अल्पसंख्यक की कैटेगरी में आ जाएंगे. इसलिए वो अस्सी के दशक से हिंदू और मुसलमान सभी तरह के शरणार्थियों और अवैध घुसपैठियों को बाहर निकालने का आंदोलन चला रहे हैं.

असम में अंग्रेजों के वक्त से बाहरी घुसपैठ का संकट
असम के भीतर ये संकट अंग्रेजों के वक्त से चला आ रहा है. अंग्रेजों ने 1826 में असम का अधिग्रहण किया था. उस वक्त पश्चिम बंगाल से काफी सारे बांग्ला बोलने वाले लोग सरकारी दफ्तरों में क्लर्क का काम करने के लिए असम आने लगे. बताया जाता है कि उनलोगों ने अंग्रेज अफसरों को ये समझाया कि असमी भाषा, बांग्ला भाषा का ही एक रूप है और दोनों में ज्यादा अंतर नहीं है. नतीजा ये हुआ कि बांग्ला भाषा को वहां की आधिकारिक भाषा घोषित कर दी गई.

Why is there protest in the hindu areas of assam over the citizenship amendment bill
नागरिकता बिल के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों के मद्देजनर सेना को तैनात किया गया है.. (AP Photo)


1873 में जाकर असमी भाषा को उसका सही स्थान मिला और वो असम की आधिकारिक भाषा बनी. तभी से असम के लोग बांग्ला भाषा बोलने वालों से सशंकित रहते हैं. असमियों के बीच हमेशा ये डर बना रहता है कि बंगाली लोग राज्य पर अपना प्रभुत्व कायम कर लेंगे.

कुछ आंकड़ें भी बंगालियों के बढ़ते प्रभुत्व की गवाही देते हैं. एक आंकड़े के मुताबिक 1991 से 2001 के बीच असमी बोलने वाले लोगों की संख्या 58 फीसदी से घटकर 48 फीसदी रह गई. वहीं इस दौरान बांग्ला बोलने वाले 22 परसेंट से बढ़कर 30 परसेंट हो गए. असम के मूल निवासियों को लगता है कि नया नागरिकता कानून लागू होने के बाद राज्य में बंगालियों की संख्या उनसे ज्यादा हो जाएगी. इसलिए वो सड़कों पर उतर आए हैं.

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First published: December 12, 2019, 1:23 PM IST
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