चीन में अब पेट्रोल वाहन खरीदने पर क्यों होती है लंबी वेटिंग

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Updated: September 9, 2019, 4:34 PM IST
चीन में अब पेट्रोल वाहन खरीदने पर क्यों होती है लंबी वेटिंग
चीन में पेट्रोल की कार खरीदना अब इतना जटिल हो गया है कि लोग इसे खरीदने से दूर हो रहे हैं

चीन अपने यहां पेट्रोल-डीजल से चलने वाले वाहनों की फैक्ट्रियां बंद कर रहा है. जितनी तेजी से चीन ने पूरे देश में बिजली के वाहनों का संजाल और चार्जिंग स्टेशन बिछा दिया है, वो वाकई हैरान करने वाला है

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भारत सरकार चाहती है कि देश की सड़कों पर अब आने वाले बरसों में केवल इलैक्ट्रिक वाहन ही दौड़ें. सरकार ने इसकी समयसीमा तय कर दी है. चार साल बाद सड़कों पर पेट्रोल से चलने वाले तिपहिया वाहन दिखेंगे भी नहीं. अगर सरकार ने सही तरीके से इस पर काम जारी रखा तो 2023 तक सड़कों पर कोई भी तिपहिया वाहन पेट्रोल, डीजल या सीएनजी से नहीं चलेगा बल्कि वो केवल बैटरी से चलेगा. लेकिन चीन इस मामले में बहुत आगे निकल चुका है. वहां अब सामान्य शख्स पेट्रोल के वाहन खरीदने के बारे में सोच ही नहीं सकता जबकि उसके लिए बिजली के वाहन खरीदना खासा आसान हो चुका है.

हालांकि भारत सरकार भी इसी दिशा में काम कर रही है. वो चाहती है कि 2025 तक सारे दोपहिया वाहन बैटरी पर आ जाएं. कार और वाहन निर्माताओं को इसके लिए सरकार इसके लिए प्रोत्साहन और मदद भी देगी. ताकि वो इलैक्ट्रिक मॉडल ला सकें.

क्या ये इतना आसान होगा. क्वार्ट्ज डॉट कॉम के साथ बातचीत में थिंक टैंक और कौंसिल आन एनर्जी, एनवायरोमेंट एंड वाटर के सीईओ अरुनाभ घोष कहते हैं कि इसके लिए मजबूत पॉलिसी की जरूरत होगी, क्योंकि यहां अच्छे आइडिया और पॉलिसी सही जगह पहुंचने से पहले ही रास्ते में ढेर हो जाती हैं.

क्या किया था एलन मस्क और चीन ने

एलन मस्क 2008 में टेसला के सीईओ बने. तब टेसला ने करीब 1000 कारें बनाईं. ये सभी इलैक्ट्रिक से चलने वाली थीं. ठीक इसी समय चीन में वॉन गैंग को साइंस मिनिस्टर बनाया गया. वो एक ऑटो इंजीनियर हैं, जो जर्मनी में ऑडी के साथ काम कर चुके हैं. इसके बाद वो चीन आ गए. उस समय करीब 1000 इलेक्ट्रिक कारें बना रहा था. पिछले साल टेसला ने एक लाख 80 हजार इलैक्ट्रिक कारें बनाईं लेकिन ये उनके लिए आसान नहीं थी. वहीं इसी समय में चीन करीब 13 लाख बिजली की कारें बना डालीं.

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चीन रोज बचा रहा है तीन लाख बैरल तेल
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चीन ने बिजली की कारों के निर्माण में बहुत मोटा पैसा लगा रखा है. मस्क का कहना है कि आने वाले समय में इलैक्ट्रिक कारें ही पेट्रोल और जीवाश्म ईंधन
वाली कारों की जगह लेंगी. चीन ने तो बड़े पैमाने पर इलैक्ट्रिक बसों का इस्तेमाल शुरू भी कर दिया है, जिससे उसे रोज तीन लाख बैरल तेल की रोज बचत हो रही है. मतलब ये हुआ कि वो हर साल तेल में अपना खर्च पांच बिलियन डॉलर कम करने में सफल हो चुका है.

चीन के ज्यादातर शहरों में अब पेट्रोल से कहीं ज्यादा बिजली से चलने वाले वाहन हैं


चीन में इसकी सफलता की वजह अगर साइंस मंत्री वॉन की कोशिशें हैं तो सरकार की दमदार नीतियां भी. माना जा रहा है कि आने वाले समय में चीन इलैक्ट्रिक वाहनों के मामले में दुनिया में सबसे आगे होगा.
चीन में सरकार बिजली वाहन और उनके कलपुर्जे बनाने वालों को सब्सिडी दे रही है. साथ ही बड़े पैमाने पर पूरे देश में चार्जिंग स्टेशन के प्लेटफॉर्म बिछा रही है.

चीन बंद कर रहा है पेट्रोल से वाहन बनाने वाले फैक्ट्रियां 

पिछले साल सितंबर में चीन के एक अधिकारी ने आटोमोबाइल कांफ्रैंस में बताया कि चीन योजना बना रहा है कि उन सभी वाहन निर्माता फैक्ट्रियों को बंद कर दिया जाए, जो केवल जीवाश्म ईंधन आधारित वाहन बना रही हैं. अब चीन किसी भी ऐसी वाहन कंपनी को वाहन बनाने की इजाजत नहीं देगा जो बिजली के वाहन नहीं बना रहा हो, क्योंकि चरण बद्ध तरीके से पेट्रोल, डीजल या सीएनजी से चलने वाली वाहन के निर्माण बंद कर दिया जाएगा.

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अब चीन में आटोमोबाइल कंपनियां अपने ज्यादातर मॉडल इलेक्ट्रिक के ही लेकर आ रही हैं. पिछले साल बीजिंग आटो शो में चीन की कंपनियों ने अपने दस नए मॉडलों में सात इलेक्ट्रिक बेस मॉडल पेश किए. पिछले साल चीन ने करीब दस लाख बिजली के वाहन बेचे, जो दुनिया में सबसे ज्यादा हैं.

चीन में पेट्रोल वाहन खरीदना अब मुश्किल
अगर आज कोई शख्स चीन में पेट्रोल का वाहन खऱीदना चाहता, तो उसे ये मिलने में आठ साल लग जाएंगे लेकिन अगर कोई वहां इलैक्ट्रिक व्हीकल खऱीदना चाहे तो ये उसे बहुत आसानी से मिल जाएगा, ये प्रक्रिया बहुत आसान है जबकि पेट्रोल का वाहन खरीदने के लिए उसे तमाम बाधाओं और प्रक्रिया से गुजरना होगा.




चीन में अब कार कंपनियां जब अपने नए मॉडल बाजार में उतारती हैं तो उनमें इलेक्ट्रिक मॉडल ज्यादा होते हैं


भारत के लिए कितना आसान
भारत के लिए ये बड़ा कदम होगा लेकिन भविष्य को देखते हुए उसे ये करना ही होगा. क्योंकि दुनियाभर में इस पर काम शुरू हो गया है. भारत को भी इस ओर पूरी तरह बढना ही होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत इसमें कोताही दिखाता है तो उसे अभी नहीं लेकिन भविष्य में मोटा नुकसान होगा. हो सकता है कि अभी भारत को इलैक्ट्रिक वाहन इंडस्ट्री के तौर पर कायाकल्प करने में 5000-6000 करोड़ रुपयों का नुकसान हो लेकिन 2030 तक पूरी दुनिया उस ओर जा चुकी होगी और तब हमें ऐसी इंडस्ट्री तैयार करने के लिए अतिरिक्त 20 हजार करोड़ रुपयों की जरूरत होगा.

पूरे दिल्ली में 2023 तक हरओर चार्जिंग स्टेशन
दिल्ली में सरकार 2023 तक बिजली वाहनों के मद्देनजर चार्जिंग स्टेशन बनाना चाहती है, जो रोज 2500 इलैक्ट्रिक वाहनों को दिल्ली की सड़कों पर चलने के लिए चार्ज कर सकें. भारत में फिलहाल मात्र 150 चार्जिंग स्टेशन ही हैं.

चीन में कितने चार्जिंग स्टेशन
भारत में जहां अभी इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने को लेकर अभी बहस ही चल रही है, वहीं चीन में इलेक्ट्रिक कार चार्जिंग स्टेशंस की संख्या 10 लाख को पार गई है. इससे पहले चीन में पिछले महीने ही इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री का आंकड़ा 12 लाख को पार कर गया है.

भारत में कैसे बनाए जाएंगे चार्जिंग स्टेशन
इस योजना को दो फेज में तैयार किया जाएगा. पहले फेज में सभी नौ मेगा शहरों-मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरू, हैदराबाद, अहमदाबाद, चेन्नई, कोलकाता, सूरत और पुणे- और एक्सप्रेसवे और उनसे जुड़े महत्वपूर्ण राजमार्गों को कवर किया जाएगा. इसमें मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे, अहमदाबाद-वडोदरा, दिल्ली-आगरा यमुना एक्सप्रेसवे, दिल्ली-जयपुर, बेंगलुरु-मसूरु और बेंगलुरु-चेन्नई जैसे गलियारे शामिल हैं.
दूसरे फेज में राज्य, राजधानियों, संघीय क्षेत्र मुख्यालयों और उनसे जुड़े राजमार्गों को कवर करेगा. मंत्रालय इस रोलआउट को सुविधाजनक बनाने के लिए केंद्रीय नोडल एजेंसी को नामित करेगा, जबकि राज्यों की अपनी नोडल एजेंसियां ​​हो सकती हैं.

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First published: September 9, 2019, 4:34 PM IST
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