जापान ने नेताजी सुभाष चंद बोस के निधन की खबर पांच दिनों तक क्यों छिपाकर रखी

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: August 20, 2019, 11:10 PM IST

अगर नेताजी (Subhas Chandra Bose) का हवाई हादसे (Plane Crash) में निधन इतने सालों बाद भी एक रहस्य ही तरह है तो ये भी किसी रहस्य से कम नहीं कि अगर बोस का निधन 18 अगस्त 1945 को प्लेन एक्सीडेंट में हुआ तो जापान ने पूरी दुनिया को इस बारे में बताने के लिए पांच दिनों का समय क्यों लिया

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अगर तारीखों पर जाएं और जापान (Japan) सरकार द्वारा जारी रिकॉर्डों की बात करें तो नेताजी सुभाष चंद बोस (Subhas Chandra Bose) का विमान 18 अगस्त को ताइपे (Taipei) के तोइहोकु एयरपोर्ट पर दुर्घटनाग्रस्त हुआ और कुछ ही घंटों बाद अस्पताल में नेताजी का निधन हो गया. लेकिन ये बड़ा सवाल है कि नेताजी के निधन की खबर को जापान ने पांच दिनों तक क्यों छिपाया. इन पांच दिनों में जापान में सुभाष को लेकर क्या-क्या होता रहा.

जब 23 अगस्त को जापान की सरकारी एजेंसी डोमेई ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के निधन की खबर जारी की तो इस पर किसी ने भरोसा नहीं किया. भारत के अखबारों में ये खबर लंदन डेटलाइन से छपी. कोलकाता में तब छपने वाले हिंदुस्तान स्टैंडर्ड ने 24 अगस्त 1945 के अंक में सुर्खियों में ये खबर प्रकाशित की. इस खबर में कहा गया था कि एक जापानी न्यूज एजेंसी ने सुभाष चंद्र बोस के निधन की खबर की घोषणा की है. खबर के दूसरे पैरे में कहा गया था कि एक विमान दुर्घटना में नेताजी को गंभीर चोटें आईं और फिर अस्पताल में उनका निधन हो गया.

खबर के अनुसार नेताजी का निधन ताइहोकु में दोपहर दो बजे बताया गया. इस खबर को भारत के सभी अखबारों ने सुर्खियों में प्रकाशित किया. लेकिन ये सवाल आज भी है कि जब नेताजी का निधन 18 अगस्त की रात तोइहोकु में ही बताया गया तो अगले पांच दिनों में क्या होता रहा, जो जापान सरकार ने इस खबर की कानोकान भनक भी नहीं लगने दी. आखिरकार 23 अगस्त को जापानी न्यूज एजेंसी ने इसे प्रसारित किया. नेताजी के निधन की खबर में इतनी देरी पर हर किसी ने हैरानी जाहिर की क्योंकि ऐसा आमतौर पर होता नहीं है.

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आइए रिकॉर्ड्स के अनुसार देखते हैं कि 18 अगस्त से 23 अगस्त तक क्या होता रहा, जब तक की नेताजी के निधन की खबर प्रसारित नहीं कर दी गई.  इसे इतना गुप्त क्यों रखा गया.

18 अगस्त 1945
नेताजी का विमान 18 अगस्त को सुबह पांच बजे सैली फारमोसा के लिए रवाना हुआ. दोपहर तक तोईहोकू (ताइपे) एयरपोर्ट पहुंचा. वहां यात्रियों ने हल्का-फुल्का लंच लिया. बताया जाता है जैसे ही ये विमान ताइहोकु रन-वे से थोड़ा ही ऊपर उठा, इसने आग पकड़ ली और ये नीचे आने लगा. नीचे गिरते ही वो दो टुकड़ों में टूट गया.
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शाहनवाज रिपोर्ट भी कहती है कि विमान ज्योंही उड़ा. मुश्किल से 30-40 मीटर जाते ही वो नियंत्रण खो बैठा. 50 मीटर की ऊंचाई से विमान तीन सेकेंड में जमीन पर आ गिरा.

जापान की सरकारी न्यूज एजेंसी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के निधन की खबर 23 अगस्त 1945 को प्रसारित की, जबकि इसी खबर में खबर में कहा गया था कि उनका निधन 18 अगस्त को हो चुका है


बोस पेट्रोल टैंक के पास ही बैठे थे. बोस को स्थानीय सैन्य अस्पताल ले जाया गया. जब तक वो वहां पहुंचे तब तक तीन बज चुके थे. थर्ड डिग्री बर्न के बाद उनकी हालत गंभीर थी. फिर उनकी हालत बिगड़ने लगी. शाम सात बजे वह अचेत हो गए. फिर कोमा में चले गए. उनका निधन 18 अगस्त की रात में बताया गया.

19 अगस्त 1945
सुभाष के निकट सहयोगी कर्नल हबीबुर्रहमान उस समय उनके साथ थे. रहमान ने शाहनवाज आयोग को बताया कि निधन के बाद स्थानीय स्तर पर ताबूत की व्यवस्था की गई. टोक्यो ये खबर भेजी गई कि नेताजी का निधन हो गया. वहां से ये कहा गया कि एक विमान नेताजी के शव को लेने वहां आएगा. लेकिन इस खबर को गुप्त रखा गया.

19 अगस्त को जापान के इंपीरियल हेड क्वार्टर से एक टेलीग्राम अस्पताल आया, जिसमें कहा गया कि उनकी बॉडी को विमान से टोक्यो ले जाया जाएगा. शव को कॉफीन में रख दिया गया.

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20 अगस्त 1945
कर्नल हबीब ने शाहनवाज आयोग को बताया था कि वो चाहते थे सुभाष के शव को टोक्यो ले जाया जाए ताकि उनकी मौत को लेकर कोई संशय नहीं रहे. सुभाष के पार्थिव शरीर को 20 अगस्त को ताइहोकु एयरपोर्ट पर ले जाया गया. लेकिन शव एयरपोर्ट पर रखा रहा. कहा गया कि इसे कुछ अज्ञात कारणों से टोक्यो नहीं ले जाया जा सका.

अगर रिपोर्ट्स और शाहनवाज कमीशन के सामने आई गवाहियों को मानें तो नेताजी का शव ताबूत में 20 अगस्त घंटों तक ताइहोकु एयरपोर्ट पर ताबूत में रखा रहा


कर्नल हबीब ने आयोग को बताया कि विमान शव को इसलिए नहीं ले जा सका,क्योंकि ताबूत विमान में नहीं आ पा रहा था. फिर टोक्यो से ही निर्देश आया कि इस शव का अंतिम संस्कार स्थानीय स्तर पर ही कर दिया जाए. 20 अगस्त को ही मृत्यु प्रमाणपत्र बनाया, जिसमें मृत्यु का कारण बुरी तरह से जलना और सदमा बताया गया. शाम तक ताइहोकु में अस्पताल से सटे मंदिर में अंतिम संस्कार कर दिया गया. कर्नल ने कहा कि जापानी अधिकारी नहीं चाहते थे कि उस समय किसी को भी बताया जाए कि मृतक कौन था.

21 अगस्त 1945
जापानी सेना के मेजर नागामोतो ने शाहनवाज जांच आयोग से कहा, ''21 अगस्त की सुबह मैं आठ बजे अस्पताल पहुंचा ताकि भारतीय सैन्य अधिकारी को साथ ले सकूं. शवदाह गृह में पहुंचने पर देखा कि शव पूरी तरह जल चुका था. बौद्ध परंपरा के अनुसार मैने चॉप स्टिक से गले की हड्डी उठाई औऱ बॉक्स में डाल ली. फिर शरीर के हर हिस्से की हड्डी इकट्ठा की. भारतीय सैन्य अधिकारी भी मेरे साथ वही करते जा रहे थे. जब लकड़ी का ये छोटा सा बॉक्स भर गया तो मैंने इसे बंद कर सफेद कपड़े से कवर कर दिया. हम इसके बाद कार से होंगाजी मंदिर गए, जहां उस दिन खास सेरेमनी हुई.'' आयोग के सामने कर्नल हबीबुर्रहमान ने भी यही बात कही.

22 अगस्त 1945
नेताजी के निधन को लेकर टोक्यो में उच्च सैन्य अधिकारियों और सरकार के बीच मीटिंग हुई. जिसमें ये विचार किया गया कि नेताजी के निधन की खबर किस तरह रिलीज की जाए. लेकिन वो ये चाहते थे कि ये खबर आजाद हिंद फौज के किसी अधिकारी द्वारा ही बनवाई जाए. ये भी बताया जाता है कि जापानी असमंजस में थे इस खबर को अभी रिलीज किया जाए या नहीं. ये भी असमंजस था कि दुनिया इस पर विश्वास करेगी या नहीं. मीटिंग में ये तय हुआ कि नेताजी के निधन की खबर बनाने में आजाद हिंद फौज के ही किसी अधिकारी का इनवाल्वमेंट होना चाहिए.

कई दौर की मीटिंग और असमंजस के बाद आखिरकार 23 अगस्त 1945 को जापान की न्यूज एजेंसी ने उनके निधन की खबर प्रसारित की


23 अगस्त 1945
आखिरकार नेताजी के निधन की खबर जापानी न्यूज एजेंसी डोमेई ने जारी की (आजकल इसे क्योदो न्यूज के रूप में जानते हैं). लेकिन जब ये खबर जारी हुई तो इस पर किसी ने विश्वास नहीं किया. ब्रिटिश सरकार और उसकी जासूसी एजेंसी का मानना था कि जापान सरकार ने बोस को चुपचाप निकल जाने का मौका दिया है और फिर ये खबर प्रसारित कराई. नेताजी के निधन के साथ ही कर्नल सिदेई के निधन की खबर की भी घोषणा की गई. हालांकि ये अब तक रहस्य है कि जापान पांच दिनों तक नेताजी के निधन को लेकर कौन सी मंत्रणा में लगा रहा था.

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जो सवाल इसके बाद खड़े हुए 

पहला सवाल - अस्पताल के रजिस्टर में कहीं नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम दर्ज क्यों नहीं था. बल्कि इस रजिस्टर में नेताजी के साथ मारे गए कर्नल सिदेई का नाम भी दर्ज नहीं था.

दूसरा सवाल - अगर नेताजी का निधन 18 अगस्त को हो गया था तो जापान ने इसकी पुष्टि के लिए क्यों अपना कोई उच्च अधिकारी ताइहोकु नहीं भेजा. जबकि सुभाष को जापान बहुत ऊंचा दर्जा देता था और मानता था कि वो निर्वासित भारत सरकार के मुखिया हैं. जब तक वो जिंदा रहे, उन्हें जापान की ओर इसी के अनुरूप प्रोटोकॉल मिलता रहा.

नेताजी के निधन की खबर पर आजाद हिन्द फौज के उनके बेहद करीबियों तक ने विश्वास नहीं किया था


तीसरा सवाल - आखिर जापान ने सुभाष के निधन की खबर पांच दिन रोके रखी. हालांकि जिस तरह सुभाष के निधन की बात सामने आई, उस पर खुद जापान में मौजूद उनके तमाम करीबियों तक ने विश्वास नहीं किया था.

चौथा सवाल - सुभाष के निधन की जांच करने वाले तीसरे जस्टिस मनोज मुखर्जी आयोग ने क्यों कहा कि जिस एयरपोर्ट पर सुभाष चंद्र बोस के विमान के क्रैश की बात जापान द्वारा कही गई, वहां तो सात अगस्त से लेकर अक्टूबर तक कोई भी विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ था. मुखर्जी कमीशन ने ये भी पाया कि अंतिम संस्कार के रजिस्टर पर 17 से 25 अगस्त तक सुभाष चंद्र बोस और लेफ्टिनेंट जनरल सिदेई का नाम नहीं था.

न ही उनमें उन पायलटों के नाम दर्ज थे, जिनके बारे में कहा गया था कि वो भी उसी क्रैश में मारे गए. अगले कुछ दिनों में जापान या ताइवान के किसी अखबार में प्लेन क्रैश की खबर नहीं प्रकाशित हुई. आयोग इस निष्कर्ष पर भी पहुंचा कि टोक्यो के रेनकोजी मंदिर में रखी हुई अस्थियां नेताजी की नहीं बल्कि जापानी सैनिक इचिरो ओकुरा की हैं, जिसकी मौत हृदय आघात से हुई थी.

ये सुभाष चंद्र बोस की आखिरी फोटो है, ये तब ली गई थी जब हादसे से ठीक पहले विमान से नीचे उतर रहे थे


पांचवां सवाल - अगर वाकई सुभाष विमान दुर्घटना में मारे गए थे तो उनके निधन को गुप्त रखने से जापान का क्या भला हो सकता था. जापान द्वारा नेताजी के निधन पर ऐसा रुख और खबर को अनावश्यक तौर पर रखे रखना अगर रहस्यमय है तो शक भी पैदा करता है.

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First published: August 20, 2019, 9:05 PM IST
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