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झारखंड चुनावों का अनोखा रिकॉर्ड, कभी नहीं जीत पाता कोई विधानसभा स्पीकर

News18Hindi
Updated: December 23, 2019, 10:33 AM IST
झारखंड चुनावों का अनोखा रिकॉर्ड, कभी नहीं जीत पाता कोई विधानसभा स्पीकर
जानकारों की मानें तो रायगढ़ और दुर्ग में कांग्रेस आसानी से अपना महापौर बना लेगी. (सांकेतिक फोटो.)

अब इसे संयोग ही कह सकते हैं कि झारखंड विधानसभा का स्पीकर (Jharkhand Assebly Speaker) कभी अपना अगला चुनाव नहीं जीत पाता. पिछले बार विधानसभा स्पीकर दिनेश उरांव (Dinesh Oraon) को लेकर भी अभी कयास लगाए जा रहे हैं.

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  • Last Updated: December 23, 2019, 10:33 AM IST
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नई दिल्ली. भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली के महापर्व चुनाव में बेहद दिलचस्प किस्से सामने आते रहते हैं. कई बार हम खबरें पढ़ते हैं कि अमुक सीट पर जीत या हार ही तय करती है कि सरकार किसकी बनेगी! कुछ ऐसा ही किस्सा झारखंड विधानसभा चुनावों के रांचीसाथ भी है. अब इसे संयोग ही कह सकते हैं कि झारखंड विधानसभा का स्पीकर कभी अपना अगला चुनाव नहीं जीत पाता. पिछले बार विधानसभा स्पीकर दिनेश उरांव को लेकर भी अभी कयास लगाए जा रहे हैं. अब तक झारखंड में तीन बार विधानसभा के चुनाव हुए हैं और हर बार नतीजा एक सा ही रहा है. बताया जाता है कि झारखंड में इसे लेकर राजनीतिक धारणा भी बन गई है.

जब पहली बार हारे स्पीकर
झारखंड राज्य का गठन साल 2000 में हुआ था. पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी बने और विधानसभा के अध्यक्ष बनाए मृगेंद्र प्रताप सिंह. 2005 में झारखंड में दूसरा विधानसभा चुनाव होने वाला था उससे कुछ समय ही मृगेंद्र प्रताप सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. उनकी जगह स्पीकर बनाए गए राष्ट्रीय जनता दल के विधायक और डिप्टी स्पीकर डॉ. सबा अहमद. जब विधानसभा चुनाव की बेला आई तो वो चुनाव मैदान में उतरे और वो भी अपनी परंपरागत सीट टुंडी से. ये सीट सबा अहमद का गढ़ मानी जाती थी और राजनीतिक जानकारों के मुताबिक उनकी हार का कोई अंदेशा नहीं था. लेकिन चुनाव में सबा अहमद को हार का मुंह देखना पड़ा.

उन्हें झारखंड मुक्ति मोर्चा के मथुरा प्रसाद महतो से चुनावी हार मिली थी. पांच साल पहले साल 2000 में इसी सीट पर हुए चुनाव में मथुरा महतो को हराकर सबा अहमद विधानसभा पहुंचे थे. हालांकि उस बार भी उनकी जीत का अंतर बेहद नजदीकी रहा था. वो तब मात्र 154 वोटों से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे. लेकिन 2005 में उनकी किस्मत ने साथ नहीं दिया. 2005 में उन्हें मथुरा महतो ने बड़े अंतर से मात दी थी. वो करीब 26 हजार मतों से चुनाव जीते थे.



आलमगीर आलम
आलमगीर आलम




जब दूसरी बार हारे स्पीकर
2005 के विधानसभा चुनाव में पाकुड़ विधानसभा सीट से चुनाव जीतने और फिर बाद में राज्य विधानसभा के स्पीकर बनने वाले आलमगीर आलम के साथ भी कुछ सबा अहमद जैसा ही हाल हुआ. कांग्रेसी नेता आलमगीर 2009 के चुनाव के समय में राज्य विधानसभा के अध्यक्ष थे. पाकुड़ विधानसभा सीट पर 2009 में कांग्रेसी आलमगीर और झामुमो के अकील अख्तर के बीच लड़ाई थी. झारखंड और पश्चिम बंगाल के बॉडर से लगा ये इलाका मुस्लिम बहुत क्षेत्र है.

अकील और आलमगीर में कांटे की टक्कर हुई थी. दो बड़े मुस्लिम प्रत्याशी खड़े हो जाने की वजह से वोटरों में भी असमंजस की स्थिति बन गई थी. आखिरकार अकील अख्तर ने आलमगीर को 5 हजार वोटों से मात दे दी थी. दिलचस्प बात देखिए कि आलमगीर इस सीट से 2 बार चुनाव जीत चुके थे. उनके हारने की कोई वजह चुनावी जानकारों को समझ नहीं आ रही थी. और आलमगीर की अप्रत्याशित हार ने 2005 में हुई सबा अहमद की हार की याद दिला दी. और शायद यहीं से झारखंड के नेताओं में स्पीकर पद को लेकर एक धारणा भी बनने लगी थी.

वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव को लेकर भी कयास लगाए जा रहे हैं.
वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव को लेकर भी कयास लगाए जा रहे हैं.


तीसरी बार हारे स्पीकर
2014 का विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए ऐतिहासिक था और राज्य के लिए भी. इस चुनाव में पहली बार एनडीए को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ था. पहली बार राज्य में गैरआदिवासी समुदाय का नेता मुख्यमंत्री बना जिसने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया. लेकिन इन सब के बावजूद 2014 के पहले स्पीकर रहे शशांक शेखर भोक्ता की नियति पर असर नहीं पड़ा. शशांक शेखर भोक्ता चुनावी लड़ाई बुरी तरह हारे थे. झारखंड मुक्ति मोर्चा के शशांक सारठ विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरे थे. लेकिन चुनाव के दौरान उन्हें झारखंड विकास मोर्चा के रणधीर कुमार सिंह ने बुरी तरह चुनाव हराया. शशांक तीसरे नंबर पर फिसल गए थे. दूसरे नंबर पर बीजेपी के उदय शंकर सिंह थे. शशांक की जबरदस्त हार ने स्पीकर के पद से जुड़े 'दुर्भाग्य' को लेकर बनी धारणा को और पुष्ट करने का काम किया.
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First published: December 23, 2019, 10:08 AM IST
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