गुरु ग्रह न होता, तो क्या धरती सैकड़ों सालों पहले खत्म हो जाती?

बृहस्पति ग्रह को सोलर सिस्टम का वैक्यूम क्लीनर भी कहा जाता है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)
बृहस्पति ग्रह को सोलर सिस्टम का वैक्यूम क्लीनर भी कहा जाता है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)

गुरु या बृहस्पति ग्रह (Jupiter planet) किसी उल्कापिंड के धरती से टकराने से पहले ही उसे निगल जाता है. इस तरह से वो हमें सुरक्षित रखे हुए हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 17, 2020, 6:45 AM IST
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बृहस्पति ग्रह को सोलर सिस्टम का वैक्यूम क्लीनर (Jupiter is vacuum cleaner of solar system) भी कहा जाता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर ये विशालकाय ग्रह न होता तो हमारी धरती काफी पहले ही किसी हादसे का शिकार होकर खत्म हो जाती. दरअसल गुरु यानी बृहस्पति ग्रह से टकराकर वे धूमकेतु खत्म हो जाते हैं, जो आगे बढ़ने पर धरती से टकराकर उसे तबाह कर सकते थे.

हमारे सौरमंडल का अब तक खोजा गया सबसे बड़ा ग्रह बृहस्पति है. पूरी तरह गैस के बादलों से बना हुआ ग्रह सौरमंडल के सबसे पुराने ग्रहों में से माना जाता है. इसे सौरमंडल का वैक्यूम क्लीनर यूं ही नहीं कहा जाता, बल्कि इसके पीछे इस दैत्याकार ग्रह की अनोखी ताकत है, जो पास आए किसी धूमकेतु को निकल जाती है.

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गुरु ग्रह से उल्कापिंड टकराते रहते हैं- सांकेतिक फोटो (Pixabay)




साल 1994 की ही बात करें तो उस समय धूमकेतु शूमेकर-लेवी पर सारे खगोलशास्त्रियों की नजरें टिकी हुई थीं. धूमकेतु को गुरु ग्रह के गुरुत्वाकर्षण ने जकड़ लिया था और ये सौरमंडल में कहीं और जाने की बजाए धीरे-धीरे उसकी ओर खिंचता गया. आखिरकार धूमकेतु ग्रह के करीब गया और उससे टकराया. टकराते हुए उसकी गति 2 लाख 16 हजार किलोमीटर प्रतिघंटा रही होगी. ये जुलाई 1994 की घटना है. भारी विस्फोट हुआ, जिससे 42,000 फैरनहाइट से भी ज्यादा तापमान पैदा हुआ. लेकिन अंततः धूमकेतु वहीं नष्ट हो गया. इस टकराव से गुरु ग्रह के वायुमंडल में गहरी खरोंचें बन गईं थीं.
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ये पहली घटना थी, जिसे दुनियाभर के खगोलविद इतने साफ ढंग से देख सके. हालांकि उनका मानना है कि बृहस्पति ऐसा लगातार करता रहा है, जिससे सोलर सिस्टम की सफाई होती है. बिग थिंक में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक वैज्ञानिक मानते हैं कि गुरु की धुरी पर धरती से 8 हजार गुना या इससे भी ज्यादा धूमकेतु टकराते रहते हैं.

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गुरु ग्रह का वातावरण अमोनिया और अमोनियम हाइड्रोसल्फाइड से बना हुआ है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


इसकी वजह इस ग्रह का बेहद विशाल होना है. आसान भाषा में इसे इस तरह समझ सकते हैं कि गुरु के भीतर धरती के आकार के 1300 ग्रह आसानी से समा जाएंगे. इसकी यही खासियत इसे सौरमंडल की सफाई करने वाला ग्रह बनाती है, जो लगातार धरती की सुरक्षा करते आया है. वैज्ञानिकों के पास इस बात के खास प्रमाण तो नहीं लेकिन वे मानते हैं कि लगभग 60 मिलियन सालों पहले गुरु से बचकर निकला कोई एस्टेरॉइड धरती से टकराया होगा, जिससे डायनासोर खत्म हुए और नए जीव-जंतुओं और स्तनधारियों का विकास हुआ.

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ये भी एक अनुमान है कि सौरमंडल में अगर गुरु जैसे ग्रह ज्यादा होते तो शायद इंसानों की तरह और भी कई सभ्यताएं अलग-अलग ग्रहों पर होतीं. अमेरिकन एस्ट्रोफिजिसिस्ट फ्रैंक ड्रेक के मुताबिक बहुत पहले गैलेक्सी में हजारों सभ्यताएं रही होंगी. लेकिन किसी न किसी एस्टेरॉइड के टकराने के साथ वे खत्म होती गई होंगी. यही वजह है कि अब तक इंसानों के अलावा किसी एलियन सभ्यता से हमारा संपर्क नहीं हो सका है.

सौरमंडल में अगर गुरु जैसे ग्रह ज्यादा होते तो शायद इंसानों की तरह और भी कई सभ्यताएं अलग-अलग ग्रहों पर होतीं- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


इस बीच ये भी जानने की कोशिश करते हैं कि हमें बहुत पहले ही खत्म हो जाने से बचाने वाला गुरु ग्रह आखिर कैसा है और कैसा है वहां का वातावरण. बिना किसी जमीन के इस ग्रह की गति काफी तेज है. यही कारण है कि धरती के 11.9 साल में बृहस्पति ग्रह का केवल एक साल होता है. यहां का वातावरण अमोनिया और अमोनियम हाइड्रोसल्फाइड से बना हुआ है. ये हवा इतनी जहरीली है कि यहां कोई भी पशु-पक्षी सांस नहीं ले सकता. यानी इंसान अगर सौरमंडल के किसी दूसरे ग्रह पर बसने की सोचें तो वे गुरु ग्रह तो कतई नहीं है.

इस ग्रह में सैकड़ों या हजारों सालों से एक रहस्यमयी तूफान चला आ रहा है, जिसे द ग्रेट रेड स्पॉट कहते हैं. ये तूफान इतना भयंकर है कि इसमें धरती जैसे तीन ग्रह समा सकते हैं. हालांकि ये पता नहीं चल सका है कि तूफान आखिर क्यों आया और क्या बदलाव लाने के बाद ये बंद होगा.
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