आपने कभी सोचा है कि मैलवेयर, वायरसों के नाम इतने दिलचस्प क्यों होते हैं?

आपको खबर लगे बगैर फोन में ओरजिनल एप्स के नकली वर्जन इंस्टॉल हो रहे हैं. भारत में डेढ़ करोड़ मोबाइल फोन्स को प्रभावित करने का ये कारनामा कर रहा है एक मैलवेयर, जिसका नाम है एजेंट स्मिथ. जानें मैलवेयरों, वायरसों के नाम पड़ने के पीछे क्या कहानी है.

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Updated: July 11, 2019, 3:21 PM IST
आपने कभी सोचा है कि मैलवेयर, वायरसों के नाम इतने दिलचस्प क्यों होते हैं?
भारत के डेढ़ करोड़ फोन एजेंट स्मिथ मैलवेयर की चपेट में.
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Updated: July 11, 2019, 3:21 PM IST
अगर आप अपने फोन में वॉट्सएप खोलते हैं तो क्या आपको कोई विज्ञापन दिखता है? अगर हां, तो समझ लीजिए कि आपके फोन में एक मैलवेयर एजेंट स्मिथ ने हमला कर दिया है. एजेंट स्मिथ मैलवेयर ने दुनिया भर के ढाई करोड़ मोबाइल फोन्स को अपनी चपेट में ले लिया है, जिसमें से डेढ़ करोड़ के करीब फोन्स भारत के पाए जा रहे हैं. एजेंट स्मिथ, ये नाम कहां से आया? नाम सुनकर ऐसा लगता है कि एफबीआई, सीआईए या इंटरपोल जैसी किसी संस्था के जासूस या किसी नॉवेल के किरदार की बात हो रही है. कंप्यूटरों और मोबाइल फोन्स पर हमला करने वाले मैलवेयर, वायरसों या रैनसमवेयरों के नाम रखे जाने के पीछे आखिर क्या कहानी है?

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तकनीकी सुरक्षा और मशीनों पर रिसर्च कर रहे लोग हर रोज़ नए मैलवेयर के सबूत देखते हैं, लेकिन नाम सिर्फ उन्हीं के रखे जाते हैं, जो ज़्यादा खतरनाक या प्रभावशाली होते हैं. हमिंगबर्ड, हार्टब्लीड, शायलॉक, ड्रायडेक्स... कुछ ऐसे ही नाम हैं जो कंप्यूटर वायरसों या अन्य हमलावर खतरों को दिए जा चुके हैं. ये नाम रखता कौन है? किस आधार पर रखे जाते हैं? आइए जानें ये दिलचस्प कहानी.

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पहला कारण है कोडिंग-डीकोडिंग
कंप्यूटर सुरक्षा स्टडीज़ के शुरूआती दिनों में, वायरसों और दूसरे खतरों के लिए नामों का चयन ऐसे हमलों की एक्चुअल कोडिंग या संदेशों के आधार पर किया करते थे. उदाहरण के लिए, 1987 में एक वायरस के साथ मैसेज आता था 'आपके कंप्यूटर पर पथराव हो चुका है! गांजे को वैध करो!' तो इस संदेश के आधार पर इस वायरस का नाम स्टोन्ड डीओएस रखा गया. इसी तरह 1998 में एक वायरस था बैक ओरिफेस, ये नाम इसलिए दिया गया क्योंकि ये वायरस विंडोज़ मशीनों में बैकडोर एंट्री करता था.

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वायरसों और मैलवेयर के नामों का चयन अमूमन एक्चुअल कोडिंग के आधार पर होता है.

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इसी तरह 21वीं सदी में यही सिलसिला जारी रहा. वायरस के साथ आने वाले ईमेलों के कॉंटेंट के आधार पर 2000 में एक वायरस को 'आई लव यू' वायरस नाम दिया गया. इसके बाद से नामकरण में दिलचस्पी या फ़न पैदा किया जाने लगा. 2001 में एक वायरस को नाम दिया गया था 'कोड रेड वॉर्म'. इस नाम के पीछे कहानी ये थी कि इस वायरस पर स्टडी करने के दौरान शोधकर्ता एक कोल्ड ड्रिंक पी रहे थे और उन्होंने उसी के नाम पर इस वायरस का नाम रख दिया. इसी तरह निमडा वायरस का नाम एडमिन की स्पेलिंग को पलटकर रखा गया था.

मज़ा या फ़न पैदा करने की चेष्टा
ज़्यादातर वायरसों या मैलवेयर के नाम साइबर रिसर्चरों ने दिए, लेकिन कभी कभी ऐसा भी हुआ कि ये वायरस या मैलवेयर बनाने वाले हैकरों ने भी इसे नाम दिए क्योंकि वो भी शोहरत चाहते थे. ऐसा ही एक किस्सा 'मेलिसा' वायरस का रहा. इस वायरस ने मार्च 1999 में 8 करोड़ डॉलर का नुकसान पहुंचाया था. ये नाम हैकर डेविड एल स्मिथ ने ही दिया था और उसने इस वायरस का नाम अपनी पसंदीदा डांसर के नाम पर रखा था जो मियामी में वयस्कों के क्लब में डांस किया करती थी.

ये हैं इस दौर की कहानियां
अब भी ज़्यादातर नाम रिसर्चरों के ज़रिए ही दिए जा रहे हैं लेकिन इंटरनेट के अंडरवर्ल्ड में सक्रिय कुछ हैकर या तकनीकी हमलावर भी अपने मैलवेयरों को नाम देते रहते हैं. पेट्या और मीशा दो ऐसे मैलवेयर हैं, जिनके हैकरों ने इनके लिए लोगो तक डिज़ाइन किए. हार्टब्लीड मैलवेयर की कहानी भी दिलचस्प है, जो सर्वर की गोपनीय जानकारियां चुरा लेता है. इस दौर में इन मैलवेयरों और वायरसों को ऐसे नाम दिए जाने की तरकीब रहती है,​ जिसे मीडिया और लोगों में पसंद किया जाए ताकि खूब प्रचार​ मिले.

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अब भी ज़्यादातर मैलवेयरों के नाम रिसर्चरों के ज़रिए ही दिए जा रहे हैं.


ऐसी है मैलवेयरों की दुनिया
आखिर में आपको ये भी जानना चाहिए कि मैलवेयर की संख्या के हिसाब से ये बहुत बड़ी दुनिया है. शोधकर्ता एजेंसियों की मानें तो जैसे सितारों की दुनिया है, उसी तरह मैलवेयर की भी. हर सितारे की तरह हर मैलवेयर को नाम दिया जाना मुमकिन भी नहीं है, लेकिन एक खास प्रजाति या एक खास तरह के प्रभाव वाले मैलवेयरों को नाम दिया जाता है, ताकि स्टडी में सुविधा हो सके. ये उसी तरह है जैसे जानवरों की दुनिया में हर प्रजाति को एक खास वैज्ञानिक नाम दिया गया है, जैसे मनुष्यों को होमो सेपियंस कहा जाता है.

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