7 अप्रैल तय था, तो 8 अप्रैल को मंगल पांडेय को क्यों और कैसे दी गई फांसी?

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी मंगल पांडेय.

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी मंगल पांडेय.

Mangal Pandey Balidan Diwas : भारत के स्वाधीनता संग्राम (Freedom Struggle of India) का ज़िक्र जब भी आएगा, मंगल पांडेय का नाम न केवल सुनहरे अक्षरों में बल्कि शुरूआत में ही लिखा जाएगा. जानिए भारत के सपूत मंगल पांडेय की बगावत से फांसी तक की रोमांचक कहानी.

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इतिहास के पन्नों में 8 अप्रैल की तारीख मंगल पांडेय के अंतिम दिन के तौर पर दर्ज न होती, अगर 7 अप्रैल को जल्लादों को यह नहीं पता होता कि फांसी पर किसे लटकाया जाना था! भारत की आज़ादी की पहली लड़ाई का शंखनाद करने वाले मंगल पांडेय ब्रिटिश राज के समय में कोलकाता (भूतपूर्व कलकत्ता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में '34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री' की पैदल सेना के 1446 नम्बर के सिपाही थे, जिनकी कहानी आज तक याद की जाती है क्योंकि उन्हीं के बलिदान के बाद भारत ने आज़ादी हासिल करने के लिए कमर कसी थी.

क्या आपको पता है कि मंगल पांडेय की फांसी के लिए 18 अप्रैल, 1857 का दिन तय किया गया था लेकिन बगावत और भड़कने के खतरे को देखकर अंग्रेज़ों ने उन्हें कुछ दिन पहले ही 7 अप्रैल को फांसी देना चाहा, लेकिन दे नहीं सके. मंगल पांडेय विचार मंच के प्रवक्ता बब्बन विद्यार्थी ने लिखा है कि 7 अप्रैल तड़के बैरकपुर छावनी में पांडेय को फांसी देने के लिए दो जल्लादों को बुलाया गया था, लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि पांडेय को सूली पर चढ़ाना है तो उन्होंने फांसी देने से इनकार कर दिया.

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वास्तव में, पांडेय की देशभक्ति से जल्लाद भी प्रभावित थे. अंग्रेज़ों के सामने दुविधा की स्थिति बनी तो कलकत्ते से जल्लाद बुलवाए गए, लेकिन उनके आने में समय लगने के कारण अगले दिन 8 अप्रैल की सुबह बैरकपुर के परेड ग्राउंड में पांडेय को फांसी दी जा सकी. तबसे इस दिन को शहादत दिवस के रूप में मनाया जाता रहा.



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न्यूज़18 क्रिएटिव


क्यों दी गई थी फांसी?
इतिहास बताता है कि अंग्रेज़ों की फौज में मंगल पांडेय सिपाही थे. सिपाहियों के लिए अंग्रेज़ी शासन ने एनफील्ड नाम की राइफल के साथ जो नए कारतूस लॉंच किए थे, उनमें जानवरों की चर्बी का इस्तेमाल हुआ था. कई सिपाहियों ने धार्मिक भावनाओं के चलते गाय और सूअर की चर्बी से बने कारतूसों का इस्तेमाल करने से मना किया था क्योंकि इन कारतूसों को मुंह से छीलकर बंदूक में भरा जाता था.

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29 मार्च 1857 को मंगल पांडेय ने अंग्रेज़ी हुकूमत के इन कारतूसों का खुला विरोध कर दिया. अंग्रेज़ अफसरों ने जब दबाव बनाया तो पांडेय ने अंग्रेज़ी अफसरों को मौत के घाट उतारा. एक तरफ मंगल पांडेय की इस बगावत को कुचल दिया गया और 6 अप्रैल को उनकी फांसी के आदेश दे दिए गए, लेकिन दूसरी तरफ पांडेय की इस बगावत ने बाकी सिपाहियों और देशवासियों में अंग्रेज़ों के खिलाफ बगावत का हौसला भर दिया.

मंगल पांडे कैसे पकड़े गए थे?
सिर्फ 22 साल की उम्र से ही ईस्ट इंडिया कंपनी में जुड़ गए पांडेय फौज में जाने के लिए उत्साहित रहते थे, लेकिन अकबरपुर ब्रिगेड में पहली नियुक्ति के कुछ ही साल बाद अंग्रेज़ी सेना से उनका दिल भर गया था. फिर ग्रीज़ लगे कारतूस और राइफल का विवाद उनके लिए क्रांति की शुरूआत की वजह बन गया था.

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इतिहास में दर्ज है कि देश की पहले स्वाधीनता संग्राम की आग भड़काने वाले पांडेय ने 'मारो फिरंगी को' नारा दिया था. वास्तव में, 31 मई 1857 से क्रांति की शुरूआत किया जाना तय किया गया था, लेकिन पांडेय ने दो महीने पहले ही बिगुल फूंक दिया था. यह योजना का हिस्सा नहीं था इसलिए इस बगावत को योजनाबद्ध ढंग से समर्थन मिल नहीं सका.

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अंग्रेज़ों को बहुत मुश्किल नहीं हुई कि वो अकेले पांडेय को अपनी हिरासत में ले सकें, लेकिन पांडेय पकड़े जाना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने अपनी ही बंदूक को अपनी छाती पर अड़ाकर गोली दाग दी थी ताकि ज़िंदा न पकड़े जाएं. लेकिन, गोली पसली से लगकर फिसलने से वो घायल हो गए और अंग्रेज़ों की गिरफ्त में आ गए. फिर भी न तो उन्होंने क्रांति की योजना के बारे में अंग्रेज़ों को कुछ बताया और न ही अपने साथियों के. उन्हें बगावत का दोषी कहकर अंग्रेज़ों ने फांसी की सज़ा दे दी.

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बता दें कि क्रांतिकारी मंगल पांडेय का जन्म 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के नगवा गाँव में हुआ था. इतिहास के कुछ पन्नों में पांडेय का जन्मस्थान फैज़ाबाद की अकबरपुर तहसील में भी बताया जाता है. दिवाकर पांडे श्रीमती अभय रानी के पुत्र के जन्मस्थान पर भले मतभेद हो लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं कि वो भारत के वीर सपूत थे, जो अपनी मातृभूमि के लिए बलिदान देने में हिचके नहीं.
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