पहाड़ों पर एयरफोर्स के Mi-17 और ALH Dhruv हेलिकॉप्टर क्यों भेजे गए?

कई तरह की प्राकृतिक आपदाओं के वक्त इंडियन आर्मी और एयर फोर्स मिलकर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाते हैं. (File Photo)

कई तरह की प्राकृतिक आपदाओं के वक्त इंडियन आर्मी और एयर फोर्स मिलकर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाते हैं. (File Photo)

उत्तराखंड में ग्लेशियर टूटने (Glacier Burst) से पेश आई आपदा के समय निपटने के लिए भारतीय वायुसेना (Indian Air Force) की शान कहे जाने वाले हेलिकॉप्टरों की मदद ली गई. क्या आप जानते हैं कि ये हेलिकॉप्टर कैसे हैं और ऐसे कामों के लिए कितने असरदार?

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 8, 2021, 8:20 PM IST
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भारतीय वायुसेना (IAF) के पास जो Mi-17 हेलिकॉप्टर है, वो दो मीडियम टर्बाइन के कारण ट्रांसपोर्ट के लिए बेहद मुफीद है, साथ ही इसका हथियारबंद वर्जन जंग के अनुकूल है. इसी तरह, ALH Dhruv हेलिकॉप्टर स्वदेशी लड़ाकू तो है, लेकिन इसका खास उपयोग राहत कार्यों (Rescue Operations), बलों को तुरंत मौके पर पहुंचाने, एयर सपोर्ट और तलाशी या टोही (Searching Operation) के तौर पर कारगर ढंग से हो सकता है. इन दोनों ही हेलिकॉप्टरों को वायुसेना के बेड़े में विश्व स्तरीय माना जाता है, जो उत्तराखंड की त्रासदी (Uttarakhand Tragedy) के मद्देनज़र रेस्क्यू के लिए भेजे गए.

नंदा देवी ग्लेशियर का हिस्सा टूटने के कारण उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ में बाढ़ (Uttarakhand Glacier Tragedy) के बाद बचाव कार्य में सहयोग के लिए भारतीय वायुसेना (Indian Airforce) की टीमें जुटीं. देहरादून के जौलीग्रांट हवाई अड्डे से एनडीआरएफ कर्मियों को जोशीमठ ले जाने के लिए वायुसेना ने तीन एमआई-17 और एक एएलएच हेलिकॉप्टर भी आपदा प्रभावित क्षेत्रों में भेजा गया. जानिए क्यों पहाड़ी इलाकों में इन हेलिकॉप्टरों की मदद ली गई.

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कैसा है Mi-17 हेलिकॉप्टर?
दो पायलटों के साथ एक इंजीनियर की जगह इस हेलिकॉप्टर में होती है जबकि यह हेलिकॉप्टर 24 जवानों की टुकड़ी ले जा सकता है. यानी 4000 से 5000 किलोग्राम तक मालवाहक क्षमता इसमें होती है. 18.4 मीटर लंबे और 5.65 मीटर ऊंचे ये हेलिकॉप्टर 280 किमी प्रति घंटे की रफ्तार तक उड़ान भरने की क्षमता रखते हैं. इनकी खास बात यह है कि ये एक सेकंड में 8 मीटर तक ऊंचा उठ पाते हैं.

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दुर्घटनाग्रस्त हेलिकॉप्टर को 2019 में एयरलिफ्ट करने के समय Mi-17 चर्चा में आया था.


सेना के लिए खास तौर से पहाड़ी इलाकों में ऑपरेशनों के लिहाज़ से इन्हें खास बनाया गया है. रूस में निर्मित इन हेलिकॉप्टरों को रूसी सर्विस में Mi-8M की सीरीज़ का यूटिलिटी हेलिकॉप्टर माना जाता है. देखिए कैसे इन्हें खास पहाड़ी इलाकों के लिए तैयार किया गया.



पहाड़ों में क्यों हुआ इस्तेमाल?

ग्लेशियर के कारण उत्तराखंड में हुई तबाही के बाद बचाव कार्यों के लिए Mi-17 हेलिकॉप्टर भेजे गए क्योंकि इन्हें इसी तरह के कामों के लिए डिज़ाइन किया गया था. रूसी कंपनी ने Mi-8 के ही एयरफ्रेम को Mi-17 में फिट किया, लेकिन नए वर्जन में क्लिमोव का इंजन और बेहतर रखा गया. इंजन के अलावा फ्यूल क्षमता को भी इस वर्जन में बढ़ाया गया ताकि और भारी लोड हेलिकॉप्टर ले सके.

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वास्तव में चीन और वेनेज़ुएला ने विशेष तौर पर ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में इस्तेमाल के लिए ये हेलिकॉप्टर जब खरीदे थे, तब इनमें Klimov TV3-117 इंजन के Klimov VK-2500 वर्जन के साथ ही FADEC कंट्रोल भी दिया गया था. भारत के पास भी इस उन्नत तकनीक वाले Mi-17 के मोडिफाइड वर्जन हैं.

हेवी लिफ्ट हेलिकॉप्टर Mi-26 को भारतीय वायुसेना अपनी शान कहती है, जो उत्तर भारत के पहाड़ों में विशेष नतीजे दे चुका है. वायुसेना के मुताबिक MI-17/MI-17IV/MI-17V5 और Mi-8s जैसे मीडियम लिफ्टर हेलिकॉप्टर देश भर में करीब 200 की तादाद में हैं, जो महत्वपूर्ण सपोर्ट भूमिका अदा करते हैं.

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पहले भी बाढ़ के हालात में Mi-17 का इस्तेमाल हो चुका है.


कैसा है वायुसेना का ALH Dhruv?

डिजिटल मूविंग मैप, FADEC कंट्रोल और इंटिग्रेटेड सेल्फ प्रोटेक्शन जैसे फीचरों से भरपूर ध्रुव का इस्तेमाल खास तौर से दुर्घटनाग्रस्त इलाकों में किया जाता है. करीब 16 मीटर लंबे और 5 मीटर ऊंचे इस हेलिकॉप्टर की भार क्षमता 5500 किलोग्राम से भी ज़्यादा है. हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड निर्मित यह एडवांस्ड लाइट हेलिकॉप्टर मिलिट्री के साथ ही सिविल ऑपरेशनों के मकसद से वायुसेना के बेड़े में है.

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ध्रुव के अहम वैरिएंट Mk-I, Mk-II, Mk-III और Mk-IV हैं, जो भारतीय सशस्त्र बलों के पास देश भर में 200 से ज़्यादा हैं. भारत के अलावा नेपाल आर्मी, मॉरिशस पुलिस और मालदीव में भी ध्रुव की सप्लाई की जा चुकी है. ALH Mk-III में शीशे के कॉकपिट को स्टेट ऑफ आर्ट तकनीक से तैयार किया गया है जबकि ALH Mk-I का इस्तेमाल कैजुअलिटी के समय प्रभावित क्षेत्र को खाली कराने के लिए कारगर रहा है.
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