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मोरारजी ने क्यों कहा था- एक दिन देश को महात्मा गांधी की खादी पर आना ही पड़ेगा

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Updated: April 10, 2020, 8:53 AM IST
मोरारजी ने क्यों कहा था- एक दिन देश को महात्मा गांधी की खादी पर आना ही पड़ेगा
मोरारजी देसाई देश के पहले गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री थे.

10 अप्रैल 1995 को 99 साल की उम्र में दुनिया छोड़ने वाले मोरारजी देसाई देश के सर्वाधिक सम्मानित नेताओं में शुमार किए जाते हैं.

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मोरार जी देसाई भारतीय राजनीति के पहले नेता थे जो एक गैरकांग्रेसी के तौर पर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पहुंचे थे. पक्के गांधीवादी मोरार जी देसाई स्वदेशी के बड़े समर्थक थे. वो खादी को देश की रगों से जुड़ा हुआ वस्त्र मानते थे. एक बार उन्होंने इंटरव्यू लेने पहुंची पत्रकार से सवाल किया, ‘तुम कितना याद करती हो गांधी जी को? खादी तक तो पहनती नहीं. मुझे देखो, मैं हमेशा खादी पहनता हूं. जब कहा गया कि वह महंगी है तो हाजिर जवाब पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा ‘जो पहनी हो, क्या वह सस्ता है? कुछ भी कहो, एक दिन देश को गांधी की खादी पर आना ही पड़ेगा. यह चर्चा करने पर कि आर्थिक नीतियों में बदलाव आ गया है, बहुराष्ट्रीय कंपनियां देश पर छा रही हैं, मोरारजी ने कहा कि भटक जाते हैं नीति निर्माता. थप्पड़ पड़ेगा तो वापस आएंगे.

10 अप्रैल 1995 को 99 साल की उम्र में दुनिया छोड़ने वाले मोरारजी देसाई देश के सर्वाधिक सम्मानित नेताओं में शुमार किए जाते हैं. आज भी देश में सबसे ज्यादा बार बजट पेश करने का रिकॉर्ड उन्हीं के पास है. प्रधानमंत्री रहने के पहले भी वो कई महत्वपूर्ण मंत्रिपद पर रह चुके थे. हालांकि मोरारजी महज दो वर्षों तक ही प्रधानमंत्री रह सके थे. चौधरी चरण सिंह के समर्थन वापस ले लेने के कारण उनकी सरकार गिर गई थी. मोरारजी ने देसाई खुद मानते थे प्रधानमंत्री पद पर रहने के दौरान महज दो बड़ी गलतियों की वजह से उन्हें कुर्सी गंवानी पड़ी थी.

चौधरी चरण सिंह




चरण सिंह को निकालने के बाद उन्हें वापस नहीं लेना चाहिए था



चौधरी चरण सिंह के बारे में मोरारजी ने कहा कि एक बार चरण सिंह को मंत्रिमंडल से निकाल देने के बाद उन्हें वापस नहीं लेना चाहिए था. पर मुझे सहयोगी मंत्री लालकृष्ण आडवाणी के दबाव में आकर चरण सिंह को वापस लेना पड़ा. चौधरी चरण सिंह मतभेदों के कारण जुलाई, 1978 में मोरारजी सरकार से अलग हो गए थे. लेकिन उन्हें जनवरी, 1979 में एक बार फिर मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया.

हालांकि कुछ राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार मोरारजी देसाई की सरकार के पतन के कारण कुछ और थे. जुलाई, 1978 में जब चरण सिंह को केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाया गया तो भी जनता पार्टी के अंदर चरण सिंह के पक्ष में कोई विद्रोह नहीं हुआ. पर जब उत्तर प्रदेश और बिहार के मुख्यमंत्रियों को उनके कार्यकाल के बीच में ही बारी-बारी से हटा दिया गया तो जनता पार्टी टूट गई. बता दें कि फरवरी, 1979 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री राम नरेश यादव को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया था. वहीं कर्पूरी ठाकुर को अप्रैल, 1979 में बिहार के मुख्यमंत्री पद से हटाया गया था.

खैर, राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर मोरारजी देसाई का अपना आकलन था. हालांकि समाजवादी नेता मधु लिमये ने तब कहा था कि एक तो मोरारजी देसाई ने अपने कैबिनेट में किसी यादव और राजपूत को शामिल नहीं किया. उधर पिछड़े समुदाय के दो मुख्यमंत्रियों को महत्वपूर्ण राज्यों के मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया. इससे जनता पार्टी का जनाधार घटने की आशंका थी.

नीलम संजीव रेड्डी


नीलम संजीव रेड्डी का राष्ट्रपति पद
उधर राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार नीलम संजीव रेड्डी को मुआवजे के तौर पर 1977 में राष्ट्रपति पद दिया गया था. इस मामले में उनके व्यक्तित्व पर ध्यान नहीं दिया गया. वर्ष 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति के उम्मीदवार के रूप में पहले तो नीलम संजीव रेड्डी के नाम का प्रस्ताव किया, पर बाद में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार वी.वी गिरि को समर्थन देकर जितवा दिया. तब तक कांग्रेस पार्टी एक ही थी. यानी प्रधानमंत्री ने अपनी ही पार्टी के अधिकारिक उम्मीदवार रेड्डी को हरवा दिया था.

जब 1977 में केंद्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी तो उसने रेड्डी को ‘राजनीतिक मुआवजा’ दिया. कट्टर गांधीवादी मोरारजी यह भी मानते थे कि गांधी जी की नीतियां हर युग में प्रासंगिक हैं. कल भी थी. आज भी है और कल भी प्रासंगिक रहेंगी. उन पर कुछ अमल हुआ है, कुछ बाकी हैं.

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First published: April 10, 2020, 8:53 AM IST
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