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कालापानी पर नेपाल के दावे में कितना दम, चीन क्यों दे रहा है शह

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: November 19, 2019, 12:25 PM IST
कालापानी पर नेपाल के दावे में कितना दम, चीन क्यों दे रहा है शह
काला पानी को लेकर भारत और नेपाल के बीच छिड़ा बड़ा विवाद

डोकलाम की तरह है ये इलाका, जहां तीन देशों की सीमाएं आपस में छूती हैं. सामरिक तौर पर अहम इस इलाके पर लंबे समय से चीन की नजर है

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  • Last Updated: November 19, 2019, 12:25 PM IST
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नेपाल के अखबार इन दिनों कालापानी विवाद को लेकर भारत के विरोध से भरे पड़े हैं. नेपाल का कहना है कि भारत जबरदस्ती उसके कालापानी इलाके पर अपना कब्जा दिखा रहा है. इसे लेकर वहां लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं, इतना ही नहीं इसे लेकर अब वहां की सरकार भी हरकत में आ गई है. लेकिन अगर इतिहास और तथ्यों की बात करें तो कालपानी का मामला ना केवल उलझा हुआ है बल्कि इसे लेकर स्पष्टता भी नहीं रही है.

कालापानी उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में है. ये पिथौरागढ़ जिले में आता है. ये करीब 35 वर्ग किलोमीटर का इलाका है. यहां बड़ी झील भी है. ये एक ऐसी जगह है, जिसकी तुलना आप डोकलाम से कर सकते हैं. यहां तीन देशों की सीमाएं आकर त्रिकोण बनाती हैं. ये देश भारत, नेपाल और चीन हैं.

चीन लगातार इस इलाके पर कब्जा करने की कोशिश भी करता रहा है. ये भी माना जा रहा है कि ताजातरीन इस विवाद की जड़ में कहीं ना कहीं चीन है, जिसकी शह पर ही नेपाल में प्रदर्शन हो रहे हैं और इस मुद्दे को नाहक हवा दी जा रही है.

हालांकि वर्ष 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेपाल के दौरे पर गए थे तो वहां भी कालापानी का मुद्दा उठा था. नेपाल ने कालापानी पर अपना हक जताते हुए इसे सुलझाने की अपील की थी.

क्या है नेपाल का दावा 
नेपाल का कहना है कि भारत और चीन के बीच 1962 में जब युद्ध हुआ था, तब भारत ने उत्तर बेल्ट में आगे आकर उसके कई इलाकों का इस्तेमाल किया था. लेकिन युद्ध के बाद भारत ने इस बेल्ट की अन्य जगहों से तो अपने सेना चौकियां हटा लीं लेकिन कालापानी को बरकरार रखा. यहां इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस के जवान तैनात रहते हैं. ये भारत के सीमाई इलाकों के सबसे ऊंचे इलाकों में भी गिना जाता है.
 

क्यों हुआ ये विवाद 
विवाद तब उठा जबकि भारत ने लद्दाख को कश्मीर से अलग करके नया राज्य बनाया. इसके बाद नया नक्शा जारी किया गया. इसके बाद ही नेपाल में इसको लेकर विरोध शुरू हो गया. उसने तुरंत नक्शे का विरोध करते हुए कहा कि भारत ने उसके कालापानी इलाके को इसमें शामिल किया है. हालांकि पिछले एक हफ्ते से नेपाल में इसको लेकर विरोध चल रहा है. अब पहली बार वहां के प्रधानमंत्री केपी ओली ने कहा कि भारत वहां से सैनिक हटा ले.

भारत के लिए क्यों अहम है ये इलाका
ये इलाका भारत के लिए रणनीतिक तौर पर खासा महत्वपूर्ण है. वो यहां से अपने सैनिक नहीं हटाना चाहता. वो इस इलाके का अपना मानता है. 1962 के बाद से लगातार ही भारत इस इलाके में बना रहा है. नेपाल ने भी कभी इसे लेकर कोई विवाद खड़ा नहीं किया.

भारत के लिए सामरिक दृष्टि से कालापानी का इलाका बहुत अहम है. जब 1962 में भारत और चीन का युद्ध हुआ था, तब चीन की सेनाएं तमाम कोशिश के बाद यहां तक पहुंच नहीं पाईं थीं


कहना चाहिए कुछ सालों पहले तक भारत और नेपाल के बीच बहुत अच्छे संबंध रहे थे लेकिन अब उनमें लगातार तनाव घुलता दिख रहा है. इसकी वजह कहीं ना कहीं से चीन को माना जा रहा है.

चीन की नजर क्यों है इस इलाके पर 
दरअसल चीन की नजर लंबे समय से सामरिक तौर पर महत्वपूर्ण इस इलाके पर है, जहां से वो कभी युद्ध होने की सूरत में आसानी से भारत में प्रवेश कर सकता है. ये वो इलाका भी है, जहां भारत ने 1962 के युद्ध में मजबूती दिखाई थी. यहां चीन सेनाएं कोशिश के बाद भी फटक तक नहीं पाईं थीं. भारत को डर है कि अगर उसने ये इलाका नेपाल को दे दिया तो चीन इस क्षेत्र में अगर आ गया तो फिर नेपाल उसे हटा नहीं पाएगा.

क्या है इस इलाके का इतिहास
मूलतौर पर कालापानी नेपाल के पश्चिमी सीमाई इलाके में आता है. 1815 में जब ब्रिटिश सेनाओं का युद्ध गोरखाओं से हुआ था तो उन्होंने ये इलाका जीत लिया था. इसके बाद ये भारतीय भूमि का हिस्सा बन गया था. उस समय ब्रिटिश सरकार और नेपाल के बीच संधि हुई, जिसमें नेपाल के महाराजा ने ये इलाका ब्रिटिश भारत को सौंप दिया.

भारत के विदेश मंत्रालय का क्या कहना है 
हालांकि नेपाल का दावा है कि कालापानी और लिपु लेख को उसने ईस्ट इंडिया कंपनी से हासिल किया था. यहां वो 1961 में जनगणना भी करा चुका है, तब भारत ने कोई आपत्ति नहीं की थी. लेकिन भारत के विदेश मंत्रालय का कहना है कि उसने नक्शे में कुछ भी नहीं बदला है. जो नक्शा दशकों से जारी हो रहा है, ये हू-ब-हू वैसा ही है.

कालापानी में ही काली नदी का उदगम माना जाता है. नेपाल इस पर भी हक जताता है. हालांकि ये नदी उत्तराखंड की चार बड़ी नदियों में एक है


ब्रिटिशकाल में 1879 में जो नक्शा तैयार किया गया, उसमें ये भारत का हिस्सा था. दावा ये भी है कि ब्रिटेन में इस नक्शे की मूल कॉपी अब भी मौजूद है. ये इलाका 3600 मीटर की ऊंचाई पर है. ठंड के मौसम पर यहां तापमान माइनस 12 डिग्री या और नीचे चला जाता है.

इसी इलाके से काली नदी भी निकलती है. जो उत्तराखंड की चार बड़ी नदियों में एक है. इस नदी पर भी नेपाल अपना दावा जताता रहा है. इस नदी काली नदी, महाकाली नदी के नाम से जानते हैं.

उत्तराखंड की 80.5 किलोमीटर की सीमा नेपाल से लगी हुई है


उत्तराखंड की कितनी सीमा नेपाल से छूती है
उत्तराखंड की करीब 80.5 किलोमीटर की सीमा नेपाल के साथ है तो 344 किलोमीटर की सीमा चीन के साथ. इन सीमाई इलाकों में इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस तैनात रहती है.

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First published: November 19, 2019, 12:18 PM IST
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