भारत से तीखे तेवर के बाद चीनी कब्जे पर नेपाल की चुप्पी सवाल खड़ा करने वाली

भारत से तीखे तेवर के बाद चीनी कब्जे पर नेपाल की चुप्पी सवाल खड़ा करने वाली
चीन ने नेपाल के इलाकों पर कब्जा कर लिया है. इस पर उसकी चुप्पी सवाल पैदा करती है

भारत के खिलाफ नेपाल सरकार के तेवर सीमा विवाद पर खासे तीखे रहे. वही केपी शर्मा ओली सरकार उन खबरों पर चुप्पी साधे हुए है कि लंबे समय से चीन ने उसके कुछ गांवों और इलाकों पर कब्जा किया हुआ है. ओली का ये रुख जाहिर करता है कि चीन और नेपाल के बीच कोई ऐसी खिचड़ी जरूर पक रही है जो भारत के लिए खतरनाक हो सकती है

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नेपाल के कुछ गांवों पर चीन के कई सालों से कब्जा किया हुआ है. नेपाल के दो सरकारी विभागों ने पिछले नवंबर में ये रिपोर्ट सरकार को भेज दी थी लेकिन भारत के खिलाफ सीमा विवाद पर आक्रामक रवैया अख्तियार करने वाली केपी शर्मा ओली सरकार ने आश्चर्यजनक तरीके से इस पर चुप्पी ओढ़ रखी है. यहां तक कि इस बारे में रिपोर्ट्स नेपाल और फिर इंटरनेशनल मीडिया में आने के बाद भी ओली सरकार के मंत्री इस पर प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं. भारत के खिलाफ बेहद दुश्मनी भरा रवैया अपनाने वाली नेपाल सरकार का ये रुख वाकई हैरानी भरा भी है और सवाल भी उठाता है.

केवल एक महीने पहले की ही बात है जबकि नेपाल ने आनन फानन में अपने पुराने नक्शे को बदलकर भारतीय इलाके में आने वाले तीन इलाकों कालापानी, लिपुलेख औऱ लिम्प्यूधरा को नेपाल के नए राजनीतिक नक्शे में शामिल किया. फिर इसे तुरत फुरत संसद में पास कराकर राष्ट्रपति का हस्ताक्षर कराकर कानून बना दिया. जबकि पिछले 70 सालों से नेपाल के नक्शे में ये इलाके शामिल नहीं थे बल्कि नेपाल का नक्शा खुद इन इलाकों के भारत में होने की बात कहता था.

फिर इस तेजी को बरकरार रखते हुए कालापानी और कई अन्य इलाकों में नेपाल ने सैन्य चौकी स्थापित कर दी. नेपाल के सैन्य प्रमुख और पुलिस पुलिस इन चौकियों का दौरा कर आए. इस बीच नेपाल ने भारत सरकार ने एक बार भी इस बारे में बातचीत करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई.



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नेपाल के कई इलाकों पर चीन का कब्जा
इसके उलट नेपाल के अन्नपूर्णा पोस्ट ने एक रिपोर्ट छापी, जिससे नेपाल के सियासी जगत में भूचाल की स्थिति है कि चीन ने नेपाल के कई उन इलाकों पर पिछले तीन सालों में कब्जा कर लिया जो तिब्बत की सीमा से छूते हुए हैं. इस रिपोर्ट के आने के बाद भारत के खिलाफ जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दे रहे नेपाल के सत्तारूढ़ दल के लोग चुप्पी रखे हुए हैं. खुद नेपाल के प्रधानमंत्री ओली की इस बारे में कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

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नेपाल का हालिया भारत विरोधी तेवर हैरान कर देने वाला था. खासकर बगैर बातचीत का मौका दिए बगैर आनन-फानन में नए राजनीतिक नक्शे को कानून बना देने का कदम. अब जबकि चीन ने नेपाल के बड़े इलाके को हथियाया हुआ है, तब उसके वो तेवर नदारद हैं


भारत के प्नति नेपाल का रुख हैरान करने वाला
ये सब कुछ हैरान करने वाला है. खासकर तब जबकि भारत पिछले 70 सालों से नेपाल का ना केवल अभिन्न दोस्त था बल्कि उसके लिए सभी जरूरत के सामानों की काफी रियायती दरों में आपूर्ति कर रहा था. भारत और नेपाल के बीच 1951 में हुई संधि के अनुसार नेपाल के लोग बराबर भारत में नौकरियां कर सकते हैं और यहां जमीनें खरीद सकते हैं जबकि ये सुविधा भारत के लोगों को नेपाल में नहीं हासिल है.

ओली के राज में नेपाल में बढ़ी भारत विरोधी लहर
नेपाल में इस समय नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का शासन है. वर्ष 2018 में केपी शर्मा के प्रधानमंत्री बनने और कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आने के बाद नेपाल में भारत विरोध की एक नई लहर चल पड़ी है. माना जाता है कि सत्ताधारी दल इसको हवा देता रहा है. ओली को चीन के इशारों पर काम करने वाला नेता माना जाता रहा है. ये रिपोर्ट्स भी आईं थीं कि पिछले दिनों काठमांडू स्थित चीनी राजदूत और चीन के कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं से ओली की काफी मुलाकातें हुई हैं.

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नेपाल ने नक्शे में चीन के कब्जे वाले इलाके पर गौर क्यों नहीं किया
ये भी हैरानी की बात है कि नेपाल ने जब अपना नया नक्शा बनाया तो भारत से जुड़े इलाकों पर ही क्यों उसका जोर रहा, उसने चीन की सीमा से जुडे़ अपने इलाकों पर नजर क्यों नहीं दौड़ाई जबकि उसके पास इस बारे में पुख्ता रिपोर्ट्स आ चुकी थीं.

नेपाल सरकार की प्रतिक्रिया अब तक चीन के कब्जे संबंधी मामले पर नहीं आई है जबकि इस बारे में सरकार को रिपोर्ट करीब 08 महीने पहले दी जा चुकी थी


कई इलाके दशकों से चीन के कब्जे में
बीबीसी ने भी इस संबंध में एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. जिसमें कहा गया है कि नेपाल की सरकार पर दबाव बढ़ रहा है कि वो चीन के साथ सीमा के मुद्दों को लेकर वैसा ही रुख़ अख़्तियार करे जैसा कि भारत के साथ अपनाया है. नेपाल की सरकार ने चीन और नेपाल सीमा मुद्दे पर अब तक अपनी आधिकारिक स्थिति स्पष्ट नहीं की है. उत्तरी गोरखा में रुई गांव और उत्तरी संखुवासा में च्यांग और लुंगडेक गांव कथित तौर पर 1960 के दशक से चीन के क़ब्ज़े में हैं.

नेपाली मंत्री का गोलमोल रुख
बीबीसी ने नेपाल की भूमि प्रबंधन मंत्री पद्मा कुमारी आर्यल से बात की लेकिन उनका जवाब गोलमोल रहा. उनका कहना था कि नेपाल-चीन के बीच सीमा संबंधी ज़्यादातर मुद्दों को सुलझा लिया गया है लेकिन अगर कोई नया मुद्दा आता है तो इसे कूटनीतिक बातचीत के ज़रिए सुलझाया जाएगा. उनके मुताबिक़ नेपाल और चीन ने अपने सारे सीमा संबंधी मुद्दों को सुलझा लिया है "सिर्फ़ तीन मामलों को छोड़कर. इसमें से एक दोलखा में है और दो माउंट एवरेस्ट के नज़दीक भीषण ठंड वाले दुर्गम इलाक़े."

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नेपाली विदेश मंत्री की भी रहस्यपूर्ण चुप्पी
नए नक्शे को लेकर काफी मुखर रहने वाले और हाल में गोरखा रेजिमेंट को लेकर बयान देने वाले नेपाल के विदेश मंत्री ने भी इस पर रहस्यमय चुप्पी ओढ़ी हुई है. साफ जाहिर है कि चीन द्वारा कुछ इलाकों पर कब्जे की रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद ओली सरकार मुश्किल में तो है. उसे जवाब देना दिक्कतभरा लग रहा है.

चीन से तनाव और नेपाल नक्शा विवाद के बीच क्या संबंध है
सबसे बड़ी बात ये भी है नेपाल जब भारत से विवाद को लेकर नए राजनीतिक नक्शे पर जरूरत से ज्यादा तेजी दिखा रहा था, तभी चीन की सेनाएं गलवान घाटी में मौजूदगी बढ़ाने में लगी थीं. क्या इन दोनों घटनाओं में कोई संबंध है. इसका कोई जवाब बेशक नहीं है लेकिन ये लगता है कि ओली और चीन के बीच कुछ खिचड़ी जरूर पीछे पकी है. जिसमें वो खुद अपने देश के लोगों को भी अंधेरे में रख रहे हैं.
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