क्यों नेपाल ने सीमा विवाद से पैर खींचे वापस, किसके दबाव में लिया गया फैसला?

क्यों नेपाल ने सीमा विवाद से पैर खींचे वापस, किसके दबाव में लिया गया फैसला?
नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने दबाव में नक्शा विवाद से पैर पीछे खींच लिए हैं.

माना जा रहा था कि इस बार सीमा विवाद (Border Dispute) लंबा खिंच सकता है लेकिन ऐसा नहीं हुआ. भारत सरकार (Indian Government) के कूटनीतिक प्रयासों की जीत हुई है. आइए जानते हैं कि नेपाली सरकार (Nepal Government) के कदम पीछे खींचने की वास्तविक वजह क्या है?

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भारत और नेपाल के बीच गर्मा रहा सीमा विवाद अब शांत होता दिख रहा है. नेपाल की केपी शर्मा ओली सरकार ने विवादित नक्शे से पैर पीछे खींच लिए हैं. नेपाली सरकार ने ऐसा कदम क्यों उठाया? महज कुछ दिनों पहले तक ओली सरकार भारत के खिलाफ बेहद कड़े शब्दों का प्रयोग कर ही थी. माना जा रहा था कि इस बार सीमा विवाद लंबा खिंच सकता है लेकिन ऐसा नहीं हुआ. भारत सरकार के कूटनीतिक प्रयासों की जीत हुई है.

नेपाली कांग्रेस का रोल
कहा जा रहा है कि भारत के सीमा विवाद सुलझाने में नेपाल की विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस का दबाव काम आया है. गौरतलब है कि नेपाली कांग्रेस के सत्ता में रहते भारत के साथ नेपाल के संबंध हमेशा मधुर रहे हैं. दोनों देशों में छिट-पुट घटनाओं को छोड़कर कभी कोई बड़ा विवाद सामने नहीं आया. लेकिन नेपाल में कम्यूनिस्ट सरकार आते ही भारत विरोधी बयानबाजी शुरू की जाती है. ओली से पहले पुष्प कुमार दहल 'प्रचंड' की सरकार में भी भारत को लेकर कई विवादित बयान दिए गए थे.

नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा इस वक्त नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष हैं.




नक्शे को लेकर विधेयक वापस लिए गया


नेपाल की सरकार नए नक्शे को लेकर विधेयक पारित कराना चाहती थी. लेकिन नेपाली कांग्रेस की तरफ से कहा गया कि उन्हें इस मसले में थोड़ा और समय चाहिए. ये सर्वदलीय बैठक थी. और इसी के बाद नए नक्शे की मंजूरी वाले विधेयक को संसद की कार्यसूची से हटा दिया गया है.

सीमा विवाद के पीछे की क्या है असली वजह
भारत के साथ नेपाल का सीमा विवाद पुराना है लेकिन ऐसी आक्रामक भाषा का इस्तेमाल पहले नहीं हुआ. माना जा रहा है कि इसके पीछे चीन का प्रभाव काम कर रहा है. चीन ने बीते सालों में नेपाल में अपना राजनीतिक और सामाजिक दखल तेजी के साथ बढ़ाया है. भारत के साथ सीमा विवाद के पीछे भी माना जा रहा है कि चीन का दबाव ही काम कर रहा है. गौरतलब है कि हाल ही में चीन ने अक्साई चिन में भी सैनिकों की गतिविधियां बढ़ाई थीं. इसमें भारत के साथ नेपाल का सीमा विवाद भी उसके काम आ रहा है.

भारत नेपाल सीमा विवाद काफी पुराना है.


दिखी भारत की पकड़
यह सच है कि बीते सालों में चीन ने नेपाल में अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिश जारी रखी है लेकिन सीमा विवाद को भारत ने जिस शांतिपूर्ण और कूटनीतिक ढंग से हैंडल किया है, उससे साबित हुआ है कि नेपाल की राजनीति में भारत की पकड़ अब भी बेहद मजबूत है. नेपाल का कम्यूनिस्ट राजनीतिक धड़ा भले ही नए दोस्त चीन की तरफ जाने का उत्सुक हो लेकिन वहां की पुरानी पार्टियां अब भी अपने देश के पुराने मित्रों को पहचानती हैं.

नेपाली कांग्रेस के संबंध नेहरू जी के जमाने से रहे बेहतर
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समय से नेपाली कांग्रेस के संबंध भारत के साथ बेहद अच्छे रहे हैं. नेपाल में राजशाही के दौरान भी भारत के साथ ताल्लुकात बहुत अच्छे थे. 1950 में नेपाली राजशाही में हुए बड़े विद्रोह के बाद भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने हस्तक्षेप कर वास्तविक वारिस त्रिभुवन वीर विक्रम शाह को गद्दी दिलवाई थी. इसके बाद नेहरू जी से बातचीत कर ही नेपाल में कांग्रेस और शमशेर सिंह राणा ग्रुप की लोकतांत्रिक सरकार बनी थी. इसके बाद 70 सालों से नेपाल के साथ भारत के बेहद मधुर संबंध रहे हैं.

कहा जा सकता है नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का बहुत बड़ा योगदान है. वरना 1950 में जो हालात बने थे उसके मुताबिक नेपाल एक गलत राजनीतिक दिशा में था. नेपाल के सबसे बड़े कांग्रेसी नेताओं में शुमार किए जाने वाले विशेश्वर प्रसाद कोइराला नेहरू जी के अच्छे मित्र थे.

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First published: May 28, 2020, 9:59 PM IST
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