'लोलिता' नॉवेल को भारत में क्यों बैन नहीं किया गया, किस्सा रोचक है

'लोलिता' नॉवेल को भारत में क्यों बैन नहीं किया गया, किस्सा रोचक है
1959 जब लोलिता नॉवेल को भारत में बेचने के इंपोर्ट किया गया तो बांबे कस्टम ने इसको रोक लिया

वर्ष 1955 में जब लोलिता किताब फ्रांस में छपी तो देखते ही देखते धूम गई. तीसरे ही दिन इसे और छापना पड़ा, क्योंकि जितनी कापियां छपीं थीं, वो सब बिक गईं. भारत में ये किताब 1959 में आई तो बांबे कस्टम ने उसको रोक लिया. शास्त्री और मोरारजी इसे बैन करना चाहते थे लेकिन नेहरू के हस्तक्षेप से ऐसा नहीं हो सका

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दुनिया की 06 सबसे ज्यादा विवादास्पद किताबों में एक "लोलिता" उपन्यास को लेकर 65 साल बाद भी बहुत से लोग असहजता महसूस करते हैं लेकिन बड़ा सवाल है कि जब पूरी दुनिया में ये किताब प्रतिबंधित हो रही थी तो भला भारत में ये बैन क्यों नहीं हुई जबकि कई बड़े नेता और मंत्री भी इस पर रोक लगाना चाहते थे.

जब ये किताब प्रकाशित हुई तब भारत में "लेडी चटर्लीज लवर" नॉवेल पर बैन लगा हुआ था. इसके प्रकाशन के बाद दुनियाभर में जिस तरह इसकी कथावस्तु को लेकर तीखी आलोचनाएं होनीं शुरू हुईं तो उसकी जानकारी भारत तक भी पहुंची. भारत के समाचार माध्यमों ने भी उसके बारे में छापना शुरू किया था.

ये किताब फ्रांस में सितंबर 1955 में प्रकाशित हुई थी. इसके छपते ही मानो दुनियाभर में इसको लेकर तूफान सा आ गया. हर कोई इस उपन्यास को प्रतिबंधित देखना चाहता था. हालांकि इस उपन्यास पर लोगों का ध्यान तब गया था जबकि रूस और फ्रांस ने छपने के कुछ दिनों बाद ही इस पर बैन लगा दिया. फिर इसकी चर्चाएं दुनियाभर में फैलने लगीं.



1955 जब पहली बार नॉवेल लोलिता का प्रकाशन हुआ तो तीसरे ही दिन इसे फिर से और छापना पड़ा. क्योंकि इसकी मांग जबरदस्त थी लेकिन इस किताब को घोर अश्लील कहकर इसका जबरदस्त विरोध भी शुरू हो गया

इसके लेखक व्लादीमीर नोबाकोव का बचपन रूस में बीता लेकिन बाद रूसी क्रांति के कारण उनके परिवार को वहां से निकल गया. बाद में उनका परिवार बर्लिन में जाकर रहने लगा. जहां उनके पिता ने एक अखबार भी निकाला. नोबोकोव की कुछ पढ़ाई इंग्लैंड में भी हुई.

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भारत में कई नेता इसे प्रतिबंधित कराना चाहते थे
हालांकि अब अगर माडर्न लाइब्रेरी के 100 बेस्ट नॉवेल्स की बात करें तो नोबोकोव की लोलिता को लेखन शैली के हिसाब ने चौथे नंबर पर रखा जाता है. उनकी कई और किताबें भी काफी बेहतर मानी गईं. लेकिन "लोलिता" के कंटेट को आज भी तमाम लोग अलग नजरिए से देखते हैं. भारत में जब ये किताब आई तो सरकार के कई बड़े मंत्री और नेता इसको प्रतिबंधित कराना चाहते थे.

मुंबई कस्टम ने किताबों के पैकेट को रोक लिया
अभिनव चंद्रचूड़ की किताब "रिपब्लिक ऑफ रेटोरिक -फ्री स्पीच एंड द कांस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया" (Republic of Rhetoric: Free Speech and the Constitution of India) में इस बारे में लिखा है कि 1959 में मुंबई के जयको पब्लिशिंग हाउस ने विदेश से इसकी कई कापियां आयात कीं. इस सामान को बांबे के कस्टम कलेक्टर ने इस आधार पर जांच के लिए रोक लिया कि इसकी सामग्री अश्लील हो सकती है.

मोरारजी देसाई चाहते थे कि किताब पर प्रतिबंध लगाया जाए. लालबहादुर शास्त्री ने अपनी नोटिंग पर इस पर बैन करने के लिए मुहर लगा दी लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस पर लंबा पत्र लिखा कि क्यों इसको बैन नहीं किया जाना चाहिए.


इसके बाद बांबे से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक "करंट" के संपादक डीएफ कराका ने वित्त मंत्री मोरारजी देसाई को एक पत्र लिखा, " ये नॉवेल बहुत आपत्तिजनक है. इसमें एक वयस्क पुरुष और 12-13 साल की नाबालिग लड़की के बीच संबंधों को ग्लोरीफाई किया गया है. ये वाकई बहुत गंदा है."

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मोरारजी चाहते थे ये प्रतिबंधित हो 
देसाई ने इस पत्र की फाइल पर नोटिंग लिखी, "मैं नहीं समझता कि अगर ये किताब अश्लील नहीं है, तो किसे अश्लील कहना चाहिए. ये तो सेक्स विकृति है. गृह मंत्रालय को इस पर सलाह लेना चाहिए." इसके बाद उन्होंने ये फाइल लालबहादुर शास्त्री के पास भेज दी. तब नेहरू ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और किताब को भारतीय बाजार में बिकने की अनुमति मिल गई.

शास्त्री भी चाहते थे बैन, तब नेहरू ने हस्तक्षेप किया
इसके बारे में पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी किताब "बियांड द लाइंस - एन आटोबायोग्राफी" में लिखा है. उन्होंने लिखा, "कांग्रेस के किसी नेता ने लालबहादुर शास्त्री को लिखा कि पुस्तक भंडारों में अभी अभी पहुंची लोलिता इतनी अश्लील है कि इसे बैन कर देना चाहिए. शास्त्री ने इसी संबंध में नेहरू को लिखा.
अगली सुबह नेहरू का जवाब आ पहुंचा. (वो सभी पत्रों का जवाब 24 घंटे के अंदर दे देते थे). उन्होंने इस विषय पर विस्तार से बहस करते हुए लिखा कि लोलिता को क्यों बैन नहीं किया जाना चाहिए और लेडी चटर्लीज लवर पर आगे भी बैन क्यों जारी रहना चाहिए." लोलिता को बैन नहीं किया गया.

नॉवेल लोलिता पर आधारित दो फिल्में भी बाद में बनाई गईं. आधुनिक साहित्य में इस किताब को एक अच्छा काम माना जाता है


अमेरिका को छोड़ दुनियाभर में बैन हुई
हालांकि ये किताब दुनिया के तमाम देशों में बैन हुई. जिसमें फ्रांस, सोवियत संघ, इंग्लैंड, अर्जेंटीना, न्यूजीलैंड, आदि शामिल थे लेकिन अमेरिका में ये बैन नहीं हुई थी. किताब के आने के बाद उस पर ब्रिटेन और फ्रांस में प्रतिबंध लगा दिया गया. ब्रिटेन में यह रोक 1959 तक रही.

अब तक 05 करोड़ कापियां बिक चुकी हैं
.हकीकत ये भी थी कि जैसे ही ये किताब छपी. तीसरे दिन ही ये सारी की सारी बिक गई.  इसे फिर छापना पड़ा. इसके बाद इसका प्रिंट आर्डर बढ़ता ही गया. इसकी अब तक पांच करोड़ प्रतियां छप चुकी हैं, इस पर दो फिल्में भी बन चुकी हैं.

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क्या है किताब में
व्लादीमीर नबोकोव द्वारा लिखी यह किताब एक अधेड़ आदमी हम्बर्ट और 12 साल की लड़की डोलोरस हेज़ के रिश्ते पर आधारित है. इसमें लेखक ने एक बच्ची के प्रति अपने प्यार के बारे में विस्तार से बताया है. इसलिए कोई प्रकाशक इसे छापने को तैयार नहीं था. आख़िरकार, पेरिस की एक ऐसी कंपनी ने इसे छापा, जो पोर्नोग्राफ़ी छापा करती थी.

यौन विषय की वजह से जो किताबें विवादों में इसी तरह घिरीं, उनमें प्रमुख हैं, गुस्ताव फ़्लॉबर्ट की 'मैडम बॉवरी', जेम्स जॉयस की 'यूलीसिस', डीएच लॉरेन्स की 'लेडी चैटरलीज़ लवर' और मार्किव्स डी साद की 'जस्टिन'.
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