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समझिए, आखिर क्यों ओल्ड एज लोगों पर कोरोना का खतरा ज्यादा है

News18Hindi
Updated: March 30, 2020, 11:14 PM IST
समझिए, आखिर क्यों ओल्ड एज लोगों पर कोरोना का खतरा ज्यादा है
संक्रमित हो चुके मरीजों पर हुई स्टडी में देखा गया कि ज्यादातर मरीज 70 पार के थे

जब कोरोना वायरस (coronavirus) शरीर पर हमला करे तो सबसे पहले हमारे इम्यून सिस्टम (immune system) को उसे फॉरेन एजेंट की तरह पहचानना होता है, तभी वो बीमारी से लड़ पाता है.

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  • Last Updated: March 30, 2020, 11:14 PM IST
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तीन महीने पहले चीन से शुरू हुआ कोरोना वायरस (Coronavirus) पूरी दुनिया में पैर पसार चुका है. 7 लाख से ज्यादा संक्रमण और 35000 मौतों के बीच ये भी देखा गया कि कोरोना वायरस का खतरा एक निश्चित उम्र के लोगों को ज्यादा है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (World Health Organization) ने कोरोना वायरस पर रिस्क एसेसमेंट करते हुए ये कहा कि 65 पास के बुजुर्गों पर ये वायरस जल्दी अटैक करता है और उनमें बीमारी की गंभीरता भी ज्यादा होती है.

फरवरी के मध्य में चीन में ही लगभग 70 हजार मरीजों को इस स्टडी में शामिल किया गया था. इसमें देखा गया कि लगभग 44,700 मरीजों में से 80 प्रतिशत लोगों की उम्र कम से कम 60 साल से ज्यादा थी और इसमें से भी आधे मरीज 70 साल या इससे अधिक उम्र के थे. ये स्टडी China CDC Weekly में प्रकाशित हुई. इसके बाद दूसरे देशों में मिलते-जुलते आंकड़े नजर आए. जैसे इटली में सामने आए पहले 12 मरीजों में से सभी 80 साल की उम्र के आसपास थे. फिर तो ये आंकड़ा बढ़ता ही गया. WHO की हालिया रिपोर्ट के अनुसार अगर मरीज की उम्र 80 के आसपास है तो बीमारी के जानलेवा होने का खतरा 14.8% हो जाता है. 70 साल के लोगों के लिए इसका औसत 8.0% है, जबकि 60 से 70 के बीच ये आंकड़ा 3.6% है.

इसी वजह से सभी प्रभावित देशों में बुजुर्गों को सेल्फ क्वेरेंटाइन में रहने की सलाह दी जा रही है. लेकिन ऐसा क्या है जो बुजुर्गों में इस बीमारी का खतरा इतना बढ़ा हुआ है.



सभी प्रभावित देशों में बुजुर्गों को सेल्फ क्वेरेंटाइन में रहने की सलाह दी जा रही है




इसकी एक वजह उनका कमजोर हो चुका इम्यून सिस्टम है. जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, हमारी कोशिकाओं की रीजेनरेशन की क्षमता कम होने लगती है और इसके साथ ही बीमारियों से लड़ने की क्षमता भी कम हो जाती है. उम्र के साथ कई बीमारियां भी होती हैं जैसे दिल की बीमारियां (कार्डियोवस्कुलर डिसीज), डायबिटीज, कमजोर हो चुके फेफड़े और कैंसर.

चीन में संक्रमित हो चुके मरीजों पर हुई स्टडी में देखा गया कि ज्यादातर मरीज 70 पार के थे. साथ ही उनका स्वास्थ्य 'कॉम्प्रोमाइज्ड' था. यानी उन्हें डायबिटीज या फेफड़ों से जुड़ी कोई न कोई परेशानी थी, जैसे कि अस्थमा और chronic obstructive pulmonary disease (COPD). हाई बीपी और हाई कोलेस्ट्रॉल भी कोरोना के हमले का खतरा बढ़ा देता है क्योंकि इससे दिल को खून पंप कर शरीर तक पहुंचाने के लिए ज्यादा मेहनत करनी होती है. इससे इम्युनिटी पर खराब असर होता है. अगर कोई बीमार है और उम्र भी 65 या उससे ऊपर है तो कोरोना वायरस के संक्रमण का खतरा दोगुना हो जाता है.

उम्रदराज लोगों पर टीका भी खास प्रभावी नहीं होता है और उन्हें बूस्टर शॉट या दवाएं लेनी पड़ती हैं


जब कोरोना या किसी भी वायरस का शरीर पर हमला हो तो सबसे पहले हमारे इम्यून को उसे फॉरेन एजेंट की तरह पहचानना होता है, तभी वो बीमारी से लड़ पाता है. उम्रदराज लोगों में चूंकि इम्यून सिस्टम कमजोर हो चुका होता है तो उनका शरीर वायरस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं कर पाता और बीमार हो जाता है. इम्यून सिस्टम का अहम हिस्सा सफेद रक्त कोशिकाएं हैं. ये हमारे बोन मैरो में बनती हैं और फिर शरीर के अलग-अलग हिस्से में घूमती हैं. यही वायरस या किसी बैक्टीरिया से लड़ने का काम करती हैं. बुजुर्गों में बोन मैरो में होने वाली ये प्रक्रिया काफी कमजोर हो जाती है और उनके पास फॉरेन एजेंट से लड़ने के लिए बहुत कम ही कोशिकाएं रहती हैं.

कोरोना वायरस जैसे ही हमारे ऊपर वायुमार्ग में पहुंचे तो जरूरी है कि हमारा शरीर उसे पहचान ले. अगर वो फेफड़ों तक पहुंच जाता है, तो बीमार होना तय है. बूढ़े लोगों में वायरस को बाहरी तत्व की तरह न पहचाने जाने के कारण परेशानी होती है. वायरस आसानी से शरीर के अंदर पहुंच जाता है और मल्टीप्लाई होने लगता है.

इसके अलावा एक और बात है जिसकी वजह से 65 की उम्र से ज्यादा वालों पर कोरोना का खतरा ज्यादा है. हमारे इम्यून सिस्टम को न केवल वायरस को फॉरेन एजेंट की तरह पहचानना होता है और लड़ना भी होता है, बल्कि लड़ते हुए सफेद रक्त कोशिकाओं को ये ध्यान रखना होता है कि उनसे स्वस्थ लाल कोशिकाओं को खतरा न हो. स्वस्थ और बीमार कोशिकाओं में पहचान न कर पाने के लिए सफेद कोशिकाएं सबपर हमला करने लगती हैं, इसे "cytokine storm" कहते हैं. ये रोगी के लिए बहुत खतरनाक हालात है. इन्हीं वजहों से उम्रदराज लोगों पर टीका भी खास प्रभावी नहीं होता है और उन्हें बूस्टर शॉट लेना पड़ता है.

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First published: March 30, 2020, 6:57 PM IST
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