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क्यों बिहार के बक्सर जेल की रस्सी से ही दी जाती है देशभर में फांसी

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Updated: December 9, 2019, 8:11 PM IST
क्यों बिहार के बक्सर जेल की रस्सी से ही दी जाती है देशभर में फांसी
बक्सर जेल की रस्सी ही होती है देशभर में फांसी की सजा में इस्तेमाल

दिल्ली में वर्ष 2012 में हुए निर्भया गैंगरेप और मर्डर में अब चारों गुनहगारों को फांसी दी जाने वाली है. फांसी की रस्सी बिहार के बक्सर जेल से आती है. ये सवाल सवाल है कि पूरे देश में पिछले करीब 90 सालों से फांसी की रस्सी वहीं से क्यों भेजी जाती है, क्या होती है उसकी खासियत

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दिल्ली के निर्भया गैंगरेप और मर्डर कांड के चारों गुनहगारों को दिसंबर के तीसरे हफ्ते या 16 दिसंबर तक फांसी दे दी जाएगी. फांसी के लिए बक्सर जेल को रस्सी भेजने का आर्डर दे दिया गया है. जेल में रस्सी बनने शुरू हो चुकी है. आइए जानते हैं कि आखिर देशभर में जहां कहीं फांसी की सजा दी जाती है, वहां बक्सर जेल की ही रस्सी का इस्तेमाल क्यों होता है.

आमतौर पर बक्सर जेल में किसी फांसी से पहले रस्सियों को बनाने का काम शुरू हो जाता है. लेकिन इसकी असली फिनिशिंग आखिर के दस या 15 दिन पहले दी जाती है. आमतौर पर जेल के पास एक से दो महीने पहले ही इस रस्सियों के लिए आदेश पहुंच जाता है.

पिछले कुछ दशकों में देश में जहां कभी भी फांसी हुई है, वहां फांसी का फंदा बनाने के लिए रस्सी बक्सर जेल से ही गई है. चाहे वो असमल कसाब को पुणे जेल में दी गई फांसी हो या फिर वर्ष 2004 में कोलकाता में धनजंय चटर्जी को दी गई फांसी. अफजल गुरु को भी फांसी बक्सर जेल की ही रस्सी से दी गई.

कब से बक्सर में बन रही हैं फांसी की रस्सियां

बक्सर में फांसी की रस्सियां 1930 से बनाई जा रही हैं. यहां बनी रस्सी से जब भी फांसी दी गई तो वो कभी फेल नहीं हुई. दरअसल ये जो रस्सी होती है, ये खास तरह की होती है, इसे मनीला रोप या मनीला रस्सी कहते हैं, माना जाता है कि इससे मजबूत रस्सी होती ही नहीं. इसीलिए पुलों को बनाने, भारी बोझों को ढोने और भारी वजन को लटकाने आदि में इसी का इस्तेमाल किया जाता है.

चूंकि ये रस्सी सबसे पहले फिलीपींस के एक पौधे से बनाई गई थी, लिहाजा इसका नाम मनीला रोप या मनीला रस्सी पड़ा. ये खास तरह की गड़ारीदार रस्सी होती है. पानी से इसपर कोई असर नहीं पड़ता बल्कि ये पानी को सोख लेती है. इससे लगाई गई गांठ पुख्ता तरीके से अपनी पकड़ को दमदार बनाकर रखती है.

इस रस्सी को मनीला रोप भी कहते हैं, क्योंकि सबसे पहले ये फिलीपींस में होने वाले एक खास पौधे से बनाई जाती थी
क्लाइमेट भी यहां की रस्सी को बनाती है दमदार
बक्सर जेल में इस तरह की रस्सी बनाने वाले एक्सपर्ट हैं. यहां के कैदियों को भी इसे बनाने का हुनर सिखाया जाता है. यहां के खास बरांदा में इसे बनाने का काम किया जाता है. पहले तो रस्सी बनाने के लिए जे-34 कॉटन यार्न खासतौर पर भटिंडा पंजाब से मंगाया जाता था लेकिन अब इसे गया या पटना से ही प्राइवेट एजेसियां सप्लाई करती हैं.

कहा जाता है कि जेल के करीब गंगा नदी के बहने से वहां से आने वाली आर्द्रता भी इसकी मजबूती और बनावट पर खास असर डालती है.

रस्सी में होता है कई चीजों का इस्तेमाल 
फांसी के लिए रस्सी को और खास तरीके से बनाते हैं. इसमें मोम का भी इस्तेमाल करते हैं. इसको बनाने में सूत का धागा, फेविकोल, पीतल का बुश, पैराशूट रोप आदि का भी इस्तेमाल होता है. जेल के अंदर एक पावरलुम मशीन लगी है, जो धागों की गिनती कर अलग-अलग करती है.एक फंदे में 72 सौ धागों का इस्तेमाल होता है.

यही है वो बक्सर जेल, जहां खासतौर पर वो रस्सी बनाई जाती है जो देशभर में फांसी देने के काम में इस्तेमाल की जाती है


कितनी बड़ी होती है फांसी की रस्सी
जेल में इसका आर्डर पहुंचते ही उस पर काम शुरू हो जाता है. आमतौर पर एक फांसी के लिए छह मीटर लंबाई की रस्सी का इस्तेमाल होता है लेकिन कभी कभी जिसे फांसी दी जाने वाली है, उसकी लंबाई के हिसाब से भी रस्सी की लंबाई तय होती है. इसका वजन चार किसो या इससे ज्यादा होता है.

इस रस्सी की कीमत एक हजार रुपए से लेकर दो हजार रुपए के बीच बैठती है. लेकिन इस रस्सी में जो भी सामान लगता है, उसकी कीमत बढ़ गई है, लिहाजा इस बार ये रस्सी मंहगी हो गई है. इस पर वैट भी लगाया जाता है.

बक्सर जेल में बनने वाली फांसी की रस्सी 80 किलो से ज्यादा का वजन लटका सकती है


कितना वजन लटका सकती है ये रस्सी
माना जाता है कि जब किसी व्यक्ति को फांसी दी जाती है तो 80 किलो वजन वाले शख्स को ये आसाम से लटका सकती है. हालांकि जहां फांसी जाने वाली होती है, वहां इस रस्सी को एक हफ्ते पहले ही पहुंचाने की कोशिश की जाती है ताकि जल्लाद तीन से चार दिन इसके जरिए ड्राइरन यानि अभ्यास कर सके कि फांसी देते समय सबकुछ सही तरीके से रहे.

इस रस्सी के पहुंचने के बाद इसमें लूप बनाने और गोल फंदा बनाने के साथ ये गर्दन पर आसानी से सरककर उस पर कसती जाए, ये काम जल्लाद का होता है. जल्लादों का कहना है ये भी तकनीक से जुड़ा काम है.

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First published: December 9, 2019, 8:10 PM IST
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