पाकिस्तान को एक ही हफ्ते में क्यों तीन बार नीचा देखना पड़ा

पाकिस्तान को बीते हफ्ते में जिन तीन झटकों का सामना करना पड़ा, वो उसने सोचे तो कतई नहीं होंगे, लेकिन जिस रास्ते पर वो पिछले कुछ सालों से चल रहा था, उसके परिणाम अब उसके सामने आने शुरू हो चुके हैं

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: June 17, 2019, 8:05 PM IST
Sanjay Srivastava
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: June 17, 2019, 8:05 PM IST
पाकिस्तान को एक हफ्ते में तीन बड़ी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है. एक एक करके उसे ये तीनों झटके इस तरह लगे हैं कि उसकी हालत दयनीय हो गई है. यूं तो झटके लगते रहते हैं लेकिन पाकिस्तान को जिस तरह ये झटके सात दिनों में एक के बाद एक लगे हैं, वैसा शायद उसके साथ पहली बार हुआ है. ये झटके अलग अलग क्षेत्रों में लगे हैं.
ये झटके आतंकवाद से लेकर एशियाई डेवलपमेंट बैंक से लोन की आस टूटने के अलावा क्रिकेट मैदान पर लगे हैं. पाकिस्तान को उम्मीद भी नहीं थी कि उसे ये झटके इतनी जल्दी जल्दी और इस तरह मिलने वाले हैं.

पहला झटका
बीते हफ्ते जब किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई को-आपरेशन आर्गनाइजेशन की मीटिंग हुई तो पहली बार आतंकवाद के खिलाफ आवाज भी उठी. भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों से लगातार पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर घेर रहा है. पाकिस्तान को अब उसके शुभचिंतक भी आतंकवादियों को प्रश्रय देने वाला देश मानने लगे हैं.

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एससीओ में पाकिस्तान के पास आतंकवाद से घिरे जाने के बाद बचने का कोई रास्ता नजर नहीं आया. ये तो सारी दुनिया को मालूम है कि किस तरह हाफिद सईद, मसूद अजहर और दाऊद इब्राहिम संयुक्त राष्ट्र की आतंकी लिस्ट में होने के बाद भी पाकिस्तान की शरण में छिपे बैठे हैं. एससीओ में सभी देश समझ रहे थे कि अगर भारत आतंकवाद पर कठोर कदम उठाने की बात कर रहा है तो उसके निशाने पर कौन है.

पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका तब आया जबकि इस संगठन के घोषणापत्र आतंकवाद का जिक्र किया गया. ये संकल्प लिया गया कि आतंकवाद पर कार्रवाई की जरूरत है. इससे भी बड़ी बात ये थी कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को वो तवज्जो इस मंच मिलती हुई नजर आई. वो आमतौर पर बुझे बुझे रहे.
SCO meeting
एससीओ मीटिंग में पाकिस्तान जिस तरह आतंकवाद को लेकर निशाने पर रहा, वो उसके लिए झटका ही था


दूसरा झटका कहीं ज्यादा तगड़ा
ये पाकिस्तान के लिए शायद सबसे बड़ी शर्मिंदगी थी जबकि एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) ने 3.4 अरब डॉलर की मदद पाकिस्तान को देने की बात से इनकार कर दिया. इससे पहले पाकिस्तान सरकार ने जोरशोर से मुनादी पीट दी थी कि उसे एडीबी से 3.4 अरब डॉलर का बजट सपोर्ट मिलेगा. यानि साफ था कि पाकिस्तान अपना जो भी बजट तैयार करने वाला था और उसमें जो प्रावधान करने वाला था, वो इस सहायता के आधार पर होता.
पाकिस्तान ने अपने दो सीनियर अफसरों को एशियाई डेवलपमेंट बैंक से बातचीत करने के लिए भेजा था. जिन्होंने लौटकर कहा कि एडीबी मान गया है और लोन मिल जाएगा. बस तुरंत पाकिस्तान में सरकार के स्तर पर खुशी की लहर दौड़ पड़ी. उत्साह में आकर इसकी घोषणा भी कर दी गई.

एशियन डेवलपमेंट बैंक ने पाकिस्तान को बड़ा झटका दिया है


जैसे ही ये बात सार्वजनिक हुई, त्यों एडीबी ने खंडन कर दिया. उसका कहना था कि अभी हम विचार कर रहे हैं, किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे हैं. इससे पहले कई वित्तीय संस्थाएं पाकिस्तान को लोन देने से मना कर चुकी हैं. इंटरनेशनल मानेटरी फंड (आईएमएफ) ने लोन देने पर सहमति तो दी है कि लेकिन वो उसे तभी मिलेगा जबकि आईएमएफ का डायरेक्टर्स बोर्ड उस पर हरी झंडी दिखाए. यानि फिलहाल पाकिस्तान की स्थिति लटके हुए त्रिशंकु की तरह हो गई है.

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आर्थिक दुश्वारियों ने इमरान खान सरकार की हालत पतली कर रखी है. आतंकवाद के चलते उसकी रेटिंग बहुत खराब है. खुद उनके समझ में नहीं आ रहा कि अब करें तो क्या करें.

तीसरी शर्मिंदगी क्रिकेट मैदान से

करीब एक महीने पहले पाकिस्तान के क्रिकेट लीजेंड जावेद मियांदाद ने दावा किया था कि अगर पाकिस्तान टीम को जीत की लय मिल गई तो वो किसी के रोके नहीं रुकने वाली. लेकिन वर्ल्ड कप में पाकिस्तान की टीम कुछ नहीं कर पा रही है.

वर्ल्ड कप में रविवार को भारत से उसके मैच को लेकर पाकिस्तान बहुत उत्साहित थे. खुद प्रधानमंत्री इमरान खान ने टीम को जीत के गुर सिखाए थे. माना जा रहा था कि इस मैच में पाकिस्तान वर्ल्ड कप में लगातार छह हार को तोड़कर जीतेगी ही जीतेगी.
मैच से पहले पाकिस्तान में जमकर भारत की खिल्लियां उड़ाई गईं. मजाक बनाया गया. दावे हुए. माहौल ऐसा बना कि लगा वाकई पाकिस्तान कड़ी टक्कर देने जा रहा है. यूं भी जब भारत के खिलाफ मैच होता है तो वो पाकिस्तान के लिए हमेशा राष्ट्र की गरिमा और गर्व से जोड़कर देखा जाने लगता है. और हर बार इस तरह के दावे टूट भी जाते हैं.

पाकिस्तान क्रिकेट टीम की बुरी हार भी किसी बड़ी शर्मिंदगी से कम नहीं थी


हार-जीत तो चलती रहती है लेकिन जिस तरह की हार का सामना पाकिस्तान ने मैनचेस्टर के मैदान पर किया, उससे साबित हो गया कि पाकिस्तान की क्रिकेट भारत से बहुत पीछे जा चुकी है. हालांकि उसकी वजहें पाकिस्तान के आर्थिक हालात से लेकर देश में कानून व्यवस्था की खराब स्थिति तक से जुड़ी हैं. पिछले एक -डेढ दशक से कोई विदेशी टीम पाकिस्तान आना नहीं चाहती. पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का खजाना खाली है. खिलाड़ियों में वो स्तर भी नहीं रहा, जो एक जमाने में होता था.
लेकिन पाकिस्तान की 89 रनों की हार ने दो बड़े झटकों से परेशानहाल इस देश को तीसरी बार नीचा देखने की स्थिति बना दी. अब लोग गुस्सा करके खीझ उतार रहे हैं. अपनी क्रिकेट टीम को वापस बुलाने की मांग कर रहे हैं. हालांकि ऐसी स्थिति पाकिस्तान ने 1992 के वर्ल्ड कप में भी देखी थी लेकिन तब और अब में बहुत अंतर है.

पाकिस्तान के लिए सोचने का समय 
हालांकि पाकिस्तान के लिए सोचने का समय है कि उसका ये हाल क्यों हो गया और वो किस ओर जा रहा है. निश्चित तौर पर उसे आर्थिक स्थिति पटरी पर लानी होगी लेकिन ये तब तक नहीं होगा जब तक वो आतंकवादियों को स्पांसर करना बंद नहीं करता.

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