अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान से घर वापसी पर PAK क्यों डर रहा है?

अमेरिका समेत सभी नाटो देश अफगानिस्तान से अपने सैनिकों की वापसी की तैयारी कर रहे हैं- सांकेतिक फोटो (pxhere)
अमेरिका समेत सभी नाटो देश अफगानिस्तान से अपने सैनिकों की वापसी की तैयारी कर रहे हैं- सांकेतिक फोटो (pxhere)

साल 2001 से अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों (American soldiers in Afghanistan) समेत नाटो (NATO) के हजारों सैनिक तैनात हैं. डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump)अब सैनिकों की वापसी चाहते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 30, 2020, 3:49 PM IST
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अमेरिका समेत सभी नाटो देश अफगानिस्तान से अपने सैनिकों की वापसी की तैयारी कर रहे हैं. इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान (Pakistan prime minister Imran Khan) ने एक चौंकाने वाला बयान दिया. उनके मुताबिक फिलहाल अमेरिकन आर्मी का अफगानिस्तान (American army withdrawal from Afghanistan) से लौटना ठीक नहीं. ऐसा करने पर लगभग दो दशकों से अफगानिस्तान में हो रही शांति की तमाम कोशिशों पर पानी फिर जाएगा. जानिए, क्यों अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों का हटना इमरान सरकार को डरा रहा है.

क्या है फिलहाल मामला
फिलहाल कतर की राजधानी दोहा में अंतर-अफगान शांति वार्ता चल रही है. इसमें तालिबान और अफगान सरकार के अलावा अमेरिका के प्रतिनिधि भी हिस्सा ले रहे हैं. साथ ही कई नाटो देश के लोग भी शामिल हैं. माना जा रहा है कि इस बैठक के बाद तय हो सकेगा कि साल 2001 से अफगान में तैनात विदेशी सैनिक कब अपने देश लौट सकेंगे. साथ ही इसके बाद अफगानिस्तान के गृहयुद्ध से बचकर भागे शरणार्थी भी विदेशी धरती को छोड़कर अपने देश लौट सकेंगे. हालांकि इमरान सरकार नहीं चाहती कि अमेरिकी सैनिक अफगानी धरती को छोड़ें.

अफगानिस्तान से सैनिकों की वापसी की बात पाकिस्तानी PM इमरान खान को खटक रही है

ऐसा क्या है जो पाकिस्तान को खटक रहा है


ये समझने के लिए इतिहास को समझना होगा. साल 2001 में 9/11 हमले के बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ जंग का एलान कर दिया था. लाखों अमेरिकी सैनिक वहां भेजे गए, जिसमें से हजारों चरमपंथी हमलों में लगातार मारे जाते रहे. साल 2001 के बाद अमरीका ने अफगानिस्तान में अपनी मौजूदगी को बरकरार रखा.

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हजारों सैनिक हैं तैनात
वर्तमान में करीब 14 हजार अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में तैनात हैं. ये अफगान सैनिकों को प्रशिक्षण दे रहे हैं और चरमपंथियों के हमलों पर जवाबी कार्रवाई भी कर रहे हैं. वहीं नाटो और दूसरे सहयोगियों के करीब 6 हजार सैनिक अफगान सैनिकों की मदद कर रहे हैं.

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ट्रंप ने किया था सैनिकों की घर वापसी का वादा
अफगानिस्तान में अमेरिकी दखल की सबसे बड़ी बात ये रही कि उस देश को चरमपंथियों से मुक्ति दिलाने के लिए सैनिकों की तैनाती का खर्च अमेरिकी नागरिकों से टैक्स के तौर पर वसूला जाता रहा. ये काम बुश के समय से हो रहा है. अब साल 2016 में ट्रंप ने राष्ट्रपति पद के लिए चुनावों के दौरान इसपर एतराज जताया था. साथ ही उन्होंने वादा किया था कि अफगानिस्तान में अब चूंकि पहले से बेहतर हालात हुए हैं, लिहाजा वहां से अमेरिकी सैनिक बुला लिए जाएंगे.

सैनिकों की तैनाती का खर्च अमेरिकी नागरिकों से टैक्स के तौर पर वसूला जाता रहा- सांकेतिक फोटो (flickr)


शांति वार्ता पर जोर दिया जा रहा
हालांकि ट्रंप जिसे बेहतर हालात मान रहे हैं, विशेषज्ञों के मुताबिक वो बीते एक दशक में सबसे खराब हालात हैं. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान में साल 2018 जनवरी से जून तक 1692 नागरिकों की युद्ध के दौरान मौत हुई है. संस्था के मुताबिक अफगानिस्तान में साल 2008 के बाद युद्ध में मरने वालों की यह संख्या सबसे ज्यादा है. माना जा रहा है कि ट्रंप को ये समझ आ गया कि अफगानिस्तान में तालिबानियों का सफाया बंदूक से नहीं हो सकता, लिहाजा वे शांति वार्ता पर जोर दे रहे हैं. सैनिकों की वापसी की बात भी इसलिए ही हो रही है.

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क्या मानना है इमरान का
यूरेशियन टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगले महीनेभर में अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हैं. इसे देखते हुए भी ट्रंप सैनिकों की घर वापसी की पहल कर रहे हैं. हालांकि वॉशिंगटन टाइम्स में एक कॉलम में पाक पीएम इमरान खान इसे जल्दबाजी कह रहे हैं. उनके मुताबिक पाकिस्तान ने भी अफगान में तालिबानियों का आतंक खत्म करने में अहम भूमिका निभाई है. वे कहते हैं कि 9/11 के बाद से 80,000 से ज्यादा पाक सैनिकों और आम पाकिस्तानी नागरिकों की जान इस शांति बहाली में गई. अब अचानक से अमेरिका ने अपने सैनिक वापस बुलाने का एलान कर दिया है. इससे शांति बहाल होने से पहले ही खत्म हो सकती है.

पाकिस्तान को डूरंड रेखा पर चरमपंथियों का हमला तेज होने का डर है


पाकिस्तान को आतंक का डर सता रहा
इमरान सरकार को ये भी डर है कि अमेरिकी सैनिकों के हटने के बाद आतंकी मजबूत हो जाएंगे और पाकिस्तान में आतंक फैलाएंगे. बता दें कि पाक और अफगानिस्तान लगभग 2500 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करते हैं जिसे डूरंड रेखा कहते हैं. इस सीमा पर और आसपास आएदिन तनाव होते रहते हैं. इसका असर इस्लामाबाद और काबुल पर भी दिखता है. कई बार दोनों ही देशों के राजदूतों आपस में बुरा व्यवहार कर चुके हैं.

क्रेडिट न मिलने का मलाल भी है पाक PM को
डूरंड रेखा पर चरमपंथियों का हमला तेज होने के अलावा पाक सरकार को एक और भी मलाल है. उसे लगता है कि अफगानिस्तान में शांति लाने में उसकी भूमिका सबसे अहम रही, जिसे अमेरिका ने नजरअंदाज कर दिया. इमरान वॉशिंगटन पोस्ट से इसका अफसोस जताते हुए कहते भी हैं कि हमें न्यूट्रल रहना चाहिए था, वो ज्यादा बेहतर होता. ये और बात है कि खुद अमेरिका कई बार पाकिस्तान की तारीफ कर चुका है. जो भी हो, फिलहाल अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान से घर वापसी की ट्रंप की बात को चुनावी तौर पर देखा जा रहा है. दो दशकों से अफगानिस्तान में बसे सैनिकों को वापस बुलाना ट्रंप का चुनावी वादा था, जो दूसरा कार्यकाल पाने के लिए ट्रंप पूरा करने की कोशिश में हैं.
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