Parshuram Jayanti 2021 : परशुराम ने आखिर क्यों मां की फरसे के एक ही वार से कर दी थी हत्या

परशुराम बहुत क्रोधी स्वाभाव वाले ऋषि थे. उनके क्रोध के एक नहीं तमाम किस्से प्रचलित हैं.

परशुराम बहुत क्रोधी स्वाभाव वाले ऋषि थे. उनके क्रोध के एक नहीं तमाम किस्से प्रचलित हैं.

Parshuram Jayanti : आज परशुराम जयंती है. जब भी इस भारतीय ऋषि की बात चलती है तो उनके क्रोधी स्वाभाव का जिक्र जरूर होता है. एक बार पिता के कहने पर उन्होंने अपनी मां की हत्या कर दी, फिर उसके बाद क्या हुआ.

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भारतीय ऋषियों और गुरुओं की परंपरा में परशुराम का जिक्र जरूर होता है. आज उनकी जयंती है. वो क्रोधी स्वाभाव वाले ऋषि थे. उनमें क्षत्रियों के प्रति इतनी नाराजगी थी कि उन्होंने उन्हें धरती से खाली करने की शपथ खाई थी. परशुराम को लेकर तमाम किस्से कहानियां हैं. एक बात अक्सर कही जाती है कि उन्होंने अपने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए मां की हत्या कर दी थी. जानते हैं कि इसकी वजह थी क्या.

परशुराम के बारे में एक बड़ी खास बात ये भी है कि उन्हें अमरता का वरदान मिला हुआ था. उन्होंने रामायण और महाभारत, दोनों में अपना असर दिखाया था. इसलिए उनकी जिंदगी के कुछ किस्से महाभारत से जुड़े हैं तो कुछ रामायण से.

हैरान करने वाली घटना

परशुराम ने अपनी मां की हत्या क्यों की. ये घटना भी हैरान करने वाली है. हालांकि उन्होंने अपने मन से ऐसा बिल्कुल नहीं किया था. इसकी वजह इस तरह थी. हालांकि जब परशुराम ने मां की हत्या कर दी तो उनके पिता समेत हर कोई अवाक रह गया. फिर उन्होंने एक और काम किया जो इसी हैरानी को और बढ़ाने वाला था.
मां से नाराज हो गए ऋषि पिता 

दरअसल परशुराम की मां रेणुका जल का कलश लेकर नदी गईं थीं. उन्हें वहां से कलश में जल भरकर लौटना था. नदी में गंधर्व चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था. उसे देखने में रेणुका इतनी तल्लीन हो गईं कि उन्हें जल लेकर लौटने में देर हो गई. उधर उनके पति और ऋषि जमदग्नि यज्ञ के लिए बैठे थे. देर होने से वो यज्ञ नहीं कर पाए.

परशुराम ने मां का सिर धड़ से अलग कर दिया



परशुराम के पिता गुस्से से लाल-पीले हो रहे थे कि तभी रेणुका जल लेकर लौट आईं. उनके आते ही ऋषि जमदग्नि क्रोध में दहाड़े. उन्होंने अपने चार पुत्रों से तुरंत उनकी मां का वध करने को कहा. तीनों बेटों ने ये बात सुनी लेकिन वो सिर झुकाकर खड़े हो गए. लेकिन परशुराम ने ऐसा नहीं किया. बल्कि उन्होंने अपना फरसा उठाया. एक ही वार में मां का सिर धड़ से अलग कर दिया.

हर कोई रह गया स्तब्ध 

परशुराम के ऐसा करते ही हर कोई स्तब्ध रह गया. उनके पिता को उम्मीद नहीं थी कि परशुराम उनकी आज्ञा मानने के लिए यहां तक जा सकते हैं. एक ओर वो अपनी पत्नी की हत्या से दुखी थे तो दूसरी ओर ये देखकर खुश कि उनका ये बेटा उनकी कितनी बात मानता है. उन्होंने परशुराम से वरदान मांगने को को कहा. परशुराम ने तुरंत पिता से चार वरदान मांगे

- मां फिर से जिंदा हो जाएं

- उन्हें ये याद ही नहीं रहे कि उनकी हत्या की गई थी

- उनके सभी भाई भी स्तब्ध अवस्था से सामान्य स्थिति में लौट आएं

इन वरदानों के साथ पिता ऋषि जमदग्नि ने उन्हें अमर रहने का वरदान भी दिया.

कर्ण ऋषि परशुराम का ही शिष्य था. उसने शस्त्र विद्या उन्हीं से सीखी थी. बाद में वो ऋषि के कोप का शिकार भी हुआ, क्योंकि परशुराम को लगा कि वो क्षत्रीय है

इसलिए नाराज हुए थे क्षत्रियों पर 

महर्षि जमदग्नि और रेणुका के पुत्र परशुराम ब्राह्मण होने के बाद भी कर्म से क्षत्रिय गुणों वाले थे. आखिर क्या बात थी कि उन्होंने धरती से क्षत्रियों के समूलनाश की प्रतिज्ञा कर ली थी.

एक दिन जब परशुराम बाहर गये थे तो राजा सहस्रबाहु हैहयराज के दोनों बेटे कृतवीर अर्जुन और कार्तवीर्य अर्जुन उनकी कुटिया पर आए. उन्होंने राजा द्वारा दान में दी गईं गायों और बछड़ों की जबरदस्ती छीन लिया. साथ ही मां का अपमान भी किया.

परशुराम को मालूम पड़ा तो नाराज होकर उन्होंने राज सहस्रबाहु हैहयराज को मार डाला. परिणामस्वरूप उसके दोनों बेटों ने फिर आश्रम पर धावा बोला. तब परशुराम वहां नहीं थे. उन्होंने मुनि जमदग्नि को मार डाला. जब परशुराम घर पहुँचे तो उन्हें इसकी जानकारी हुई. उन्होंने उसी समय शपथ ली कि वो धरती को क्षत्रियहीन कर देंगे.परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी के समस्त क्षत्रियों का संहार किया.

क्रोधी स्वभाव

दुर्वासा की भाँति परशुराम भी अपने क्रोधी स्वभाव के लिए विख्यात थे. 21 बार उन्होंने धरती को क्षत्रिय-विहीन किया. हर बार हताहत क्षत्रियों की पत्नियाँ जीवित रहीं और नई पीढ़ी को जन्म दिया. हर बार क्षत्रियों को मारने के बाद वो कुरुक्षेत्र की पाँच झीलों में रक्त भर देते थे. अंत में पितरों की आकाशवाणी सुनकर उन्होंने क्षत्रियों से युद्ध करना छोड़कर तपस्या की ओर ध्यान लगाया.

राम पर भी हुए थे नाराज 

रामायण में उनका जिक्र तब आता है जबकि राम ने सीता स्वयंवर में शिव का धनुष तोड़ा था. तब वो नाराज होकर वहां आए थे.लेकिन राम से मुलाकात के बाद समझ गए कि वो विष्णु के अवतार हैं. इसलिए उनकी वंदना करके वापस तपस्या के लिए चले गए.

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