ममता के पोस्टर में वो रसगुल्ला क्यों, जिसने कभी गिराई थी उनके मेंटर की सरकार

न्यूज़18 क्रिएटिव

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West Bengal Elections 2021 : राजनीति का रस अक्सर लिया जाता है, लेकिन कम होता है कि उसमें मिठास हो. पश्चिम बंगाल चुनाव 2021 के मद्देनज़र तृणमूल और भाजपा (TMC vs BJP) के बीच कड़वाहट के दौर में रसगुल्ला क्या ज़ायका लाएगा?

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  • Last Updated: March 25, 2021, 8:48 PM IST
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खानपान और व्यंजनों का संबंध राजनीति से कब नहीं रहा? कभी प्याज़ तो कभी टमाटर के भाव, कभी बीफ तो कभी मैगी पर बैन और कभी किसी खास खाद्य या व्यंजन के जीआई टैग के नाम पर होने वाली सियासत को सुर्खियां मिलती रहीं. रसगुल्ला पश्चिम बंगाल की शान और पहचान दोनों रहा है इसलिए इसका राजनीति से संबंध स्वाभाविक तौर पर होगा ही. फ़िलहाल देश भर में चाव से खायी जाने वाली यह लज़ीज़ मिठाई इसलिए चर्चा में है क्योंकि आगामी विधानसभा चुनाव के सिलसिले में ममता बनर्जी के नये पोस्टर में इसे देखा गया.

दो महीने बाद होने वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र तृणमूल कांग्रेस ने नया चुनावी स्लोगन, 'बांग्ला नीजेर मेयके ई चाए' जारी किया. नारे का मतलब तो यह है कि 'बंगाल अपनी बेटी को ही चाहे' लेकिन पूरे राज्‍य में लगवाए जा रहे इस पोस्टरों में इस स्लोगन के अलावा भी और बहुत कुछ है. जैसे, ममता बनर्जी के मेंटर और बंगाल के पूर्व सीएम ने किस तरह रसगुल्ले को बैन किया था, इस नये पोस्टर से वो याद ताज़ा होती है.

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कैसा है नये स्लोगन का पोस्टर?
तृणमूल भवन में जारी किया गए नये स्लोगन और इसके पोस्टर का मकसद क्या है, यह भी आपको बताएंगे पहले यह जानिए​ कि इस पोस्टर में क्या क्या नज़र आता है.

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तृणमूल कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर प्रचारित किया नया पोस्टर.


* एक प्लेट में सजाकर रखे गए रसगुल्ले.
* नीले रंग के बैकग्राउंड पर टीएमसी का चुनाव चिह्न, तिरंगे की लहर और ममता की बड़ी तस्वीर.
* एक पूजन थाली, जिसमें रंगोली का सामान, फूल, रोली एक कटोरी में तेल में डूबी बाती.
* बंगाली हैंडलूम की झलक.

क्या है इस पोस्टर का अर्थ?
'बांग्लार गर्व ममता' और 'दीदी के बोलो' जैसे स्लोगनों के बाद टीएमसी ने नया स्लोगन इस तरह लॉंच किया, तो इससे बंगाल की हालिया चुनावी राजनीति साफ समझ में आती है. राजनीति के रसिकों को याद आ सकता है कि 2017 में जब प्रशांत किशोर उर्फ पीके सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन का प्रबंधन संभाल रहे थे, तब नारा दिया गया था 'यूपी को पसंद है लड़कों का साथ'.

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बहरहाल, फिलहाल बंगाल में जो चुनावी राजनीति चल रही है, उसका आधार 'अपना बनाम बाहरी' बन गया है. ममता की पार्टी बीजेपी को बाहरी पार्टी के तौर पर राज्य में प्रचारित कर रही है और ये खबरें भी आ चुकी हैं कि पश्चिम बंगाल में भाजपा के पास स्थानीय प्रतिनिधि चेहरे का अभाव है. ऐसे में, 'लोकल' सेंटिमेंट को कैश करने का लक्ष्य ममता का नया पोस्टर साफ दर्शाता है, जिसमें बंगाल की पहचान और स्थानीयता ही प्रमुख है.

'बंगाल इस बार भी अपनी बेटी को ही चुनेगा' की ध्वनि देने वाले इस स्लोगन ने टीएमसी के सोशल मीडिया का भी कायाकल्प कर दिया है. पार्टी आक्रामक रूप से इस स्लोगन के प्रचार में जुट गई है, तो इस पोस्टर से छलक रहा रसगुल्ले का रस भी राजनीति के रसिक ले रहे हैं.

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जब बंगाल में हुआ था 'रसगुल्ला बैन'!
बात 1965 की है जब तत्कालीन सीएम प्रफुल्ल चंद्र सेन ने छेना मिठाई कंट्रोल आदेश जारी करते हुए दूध से बनने वाली मिठाइयों को कोलकाता यानी तब के कलकत्ता में बैन कर दिया था. बंगाली में रेडियो से भाषण देकर सेन ने कारण इस तरह बताया था :

पंजाब में दूध की सप्लाई प्रति व्यक्ति 18 आउंस प्रतिदिन है तो बिहार में 4 आउंस, लेकिन दूध और शहद के लिए ऐतिहासिक रूप से प्रसिद्ध रहे बंगाल में यह सप्लाई 3 आउंस से भी कम रह गई.


साफ तौर पर दूध की शॉर्टेज से निपटने के लिए सेन ने यह कदम उठाया था लेकिन उन्हें इसके अंजाम का अंदाज़ा शायद नहीं था. कलकत्ता हाईकोर्ट में छेना कंट्रोल आदेश को चुनौती दी गई. इससे और नाराज़ हुए सेन ने मिल्क प्रोडक्ट्स कंट्रोल संबंधी और कड़े आदेश जारी कर दिए. यहां तक बात बढ़ गई कि दूध से व्यंजन बनाकर बेचना अपराध घोषित हुआ. लेकिन इन्हें तुरंत कोर्ट में चुनौती मिली.

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रसगुल्ला बैन ने गिरा दी सरकार!
ममता बनर्जी जिन्हें अपना राजनीतिक मेंटर बता चुकी हैं, उन्हीं सेन का तब काफी विरोध हुआ. कोर्ट ने रेडियो पर सेन के भाषण और दूसरे आदेश को अवहेलना माना. सेन सुप्रीम कोर्ट तक गए लेकिन उनके पक्ष में फैसला नहीं आया. वैसे तब तक वो सीएम रहे भी नहीं थे क्योंकि उनके फैसले पर काफी विरोध, हंगामा और हड़तालें हुईं. इस मुद्दे से विपक्षी कम्युनिस्टों ने बड़ा माहौल खड़ा किया. सेन से अलग होकर कम्युनिस्टों व मुस्लिमों के समर्थन वाली बांग्ला कांग्रेस बनाने वाले अजोय मुखर्जी को 1967 चुनाव में सत्ता की चाबी मिली.

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तृणमूल कांग्रेस भवन में पोस्टर बदलने की कवायद. (Image: News18)


रसगुल्ला पॉलिटिक्स और भी है...
इस बैन के बाद बड़ी समझ यह बनी कि बंगाल के मिठाई वाले बंगाल में ही कारोबार करने को लेकर भविष्य से डर गए. इसके बाद से ही रसगुल्ला और अन्य बंगाली मिठाइयां पूरे देश भर में व्यापार के लिहाज़ से फैलना शुरू हुईं. दूसरी तरफ, 2017 में पश्चिम बंगाल को एक बड़ी जीत मिली थी, जब ओडिशा के दावे के उलट रसगुल्ले का जीआई टैग उसे हासिल हुआ यानी माना गया कि रसगुल्ला मूल रूप से बंगाल की ही मिठाई रही.
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