क्यों हल्के लक्षण वाले युवा कोरोना मरीजों का immune system ही उनके लिए जानलेवा हो रहा है?

बहुत से ऐसे मामले सुनाई दिए, जिसमें मामूली लक्षणों वाले युवा कोरोना संक्रमित की हालत एकाएक गंभीर हो जाए- सांकेतिक फोटो (news18 English)

बहुत से ऐसे मामले सुनाई दिए, जिसमें मामूली लक्षणों वाले युवा कोरोना संक्रमित की हालत एकाएक गंभीर हो जाए- सांकेतिक फोटो (news18 English)

कोरोना ने इस बार बुजुर्गों की बजाए 18 से 45 वर्ष की उम्र वालों को ज्यादा टारगेट किया. डरावनी बात ये है कि मजबूत इम्युनिटी वाले युवाओं पर हमला (coronavirus attack on youth population with better immunity) कर रहा है.

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कोरोना की दूसरी लहर हालांकि हल्की पड़ती लग रही है लेकिन इस बीच बहुत से ऐसे मामले सुनाई दिए, जिसमें मामूली लक्षणों वाले युवा कोरोना संक्रमित की हालत एकाएक गंभीर हो जाए. कई मामलों में कुछ ही घंटों के भीतर हालात बिगड़े और सामान्य लक्षणों के बाद भी मरीज की मौत हो गई. हल्का या मॉडरेट कोविड-19 कुछ लोगों के लिए अचानक गंभीर कैसे हो जाता है. विशेषज्ञ इसके लिए साइटोकिन स्टॉर्म को जिम्मेदार मान रहे हैं. इसमें अपना ही इम्यून सिस्टम शरीर के लिए खतरनाक हो जाता है.

सबसे पहले साइटोकिन को समझते हैं

साइटोकिन एक प्रतिरोधक प्रोटीन है, जो किसी संक्रमण की अवस्था में एक्टिव हो जाता है. ये पूरे शरीर की कोशिकाओं से पैदा होता है और इसका काम शरीर को संक्रमण से बचाना है. ये शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बेहतर बनाने के लिए बेहद जरूरी होता है.

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शरीर के लिए सैनिक जैसा काम 

जैसे ही शरीर पर किसी पैथोजन का हमला होता है, ये तुरंत प्रतिक्रिया करता है और बढ़ने लगता है. इससे पैथोजन कमजोर हो जाता है. इस तरह से खून में इस प्रोटीन की सीमित मात्रा संक्रमण से बचे रहने के लिए काफी जरूरी है. तब ऐसा क्या होता है जो संक्रमण से बचाने वाला प्रोटीन ही शरीर के लिए खतरा बन जाता है? इसे यानी साइटोकिन स्टॉर्म को समझने के लिए हमें एक बार पूरी प्रक्रिया समझनी होगी.

corona attack on youth
युवाओं में इम्युनिटी ज्यादा बेहतर ढंग से काम करती है - सांकेतिक फोटो (pixabay)



ये है वो घातक स्थिति 

साइटोकिन स्टॉर्म वो स्थिति है, जिसमें इम्यून सिस्टम एंटीजन को नष्ट करने की बजाए शरीर को खिलाफ ही काम करने लगता है और कई बार ये इतना तेज होता है कि स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला होने लगता है, जिसके कारण संक्रमित की मौत भी हो सकती है.

बढ़ने लगता है प्रोटीन 

युवाओं में चूंकि इम्युनिटी ज्यादा बेहतर ढंग से काम करती है तो होता ये है कि जैसे ही कोरोना वायरस शरीर में घुसते हैं, ये सिस्टम एक्टिव हो जाता है. वो वायरस को कोशिकाओं में प्रवेश से रोकता है. यहां तक तो ठीक है लेकिन गड़बड़ी तब शुरू होती है, जब ये प्रोटीन बढ़ते हुए तूफानी तेजी से मल्टीप्लाई होने लगता है.

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लापरवाही बन सकती है जानलेवा 

हल्के लक्षण होने के कारण बहुत से युवा चिकित्सक की सलाह लिए बगैर और कोरोना प्रोटोकॉल का पालन किए बगैर रहते हैं. ऐसे में साइटोकिन और तेजी से बढ़ता है ताकि खुद ही शरीर का उपचार कर सके. वो संक्रमित कोशिकाओं को नष्ट करते हुए स्वस्थ कोशिकाओं को भी मारने लगता है. इससे पूरा अंग और शरीर प्रभावित होता है.

मिसाल के तौर पर अगर मरीज के फेफड़े में संक्रमण है तो प्रोटीन के बढ़ने पर सारी कोशिकाएं मरने लगेंगी. इससे उस अंग तक खून और ऑक्सीजन नहीं पहुंच सकेगी. लंग्स के अलावा हार्ट, किडनी, लिवर को भी इससे खतरा रहता है. बहुत से युवा मरीजों की जान दिल के दौरे से जाने की खबरें आ चुकी हैं.

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साइटोकिन स्टॉर्म को साल 1918 में स्पेनिश फ्लू के दौरान मरीजों की मृत्यु होने के संभावित प्रमुख कारणों में एक माना जाता रहा- सांकेतिक फोटो (pixabay)

नब्बे के दशक में टर्म की खोज 

साइटोकिन स्टॉर्म टर्म सबसे पहले साल 1993 में कहा गया. इसे तब हाइपरसाइटोकिनेमिया कहा गया था. इसके बाद से ये टर्म लगातार इस्तेमाल में आने लगा. कोरोना संक्रमण या शरीर में दूसरे किसी संक्रमण के अलावा ऑटो-इम्यून बीमारियों में भी साइटोकिन स्टॉर्म का डर रहता है.

क्या हैं साइटोकिन स्टॉर्म के लक्षण 

इसके शुरुआती लक्षणों में तेज बुखार, शरीर में सूजन के साथ लालिमा आना, बेहद ज्यादा थकान और उल्टी होना जैसी बातें दिखती हैं. यानी कुल मिलाकर ऐसा नहीं है कि साइटोकिन स्टॉर्म केवल कोरोना मरीजों में होता है, बल्कि ये शरीर की अपनी रक्षा प्रतिक्रिया है, जो ज्यादा एक्टिव होने पर शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करने लगती है.

इन बीमारियों में मौत की मुख्य वजह 

साइटोकिन स्टॉर्म को साल 1918-20 में स्पेनिश फ्लू महामारी के दौरान मरीजों की मृत्यु होने के संभावित प्रमुख कारणों में एक माना जाता रहा. हाल के सालों में H1N1 ‘स्वाइन फ्लू’ व H5N1 ‘बर्ड फ्लू’ के मामलों में भी इसके बहुत से मरीज दिखे. इस दौरान एंटीजन को मारने के फेर में इम्यून सिस्टम ज्यादा प्रोटीन बनाने लगा, जिससे स्वस्थ ऊतक मरने लगे और मरीज के ऑर्गन फेल हो गए.

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