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सुप्रीम कोर्ट और CJI को RTI एक्ट में लाने का मामला है क्या

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Updated: November 13, 2019, 3:01 PM IST
सुप्रीम कोर्ट और CJI को RTI एक्ट में लाने का मामला है क्या
दिल्ली हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट और उसके मुख्य न्यायाधीश को आरटीआई एक्ट के दायरे में माना था

दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने अपने एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) और उसके चीफ जस्टिस (chief justice) के दफ्तर को सूचना के अधिकार के कानून (Right to Information Act) के दायरे में माना था...

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  • Last Updated: November 13, 2019, 3:01 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) और उसके मुख्य न्यायाधीश का दफ्तर आरटीआई एक्ट (RTI Act) के दायरे में आएगा. आज सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चीफ जस्टिस का दफ्तर एक पब्लिक अथॉरिटी है.न्यायिक व्यवस्था (judicial system) में पारदर्शिता (transparency) लाने के सवाल पर आज सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला दिया. हालांकि निजता और गोपनीयता का हवाला देकर इसमें कुछ शर्तें जोड़ी गई हैं.

सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने इसपर फैसला सुनाया है.  इसमें चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के साथ, जस्टिस डिवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एनवी रामना, जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपक गुप्ता शामिल हैं. फैसला पढ़ते हुए जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा कि आमलोगों के हितों को देखते हुए न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता बहाल की जाएगी. पारदर्शिता की वजह से न्यायिक आजादी कमजोर नहीं होती.

सुप्रीम कोर्ट में क्यों उठा ये मामला?

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट और उसके मुख्य न्यायाधीश का दफ्तर आरटीआई एक्ट के दायरे में आते हैं. इसलिए उन्हें अपनी संपत्ति आदि का ब्यौरा सार्वजनिक करना चाहिए. दिल्ली हाईकोर्ट के इसी फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही थी.

ये पूरा मामला एक दशक पुराना है. एक आरटीआई एक्टिविस्ट सुभाष चंद्र अग्रवाल ने 2007 में आरटीआई डालकर जजों की संपत्ति का ब्यौरा मांगा था. जब सुभाष चंद्र अग्रवाल को आरटीआई से जानकारी नहीं मिली तो उन्होंने सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन का रुख किया. सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन ने कहा कि आरटीआई में मांगी गई जजों की संपत्ति की जानकारी सुभाष अग्रवाल को दी जानी चाहिए.

सीआईसी के इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने भी सीआईसी के फैसले को बरकरार रखा. दिल्ली हाईकोर्ट ने 2009 में ये फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के खिलाफ अपील की. लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट के तीन जजों की बेंच ने फैसले को बरकरार रखा.

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दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई थी
हाईकोर्ट ने तीन जजों जस्टिस एपी शाह, जस्टिस विक्रमजीत सेन और जस्टिस एस मुरलीधर की बेंच ने सुभाषचंद्र अग्रवाल की याचिका पर अपने फैसले में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट और उसके चीफ जस्टिस का दफ्तर आरटीआई कानून के दायरे में आते हैं. सुप्रीम कोर्ट की अपील ये कहते हुए ठुकरा दी गई कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता किसी न्यायाधीश का निजी विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि यह उन्हें एक जिम्मेदारी देता है.

2010 में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल और सेंट्रल पब्लिक इंफॉर्मेशन ऑफिसर ने सुप्रीम का रुख किया. फैसले को सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी गई. इस साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट में इसपर सुनवाई हुई और अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था.

जजों को RTI एक्ट के दायरे में लाने पर विरोध क्यों?

न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए अगर जजों को आरटीआई एक्ट के दायरे में लाया जा रहा है तो इसमें गलत क्या है? इसका विरोध क्यों हो रहा है? दरअसल विरोध के पीछे कई वजहें गिनाई जा रही हैं. कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट और उसके मुख्य न्यायाधीश को आरटीआई एक्ट में लाने पर उनकी स्वतंत्रता बाधित होगी. इससे उनके कामकाज में भी व्यवधान उत्पन्न होगा.

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सूचना का अधिकार आम लोगों को मिला सबसे बड़ा अधिकार है


जानकार मानते हैं कि सूचना क्रांति और सोशल मीडिया के इस दौर में न्यायपालिका की आजादी और जानकारी हासिल करने, बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी जैसे मौलिक अधिकारों के बीच एक संतुलन होना चाहिए. न्यायपालिका में पारदर्शिता की मांग सही है. लेकिन जजों की नियुक्ति और उनके प्रमोशन के कुछ मामले ऐसे हैं, जिसे आरटीआई एक्ट के दायरे में लाना सही नहीं होगा.

एक मिसाल दी जाती है कि अगर सुप्रीम कोर्ट आरटीआई के दायरे में आ गया तो कोलेजियम सिस्टम की जानकारी सार्वजनिक करना सही होगा? सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एसए बोवडे ने भी इस पर आपत्ति जाहिर की थी. उन्होंने कहा था कि हर नागरिक की निजता के अधिकार की रक्षा होनी चाहिए और उनलोगों के नामों को सार्वजनिक करने की कोई जरूरत नहीं है, जिन्हें कोलेजियम ने न्यायाधीश के पद के लिए उपयुक्त नहीं पाया.

इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार ने भी आपत्ति जताई थी. उनका तर्क था कि इस तरह की जानकारी सार्वजनिक करना न्यायपालिका के कामकाज के लिए ठीक नहीं है. सुप्रीम कोर्ट अपने यहां हुई नियुक्तियों, प्रमोशन और ट्रांसफर की जानकारी अपनी वेबसाइट पर देता रहता है.

एक सवाल ये भी बार-बार उठता है कि सूचना के अधिकार के कानून के मुताबिक किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी हासिल करने की सीमा कितनी होनी चाहिए? क्योंकि कई बार संपत्ति और उसके खर्चों का ब्यौरा देने में बहुत सारी निजी और गोपनीय जानकारी सार्वजनिक होने का खतरा होता है. इन्हीं सब को आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट और उसके चीफ जस्टिस को आरटीआई एक्ट के दायरे में लाने पर विरोध हुआ.

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First published: November 13, 2019, 1:42 PM IST
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