क्यों देश में संकट में हैं तमाम भाषाएं, क्यों मर गईं कई बोलियां

क्यों देश में संकट में हैं तमाम भाषाएं, क्यों मर गईं कई बोलियां
भारत की लुप्त हुई एक भाषा कैगी, जिसकी ये लिपी है

14 सितंबर को हमने हिंदी दिवस (Hindi day) मनाया. इसके साथ ही देशभर में ये पूरा सप्ताह हिंदी सप्ताह (Hindi Week) के तौर पर मनाया जाता है. हालांकि ये किसी रस्म अदायगी की तरह ज्यादा है. वैसे खुश होने की बात ये है कि हिंदी बोलने वाले बढ़ रहे हैं लेकिन बहुत सी भाषाएं खत्म (Extinct of Language) भी हो रही हैं. कुछ दम तोड़ चुकी हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 15, 2020, 6:45 AM IST
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पिछले दिनों एक रिपोर्ट आई थी कि भारत में 42 भाषाएं या बोलियां संकट में हैं. इन्हें बोलने वाले महज कुछ हजार या इससे भी कम लोग बचे हैं. कुछ भाषाएं तो विलुप्त ही हो गई हैं. संकटग्रस्त भाषाओं में 11 अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की हैं. जबकि बाकी ओडिशा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, असम, उत्तराखंड, झारखंड, महाराष्ट्र, मेघालय और पश्चिम बंगाल से ताल्लुक रखती हैं. आखिर कैसे खत्म हो जाती है कोई भाषा. आइए जानते हैं

पिछले 50 साल में भारत की क़रीब 20 फीसदी भाषाएं विलुप्त हो गईं. भाषाओं के विलुप्त होने में हम रूस और अमेरिका के बाद तीसरे नंबर पर हैं.

50 साल पहले 1961 की जनगणना के बाद 1652 मातृभाषाओं का पता चला था. बाद में 1100 भाषाओं को मातृभाषा माना गया. लेकिन तमाम मानकों के आधार पर 199 भाषाओं को विलुप्त हुआ माना जा रहा है. हालांकि भाषाविद मानते हैं कि भारत में पिछले 50 सालों में 250 के आसपास भाषाएं गायब हो चुकी हैं.




कौन सी भाषाएं बढ़ रही हैं
- देश में पिछले 50 साल में हिंदीभाषी 26 करोड़ से बढ़कर 42 करोड़ से ज्यादा हो गए
- अंग्रेज़ी बोलने वालों की संख्या 33 करोड़ से बढ़कर 49 करोड़ हो गई.

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कौन सी भाषाएं लुप्त हो गईं
- भारत में दो तरह के लोगों की भाषाएं लुप्त हुईं
- एक तो तटीय इलाक़ों की भाषाएं, जहां 'सी फ़ार्मिंग' तकनीक में बदलाव से लोग शहरों की तरफ़ चले गए. उसका असर उनकी भाषाओं पर पड़ा
- दूसरे डीनोटिफ़ाइड कैटेगरी के लोग, जिन्हें बंजारा समुदाय कहा जाता है, एक समय उन्हें अपराधी माना जाता था. वे शहरों में जाकर अपनी पहचान छिपाने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे 190 समुदाय हैं, जिनकी भाषाएं बड़े पैमाने पर लुप्त हो गईं.



प्रमाणिक सर्वे क्या कहता है
"द पीपुल लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया" (पीएलएसआई) को भारत में वर्ष 2010 में लांच किया गया. ताकि जाना जा सके कि देश में कितनी भाषाएं बोली जा रही हैं. इस सर्वे में 3500 वालिंटियरों, 2000 भाषाविदों, सामाजिक इतिहासकारों और भाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर नाम के एनजीओ के अलावा वडोदरा के लोगों ने मिलकर काम किया. उन्होंने भारत में 780 भाषाएं चिन्हित कीं. ये सर्वे करीब तीन साल तक चला.

आठवीं अनुसूची में कितनी भाषाएं
देश की आठवीं अनुसूची में 22 सूचीबद्ध भाषाएं हैं. ये हिन्दी, असमी, बांग्ला, बोडो, डोंगरी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मैतेई (मणिपुरी), मराठी, नेपाली, ओडिया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू हैं.

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इसके अलावा देश में 100 गैर सूचीबद्ध भाषाएं हैं. इसके अलावा 31 अन्य भाषाएं भी हैं जिन्हें विभिन्न राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों में आधिकारिक भाषा के तौर पर मान्यता मिली हुई है.

कितना पुराना है भाषाओं का इतिहास
भारत में भाषाओं का इतिहास 70 हज़ार साल पुराना है, 10,000 साल पहले जब लोग खेती की तरफ़ मुड़े, तब भी बहुत सी भाषाएं विलुप्त हो गईं. वैसे भाषाओं को लिखने का इतिहास सिर्फ़ 4000 साल पुराना है



सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाएं
हिन्दी        42 करोड़
अंग्रेजी      49 करोड़
बंगाली      08 करोड़
तेलुगु        7.4 करोड़
मराठी       7.1 करोड़
तमिल       06 करोड़

कोई भाषा कैसे संकट में आती है
जब उसे बोलने वाले लगातार कम होते जाएं. उनकी संख्या हजार और सैकड़ों तक सिमट जाए.

कोई भाषा कैसे मृत या विलुप्त हो जाती है
मृत भाषा या विलुप्त भाषा उसे कहा जाता है, जिसे बोलने वाला कोई भी जीवित नहीं हो. चाहे उस भाषा का किसी अन्य भाषा बोलने वालों द्वारा अन्य प्रकार से उपयोग भी क्यों न हो रहा हो. मानव इतिहास में कईं भाषाएं विलुप्त हुईं. ये अब भी हो रहा है.

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दुनिया में कितनी भाषाएं बोली जाती हैं
माना जाता है कि फिलहाल दुनियाभर में 7000 से ज्यादा भाषाएं बोली जाती हैं



दुनियाभर में भाषाओं का हाल
- दुनियाभर में फिलहाल 7000 से ज्यादा भाषाएं बोली जा रही हैं
- सौ सालों में 50 फीसदी भाषाएं गायब हो जाएंगी
- फिलहाल 35 भाषाओं को बोलने वाले खत्म होने की ओर
- वर्ष 2115 तक 90 फीसदी मौजूदा भाषाएं गायब हो जाएंगी
- हर 14 दिन में मर जाती है एक भाषा
- 199 भाषाओं को तो महज अब 10-10 लोग समझते हैं
- 178 भाषाओं को 10 से 50 लोग ही बोलते समझते हैं

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