चांद की सतह छूना सबसे मुश्किल, लैंडिंग में ही क्यों फेल होते हैं मून मिशन?

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Updated: September 7, 2019, 10:25 PM IST
चांद की सतह छूना सबसे मुश्किल, लैंडिंग में ही क्यों फेल होते हैं मून मिशन?
अमेरिका का अपोलो मिशन

चांद की सतह पर स्पेसक्राफ्ट की लैंडिंग (spacecraft landing) करवाना किसी भी मून मिशन (moon mission) का सबसे मुश्किल हिस्सा होता है. जानिए आखिर ऐसा क्यों है और अब तक के मून मिशन में लैंडिंग कैसी रही है.

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किसी भी मून मिशन (moon mission) का सबसे मुश्किल हिस्सा होता है, स्पेसक्राफ्ट को चांद की सतह पर उतारना (spacecraft landing). इसी हिस्से में आकर ज्यादातर मून मिशन फेल होते हैं. चंद्रयान 2 (Chandrayaan 2) भी अपने मिशन के इसी हिस्से में आकर गड़बड़ी कर बैठा. इसरो (ISRO) के वैज्ञानिकों ने पहले ही बताया था कि मून मिशन का सबसे मुश्किल और चुनौतीपूर्ण वो 15 मिनट होंगे, जब चंद्रयान चांद की सतह पर उतरेगा. चंद्रयान 2 का लैंडर उस 15 मिनट में चांद की सतह के 2 किलोमीटर के करीब आ चुका था, जब लैंडर का संपर्क कंट्रोल रूम से टूट गया और इसरो के वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत पर पानी फिर गया.

कैसे होती है चांद की सतह पर लैंडिंग?
चांद की सतह को पहली बार 1959 में छुआ गया था. 13 सितंबर 1959 को सोवियत संघ के मून मिशन लुना 2 में पहली बार किसी मानव निर्मित यंत्र ने चांद की सतह को छुआ. अमेरिका का अपोलो 11 ऐसा पहला मून मिशन था, जिसमें एस्ट्रोनॉट्स समेत स्पेसक्रॉफ्ट ने चांद की जमीन पर कदम रखा. तारीख थी 20 जुलाई 1969.

1969 और 1972 के बीच चांद की सतह को कई बार छुआ गया. इस दौरान अमेरिकी स्पेसक्रॉफ्ट्स की 6 बार हुई लैंडिंग में एस्ट्रोनॉट्स भी शामिल थे, जबकि इस दौरान कई मानव रहित कई मून मिशन अंजाम दिए गए.

अमेरिका ऐसा एकलौता देश है, जिसने चांद पर मानवसहित मिशन को अंजाम दिया है. दिसंबर 1972 में आखिरी बार अमेरिकी एस्ट्रोनॉट्स चांद की सतह को छूकर वापस आए थे. अब तक चांद पर सभी लैंडिंग चांद के सबसे करीबी हिस्से में हुए हैं. 3 जनवरी 2019 को पहली बार चीन के स्पेसक्रॉफ्ट ने चांद के सबसे दूर के हिस्से पर लैंडिंग की.

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अमेरिका के अपोलो मिशन में चांद की जमीन पर मानव के कदम


पहली बार कैसे सोवियत संघ के स्पेसक्राफ्ट ने छुआ था चांद की सतह
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पहली बार सोवियत संघ ने अपने मून मिशन की शुरुआत की थी. सोवियत संघ के लुना 1 मिशन में स्पेसक्राफ्ट चांद की सतह को छूने में असफल रहा था. रूस के स्पेसक्राफ्ट का चांद पर लैंडिंग की कोशिश नाकाम रही. इसके बाद सोवियत संघ ने चांद पर हार्ड लैंडिंग की तैयारी शुरू कर दी.

क्या होती है सॉफ्ट और हार्ड लैंडिंग?
चांद पर स्पेसक्राफ्ट की लैंडिंग दो तरीके से होती है- सॉफ्ट लैंडिंग और हार्ड लैंडिंग. सॉफ्ट लैंडिंग में स्पेसक्राफ्ट की स्पीड को धीरे-धीरे कम करके आराम से चांद पर लैंड करवाया जाता है. हार्ड लैंडिंग में स्पेसक्राफ्ट को चांद की सतह पर क्रैश करवाया जाता है.

सोवियत संघ के लुना 2 मिशन में स्पेसक्राफ्ट को चांद पर हार्ड लैंडिंग करवाई गई. 1962 में अमेरिका ने अपने रेंजर 4 मिशन में इसी तरह की लैंडिंग करवाई थी. उसके बाद ब्रेकिंग रॉकेट्स की मदद से चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग शुरू हुई. इसमें रॉकेट की मदद से स्पेसक्राफ्ट की स्पीड कम करके सॉफ्ट लैंडिंग होती है.

रॉकेट स्पेसक्राफ्ट की गति की दिशा के विपरित में छोड़ा जाता है, ताकि उसकी वजह से स्पेसक्राफ्ट के गति में रुकावट पैदा हो और उसकी स्पीड कम हो जाए.

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भारत का चंद्रयान 2 मिशन


1966 में पहली बार सॉफ्ट लैंडिंग में कामयाबी मिली
1966 में पहली बार सोवियत संघ को अपने लुना 9 मिशन में चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग में कामयाबी हासिल हुई. लुना 9 से लेकर लुना 13 मिशन के दौरान पहली बार चांद की जमीन की फोटो खींची गई और वो धरती पर पहुंची.

अमेरिका ने अपने पहले 5 मून मिशन में मानवरहित स्पेसक्राफ्ट की सॉफ्ट लैंडिंग करवाई. 24 सितंबर 1970 को लुना 16 मिशन में सोवियत संघ के स्पेसक्राफ्ट पहली बार चांद की मिट्टी को लेकर धरती पर आया.

सोवियत संघ के लुना 15, लुना 18 और लुना 23 क्रैश लैंडिंग की वजह से फेल रहे. हाल के दिनों तक कई देशों के मून मिशन क्रैश लैंडिंग का शिकार होकर फेल हुए. इसमें स्पेसक्राफ्ट 8 हजार किलोमीटर की रफ्तार से चांद की सतह पर आकर क्रैश हो जाता है.

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First published: September 7, 2019, 4:13 PM IST
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