जब अफगान क्रिकेट टीम खेलती है तो क्यों जमकर हवाई फायरिंग करता है तालिबान

अफगान क्रिकेटरों के मोबाइल और सोशल मीडिया पर कैसे संदेश भेजते हैं तालिबानी. क्रिकेट की क्या जगह है अफगानिस्तान में.

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: June 5, 2019, 10:57 PM IST
Sanjay Srivastava
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: June 5, 2019, 10:57 PM IST
एक जमाना था जब तालिबान ने अफगानिस्तान में सभी तरह के खेलों पर प्रतिबंध लगा दिया था. जो कोई खेलता दिखता उसे गोली से उड़ा दिया जाता था. लेकिन वर्ष 2000 में तालिबान ने जब क्रिकेट से बैन उठाते हुए उसे मनोरंजक करार दिया तो ये एक हैरतभरा कदम था. जब भी अफगानिस्तान की क्रिकेट टीम अब कोई बड़ा टूर्नामेंट या मैच खेलती है तो उसके लिए शुभकामना जाहिर करने वालों में तालिबानी सबसे आगे होते हैं.

सबसे ज्यादा क्रिकेट मैच अफगानिस्तान के उन इलाकों में देखे और सुने जाते हैं जो तालिबान नियंत्रित या असर वाला है. यहां तक की यहां की नेशनल टीम में भी कई खिलाड़ी इन्हीं इलाकों से आते हैं.

जब अफगानिस्तान की टीम ने वर्ल्ड कप 2019 के लिए क्वालिफाई किया, उस दिन आसमान की ओर मुंह करके पूरे अफगानिस्तान में बंदूकों से गोलियां दागी गईं. लोगों ने सड़कों पर आकर जश्न मनाया. जब वर्ल्ड कप में अफगानिस्तान की टीम भी खेल रही है तो क्रिकेट का रोमांच वहां भी हावी है. अमूमन  अफगानिस्तान क्रिकेट टीम मैच खेल रही हो और अच्छा प्रदर्शन कर रही हो तो खुशी में तालिबानी दनादन हवाई फायरिंग शुरू कर देते हैं. "टेलीविजन अफगानिस्तान" ने विशेष तौर पर वर्ल्ड कप के ब्राडकास्ट अधिकार हासिल किए हैं. क्रिकेट मैचों को देखने के लिए अफगानिस्तान में हजारों टीवी सेट खरीदे गए हैं. लोग इसके सामने चिपके रहते हैं.

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पाकिस्तान के शरणार्थी कैंपों में शुरू हुई थी क्रिकेट
इंग्लैंड में जिस स्टेडियम में अफगानिस्तान की टीम खेल रही होती है, वहां हजारों अफगानी अपनी टीम का उत्साह बढ़ाने पहुंचते हैं. मौजूदा अफगान नेशनल टीम में कई क्रिकेटर ऐसे हैं, जिन्होंने अफगानिस्तान के गृहयुद्ध के दिनों में पेरेंट्स के साथ पाकिस्तान में शरणार्थी कैंपों की शरण ली थी. तब वो छोटे थे. जब उन्होंने पाकिस्तानियों को क्रिकेट खेलते देखा तो खुद इस खेल में रंगते चले गए.

अफगानिस्तान के तालिबान नियंत्रित गांवों में धूल के गुबार में क्रिकेट

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लातीनी देशों में फुटबॉल और एशियाई देशों में क्रिकेट
जिस तरह अफ्रीका और लातीनी अमेरिकी देशों में गरीब और मामूली बस्तियों में बच्चे फटे कपड़ों को लपेटकर फुटबॉल खेलते हैं. ठीक उसी तरह एशिया के कई देशों में बच्चे लकड़ी के फट्टे को बैट बनाकर मामूली गेंद के साथ गलियों से लेकर बस्तियों तक क्रिकेट का आनंद लेते हैं. जिस तरह लातीनी और अफ्रीकी देशों के लिए फुटबॉल जिंदगी बदलने का एक जरिया बनता रहा है, कुछ वैसा ही हाल अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत या बांग्लादेश में अब क्रिकेट का है.

वैसे ब्रितानी फौजें जब 19वीं सदी में इस देश को फतह करने पहुंची थी, तब भी अफगानियों को इस खेल का चस्का लगा था लेकिन बाद में वो खत्म होता गया. इसका अगला सुरूर उन्हें लंबे समय बाद क्रिकेट दीवाने पाकिस्तान के शरणार्थी कैंपों में ही चढ़ा.

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तालिबान भी लेने लगा क्रिकेट का आनंद
80 के दशक में ताज मलूक खान ने पेशावर के काचा गारी रिफ्यूजी कैंप के बाहर ही अफगान क्रिकेट क्लब बनाया. 90 के दशक में छोटे-छोटे झुंड में जब लोगों की अफगानिस्तान में वापसी हुई तो क्रिकेट भी उनके साथ गया. शुरुआत में तालिबान ने सारे खेलों पर बैन लगाया हुआ था. क्योंकि वे मानते थे कि सारे खेल लोगों को नमाज से दूर करते हैं. बाद में तालिबान क्रिकेट को लेकर सॉफ्ट होता गया. फिर वो समय भी आया जब तालिबानी खुद कुछ देर के लिए अपनी क्लाशनिकोव गनों को किनारे रखकर क्रिकेट का आनंद लेने लगे.

तालिबानी कमांडर भी क्लाशनिकोव किनारे रखकर इस खेल का आनंद लेने में नहीं चूकते


तब तालिबानियों ने भी जश्न मनाया था
इसी का नतीजा था कि उन्होंने क्रिकेट को अपनी प्रतिबंधित सूची से अलग कर दिया. इससे ये खेल देश में जगह-जगह खेला जाने लगा. अफगानिस्तान क्रिकेट एसोसिएशन की स्थापना हो गई. बताया जाता है कि एक साल पहले जब अफगानिस्तान को आईसीसी ने टेस्ट स्तर का दर्जा दिया तो खुश होने वालों में तालिबानी भी बड़ी संख्या में थे.

क्रिकेट मैचों को निशाना नहीं बनाते
द इकोनॉमिस्ट की एक रिपोर्ट कहती है कि तालिबान ने आज तक कभी क्रिकेट मैचों को अपना निशाना नहीं बनाया है. वे कभी कहीं भी क्रिकेट खेलने वालों के बीच कोई हिंसा नहीं करते. उनकी तरफ से अपने साथियों को एक मौन संदेश है कि क्रिकेट के मैचों को शांति से होने दो. बहुत पहले इक्का दुक्का मौकों पर तालिबान के इस्लामिक स्टेट से जुड़े कट्टरपंथियों ने क्रिकेट मैच को निशाना बनाया था लेकिन हाल के दो दशकों में कुछ नहीं हुआ.

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तालिबानी गांवों में खूब खेली जाती है क्रिकेट
कुछ महीने पहले जारी रायटर की एक रिपोर्ट कहती है कि केवल यही एक ऐसा खेल है, जिसका तालिबान के कमांडर भी पूरा आनंद लेते हैं. तालिबान नियंत्रित गांवों में क्रिकेट मैचों के दौरान सैकड़ों दर्शकों की भीड़ इकट्ठा हो जाती है. इस दौरान कभी कोई झगड़ा नहीं होता. ये लोग अपनी नेशनल क्रिकेट टीम के फैन हैं.

अफगानिस्तान के दूरदराज के गांवों और इलाकों तक क्रिकेट का ये आनंद देखा जा सकता है


रायटर से बातचीत में नांगरहार के खोगयानी जिले में तालिबान कमांडर मुल्ला बदरुद्दीन ने कहा, ''मुझे क्रिकेट से प्यार है. ये इलाका पाकिस्तान से सटा सीमाई इलाका है, जहां पिछले जाड़े में तालिबान लड़ाकुओं ने एक क्रिकेट टूर्नामेंट आयोजित किया और इसे देखने के लिए भारी भीड़ जुटी." बदरुद्दीन ने ये भी कहा, ''जब अफगानिस्तान का मुकाबला दूसरी टीम से होता है तो हम उसे रेडियो पर सुनते हैं या टीवी पर देखते हैं. हम सोशल मीडिया पर भी स्कोर चेक करते रहते हैं.''

अफगानिस्तान में खुलने लगी हैं क्रिकेट अकादमी
अब तो जब से अफगानिस्तान में हालात सुधरे हैं, जगह-जगह क्रिकेट अकादमियां खुलने लगी हैं. बच्चे गांवों और शहरों में क्रिकेट खेलते हुए दिख जाते हैं. हालांकि अफगानिस्तान के मौजूदा हालात विदेशी टीमों को वहां जाने की इजाजत नहीं देते, ऐसी स्थिति में अफगानिस्तान की टीम ने भारत में देहरादून में अपना बेस बनाया हुआ है. उसने विदेशी टीमों के साथ भारत में कुछ मैच भी खेले हैं.

हर बच्चा राशिद बनकर बदलना चाहता है जिंदगी
अफगानिस्तान के ज्यादातर खिलाड़ी बहुत कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं लेकिन उनमें से ज्यादातर अब आईपीएल, बांग्लादेश प्रीमियर लीग, पाकिस्तान लीग में खेलते हैं और अच्छा खासा धन कमाते हैं. स्पिनर राशिद खान या बिग हिटर मोहम्मद नबी वहां के स्टार बन गए हैं. हर अफगान बच्चा उनकी तरह बनकर अपनी जिंदगी बदलना चाहता है.

अक्सर जब अफगानिस्तान क्रिकेट टीम अच्छा खेलती है तो उनके तालिबान प्रशंसक मोबाइल या सोशल साइट्स पर बधाई संदेश भी भेजते हैं.


तालिबानी मोबाइल पर भेजते हैं बधाई 
अफगानिस्तान नेशनल क्रिकेट टीम के साथ खेल चुके सादिक ने रायटर को बताया था कि तालिबानी अक्सर उन्हें मोबाइल या सोशल मीडिया के जरिये बधाई संदेश भी भेजते रहते हैं. हालांकि कुछ लोग ये भी कहते हैं कि अफगानिस्तान में क्रिकेट पश्तूनों का खेल है, जो जातीय तौर पर अफगानिस्तान के दक्षिणी और पूर्वी इलाकों पर मजबूत पकड़ रखता है.

होर्डिंग्स में छाए रहते हैं अफगान क्रिकेटर
लेकिन ये बात सही है कि अफगानिस्तान की क्रिकेट टीम अपने देश में काफी लोकप्रिय हो चुकी है. सड़कों से लेकर अखबारों तक विज्ञापनों में क्रिकेटर छाए दिखते हैं. जब एक बार अफगान क्रिकेट टीम की जीत के बाद काबुल में खास तरीके से जश्न मनाया जा रहा था तो यूरोपीय दूतावास के स्टाफ को लगा कि कंपाउंड पर हमला होने वाला है.

इस साल जब भारत में आईपीएल चल रहा था तो अफगानिस्तान में लाखों लोग टीवी स्क्रीन से चिपके दिखते थे. खासकर वे सनराइजर्स हैदराबाद के मैच जरूर देखते थे, क्योंकि उस टीम से अफगानिस्तान के दो खिलाड़ी मोहम्मद नबी और राशिद खान खेल रहे थे. जब भी सनराइजर्स अपना मैच खेलती थी, लोग रात में देर अपने घरों पर उसका मैच देखते रहते थे.

उसी तरह जब वर्ल्ड कप शुरू होने वाला था, उससे पहले इस देश में टीवी सेट्स की बिक्री बढ़ गई. वहां खासतौर पर टेलीविजन वो सारे मैच दिखा रहा है, जिसमें अफगानिस्तान की टीम खेल रही है.

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First published: June 5, 2019, 10:57 PM IST
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