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आपातकाल के 44 साल - पार्ट 3 : शोले के ठाकुर ने गब्बर को ज़िंदा क्यों छोड़ा था?

News18Hindi
Updated: June 25, 2019, 1:59 PM IST
आपातकाल के 44 साल - पार्ट 3 : शोले के ठाकुर ने गब्बर को ज़िंदा क्यों छोड़ा था?
न्यूज़18 क्रिएटिव.

इंदिरा गांधी सरकार ने 25 जून 1975 की आधी रात देश में इमरजेंसी लागू करवा दी थी, जो 1977 तक प्रभावी रही. इमरजेंसी के कारणों, नेताओं की भूमिकाओं, ज़रूरी घटनाक्रमों और इमरजेंसी के असर से जुड़ी 44 कहानियों की अंतिम किश्त पढ़ें.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत भाजपा के कई वर्तमान नेता और देश के कई लेखक, कलाकार, विद्वान व चिंतक समय समय पर कह चुके हैं कि आज़ाद हिंदोस्तान के इतिहास में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण समय 1975 से 77 के बीच का था, जब देश ने इमरजेंसी के हालात देखे. आवाज़ों पर प्रतिबंध, बेतहाशा गिरफ्तारियां, जो खिलाफ बोला उसका दमन, सरकार की मनमानियां, 'जो चाहो, करो' जैसी नीतियां... और क्या क्या था, जिसकी वजह से इमरजेंसी को हमेशा इतना दुर्भाग्यपूर्ण या लोकतंत्र का हत्यारा या लोकतंत्र का कलंक कहा गया?

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1975 में लगी इमरजेंसी 1977 में खत्म हुई और चुनाव हुए. जनता पार्टी की सरकार बनी, लेकिन चूंकि विपक्ष बुरी तरह कमज़ोर था इसलिए ये सरकार जैसे तैसे ढाई तीन साल चली और फिर 1980 में 'मज़बूत सरकार' के वादे पर कांग्रेस सरकार सत्ता में आई. इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री बनीं और इमरजेंसी को लेकर इंदिरा गांधी या उनकी सरकार के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकी.

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इमरजेंसी के 44 साल होने के मौके पर यहां पढ़िए, 44 ज़रूरी और दिलचस्प कहानियों के अंतिम भाग में 15 कहानियां.

फिल्मों और कला जगत पर असर
1. कांग्रेस की बॉम्बे रैली में मशहूर गायक किशोर कुमार ने परफॉर्म करने से मना कर दिया था इसलिए संजय गांधी उनसे नाराज़ थे. संजय के निर्देश पर ही सरकार ने किशोर के गानों और कलात्मक कामों को रेडियो, दूरदर्शन पर बैन करवाया था.पढ़ें : किशोर कुमार की आवाज़ पर बैन के पीछे संजय गांधी का क्या रोल था?

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फिल्म आंधी को पोस्टर.


2. कांग्रेस की विरोधी पार्टी के सांसद अमृत नाहटा ने सरकार पर कटाक्ष करती हुई फिल्म बनाई थी किस्सा कुर्सी का, जिसे सरकार ने बैन करवा दिया था. गुलज़ार निर्देशित फिल्म आंधी को भी उस वक्त बैन कर दिया गया था.
3. सलमान रुश्दी लिखित उपन्यास मिडनाइट्स चिल्ड्रन पर बनी फिल्म के भारत में प्रदर्शन पर 2012 में बैन लगाया गया. यह फिल्म इमरजेंसी और इंदिरा सरकार की आलोचना करती बताई गई.
4. देव आनंद ने खुलकर इमरजेंसी की आलोचना की थी, इसलिए उनकी फिल्में दूरदर्शन पर बैन की गई थीं. वहीं, 1978 में आईएस जौहर ने फिल्म बनाई थी, नसबंदी. इस फिल्म में इंदिरा सरकार की नीतियों की आलोचना के कारण इसे भी बैन करवा दिया गया था.
5. सलमान रुश्दी की मिडनाइट्स चिल्ड्रन किताब सहित कुछ और किताबों को भी प्रतिबंधित किया गया.

इमरजेंसी ने बदला था शोले का क्लाइमेक्स
6. 1975 में रिलीज़ हुई फिल्म शोले फिल्म का क्लाइमेक्स ये है कि ठाकुर का किरदार गब्बर को मौत के घाट नहीं उतारता बल्कि उसे पुलिस के हवाले कर देता है. लेकिन ये ओरिजनल क्लाइमेक्स नहीं था. ओरिजनल क्लाइमेक्स में गब्बर को ठाकुर के हाथों मारे जाते हुए दिखाया गया था.
7. इमरजेंसी के दौरान सेंसर बोर्ड भी सख्त था और सरकार के निर्देश पर उसने क्लाइमेक्स बदलने को इसलिए कहा था कि ठाकुर एक पूर्व पुलिस अफसर का किरदार था, और अगर वो गब्बर को मार देता तो संदेश जा सकता था कि पुलिस के हाथों में बेहिसाब ताकत आ गई है और पुलिस मनमानी के लिए बेकाबू है इसलिए ये क्लाइमेक्स बदलवाया गया.

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फिल्म शोले के चर्चित दृश्य का स्क्रीनशॉट.


विनोबा और किसने किया था इमरजेंसी का समर्थन?
8. इंदिरा सरकार द्वारा इमरजेंसी की घोषणा के बाद विनोबा भावे ने इस कदम का समर्थन करते हुए इसे 'अनुशासन पर्व' कहा था और लोगों से अपील की थी कि वो संयम बरतें और सरकार के साथ सामंजस्य बनाने में मदद करें.
9. भावे के अलावा कुछ सीपीआई नेताओं, लेखक खुशवंत सिंह, उद्योगपति जेआरडी टाटा और इंदिरा की करीबी उड़ीसा के सीएम नंदिनी सत्पथी ने इमरजेंसी को ठीक कदम बताया था लेकिन बाद में सीपीआई, टाटा और सत्पथी ने अफसोस ज़ाहिर किया कि पहले उन्होंने इस कदम का समर्थन किया.

सिखों के विरोध और गिरफ्तारियां
10. पंजाब के अमृतसर में इंदिरा गांधी सरकार पर तानाशाही के आरोप लगाकर सिखों ने बड़े प्रदर्शन किए. शिरोमणि अकाली दल और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के नेतृत्व में ये विरोध प्रदर्शन हुए, जिन्हें लोकतंत्र बचाने के आंदोलन का नाम दिया गया.
11. एमनेस्टी इंटरनेशनल के आंकड़ों के मुताबिक इमरजेंसी के 20 महीनों के दौरान 1 लाख 40 हज़ार ऐसी गिरफ्तारियां ​हुईं, जिनमें कोई मुकदमा नहीं चला. एक अनुमान है कि इनमें से 40 हज़ार सिख शामिल थे, जिनकी आबादी भारत की आबादी की सिर्फ दो प्रतिशत थी.

केरल में 'नक्सल' दमन के नाम पर!
12. इमरजेंसी के दौरान केरल में नक्सल आंदोलन अपने चरम पर था. ग्रामीण इलाकों में ये कथित नक्सली पुलिस थानों पर हमला किया करते थे. खबरों के मुताबिक पुलिस ने इमरजेंसी के दौरान के इनके खिलाफ जमकर कार्रवाई की और हालात ये बने कि पुलिस किसी के खिलाफ भी कार्रवाई कर उसे नक्सल कहने लगी.
13. नक्सलों से मिले होने का आरोप लगाकर कालीकट के इंजीनियरिंग कॉलेज के एक छात्र राजन को ​पुलिस ने गिरफ्तार किया. इमरजेंसी के दौरान प्रदर्शनकारी छात्रों पर वैसे भी सख्ती बरतने के निर्देश थे. गिरफ्तार राजन को कस्टडी के दौरान इतना प्रताड़ित किया गया कि उसकी मौत हो गई. राजन की लाश कभी नहीं मिली.
14. राजन की मां ने जहां अपना मानसिक संतुलन खोया, वहीं उसके पिता ने इस केस में लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी. राजन के खिलाफ आरोप वापस लिये गए और कुछ पुलिस अफसरों को दोषी भी पाया गया.

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नुक्कड़ नाटक के दौरान सफदर हाशमी.


+ 1 : इमरजेंसी के दौरान जहां छात्र संगठनों की राजनीति को बल मिल रहा था और जेपी के आंदोलन से नीतीश कुमार, लालू प्रसाद, रामविलास पासवान जैसे भविष्य के नेता तैयार हो रहे थे, वहीं लेखक और कलाकार सफदर हाशमी स्ट्रीट थिएटर से युवाओं में जागरूकता फैला रहे थे. चूंकि इमरजेंसी में प्रसारण माध्यमों को नियंत्रित कर लिया गया था इसलिए हाशमी ने सीधे लोगों के बीच जाकर नाटक कला के ज़रिए सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाने का काम किया. उनकी देखा देखी और भी कई कलाकार नुक्कड़ नाटक परंपरा में शामिल हुए.

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First published: June 25, 2019, 1:59 PM IST
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