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सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर में इंटरनेट शटडाउन पर क्यों दिया इतना 'सख्त फैसला'

Vivek Anand | News18Hindi
Updated: January 10, 2020, 2:19 PM IST
सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर में इंटरनेट शटडाउन पर क्यों दिया इतना 'सख्त फैसला'
सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर में इंटरनेट शटडाउन पर महत्वपूर्ण फैसला दिया है

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कहा है कि इंटरनेट (Internet) का इस्तेमाल अभिव्यक्ति की आजादी (Freedom Of Expression) को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है, जो हमें संविधान का अनुच्छेद 19(1) प्रदान करता है. इस पर प्रतिबंध और रोक भी उसी आधार पर लगनी चाहिए..

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  • Last Updated: January 10, 2020, 2:19 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने जम्मू कश्मीर (Jammu Kashmir) में अनुच्छेद 370 (Article 370) के खात्मे के बाद लगी रोक पर सुनवाई करते हुए इंटरनेट शटडाउन (Internet Shutdown) पर बहुत महत्वपूर्ण बातें कही हैं. सर्वोच्च अदालत ने कश्मीर में लगी रोक पर दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए आम जनजीवन को लेकर हो रही परेशानियों पर बात की है, साथ ही अपने फैसले में इंटरनेट शटडाउन को प्रमुखता दी.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इंटरनेट का इस्तेमाल अभिव्यक्ति की आजादी को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है, जो हमें संविधान का अनुच्छेद 19(1) प्रदान करता है. इस पर प्रतिबंध और रोक भी उसी आधार पर लगनी चाहिए, जैसा संविधान में बताया गया है. सुप्रीम कोर्ट एक तरह से इंटरनेट के इस्तेमाल को अभिव्यक्ति की आजादी को प्रदर्शित करने वाले औजार की तरह देखता है. ये इंटरनेट पर सुप्रीम कोर्ट पर बहुत बड़ी रुलिंग है. जिसे बारीकी से समझा जाना चाहिए.

इंटरनेट अनिश्चितकाल के लिए बंद नहीं किया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट के जज एनवी रामना, आर सुभाष रेड्डी और बीआर गवई ने फैसला सुनाया है. जस्टिस रामना ने कहा है कि कोर्ट को कश्मीर में रोक लगाने के राजनीतिक मंसूबे और मकसद से कोई लेना देना नहीं है. रामना ने कहा कि आजादी और सुरक्षा हमेशा एकदूसरे से भिड़े रहते हैं. ये कोर्ट की जिम्मेदारी बनती है कि सभी नागरिकों को उनके अधिकार और सुरक्षा हासिल हो.

कोर्ट ने कहा कि असहमति का मतलब अस्थिरता फैलाना नहीं है. कोर्ट के विचार में राज्य को इंटरनेट को पूरी तरह से शटडाउन करने को आखिरी और असाधारण उपाय की तरह देखना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि इंटरनेट को अनिश्चितकाल के लिए बंद करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. इंटरनेट कुछ वक्त के लिए बंद किया जा सकता है. इस तरह के आदेश की न्यायिक जांच जरूरी है. कोर्ट ने इंटरनेट शटडाउन करने के फैसले को समर्थ प्रशासन द्वारा 7 दिनों के भीतर रिव्यू करने को कहा है.

why the supreme court delivered such a strict decision on internet shutdown in kashmir
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इंटरनेट अनिश्चितकाल के लिए नहीं बंद किया जा सकता
इंटरनेट शटडाउन पर सरकार का तर्क
सरकार की तरफ से बहस करते हुए अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि कोई बेवकूफ सरकार ही होती जो कश्मीर के बिगड़े हालात में बचाव के ऐसे उपाय नहीं करती. सरकार का तर्क था कि इंटरनेट शटडाउन की वजह से ही एंटी इंडिया मैसेज और प्रोपेगेंडा नहीं फैल सका.

इसी वजह से घाटी में इतनी शांति बहाल रह सकी. सरकार ने 2016 का वाकया बताया. जब घाटी में हिजबुल के कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने पर तीन महीने तक इंटरनेट बंद रहा था. सरकार ने बताया कि प्रिवेंटिव मेजर्स की वजह से ही घाटी में एक भी गोली चलाने की नौबत नहीं आई.

इंटरनेट को लेकर अभिव्यक्ति की आजादी की बहस
इंटरनेट को लेकर अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस चलती रही है. ये लंबे वक्त से चली आ रही है. महत्वपूर्ण ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी का हिस्सा माना है. हालांकि सरकार की हर वक्त कोशिश रहती है कि कानून व्यवस्था बिगड़ने के नाम पर वो इस ‘आजादी’ पर थोड़ा अंकुश लगाए रखे.

संविधान का अनुच्छेद 19(1) हमें अपनी बात रखने, अपने विचारों को बोलने, लिखने और प्रदर्शित (विजुअल या ऑडियो) करने का अधिकार देता है. तकनीक के नए दौर में लिखने से बात आगे बढ़ गई है. इंटरनेट पर हम अपने विचार, अपने मुद्दे, अपनी असहमतियां व्यक्त कर रहे हैं. पहले लिखने और बोलने का बड़ा सीमित असर होता था. इसलिए विरोध और असहमतियों का असर भी उतना ही सीमित था. अब इंटरनेट ने इस असर को असीमित कर दिया है.

इंटरनेट पर लिखी बात, विचार या असहमति बड़ी तेजी से फैलती है. एक झटके में करोड़ों लोगों के बीच पहुंचती है. ये कम्यूनिकेशन का सबसे ताकतवर साधन है. लेकिन सवाल है कि क्या कम्यूनिकेशन के सबसे ताकतवर साधन की वजह से इसपर पाबंदियां लगा दी जाएं? कोर्ट ने इसी मुद्दे को साफ और स्पष्ट किया है. सिर्फ संचार के ताकतवर साधन होने की वजह से सरकार उस पर पाबंदी नहीं लगा सकती. सरकार को वाजिब वजह बतानी होगी.

why the supreme court delivered such a strict decision on internet shutdown in kashmir
कश्मीर में अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद से इंटरनेट शटडाउन है


इंटरनेट रेगुलेशन को लेकर सरकार ने बनाए हैं कानून
संविधान का अनुच्छेद 19(1) हमें वाजिव पाबंदियों के साथ अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार देता है. इंटरनेट पर भी वो वाजिब पाबंदी लागू हैं. इस बारे में सरकार ने नए-नए कानून भी बनाए हैं. इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर अक्सर सिविल सोसायटी की सरकार से शिकायत रहती है.

2015 से पहले इंटरनेट पर ऑनलाइन और ऑफलाइन स्पीच को लेकर अलग कानून थे. सरकार इंफॉर्मेशन एक्ट 2000 के प्रावधानों का पालन करती थी. इस एक्ट के सेक्शन 66ए के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति इंटरनेट पर बहुत ज्यादा हिंसक, असुविधाजनक, खतरनाक, और अपमानजनक चीजें शेयर करता है तो उसे तीन साल तक की सजा हो सकती है. इसे सिविल सोसायटी के लोगों ने काला कानून बताया.

आखिर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने सेक्शन 66ए को रद्द कर दिया. कोर्ट ने उस वक्त कहा था सिर्फ समर्थ प्रशासन और कोर्ट ही इंटरनेट से किसी भी तरह के कंटेट को हटाने को कह सकता है. कोर्ट का कहना था कि इंटरनेट होस्टिंग प्लेटफॉर्म अपने स्तर पर कंटेट को फिल्टर करने का काम करें और अश्लील कंटेट को हटाया जाए.

सुप्रीम कोर्ट सेक्शन 66ए को रद्द कर चुकी है लेकिन हैरानी की बात है कि कुछ राज्यों में इसका इस्तेमाल अभी भी हो रहा है. खासकर सोशल मीडिया पर असहमति और विरोध जताने पर इस एक्ट के जरिए कुछ पत्रकारों को निशाना बनाए जाने के उदाहरण हैं.

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इंटरनेट शटडाउन को लेकर सख्त नियम कायदे हैं


इंटरनेट के 'खतरों' से इनकार नहीं किया जा सकता
दंगा या हिंसक विरोध प्रदर्शन में कोई भी अफवाह बड़ी तेजी से फैलती है. अक्सर प्रभावित इलाकों में वॉट्सऐप मैसेज के जरिए अफवाहों तेजी से पैर पसारती हैं और लोग विरोध में सड़क पर उतर जाते हैं. प्रशासन उन अफवाहों को रोकने के लिए इंटरनेट शटडाउन करती है.

संचार के किसी भी माध्यम पर रोक के लिए टेलीकॉम सर्विस (पब्लिक इमरजेंसी या पब्लिक सेफ्टी) नियम, 2017 की मदद ली जाती है. किसी भी तरह के टेलीकम्यूनिकेशन सर्विस (इसमें वॉयस, मोबाइल इंटरनेट, एसएमएस, लैंडलाइन, फिक्स्ड ब्रॉडबैंड आदि सेवाएं भी शामिल हैं) को रोकने के लिए टेलीकॉम सर्विस (पब्लिक इमरजेंसी या पब्लिक सेफ्टी) नियम, 2017 के नियमों का सहारा लिया जाता है. इसके नियम इंडियन टेलीग्राफ एक्ट 1885 से लिए गए हैं. इंडियन टेलीग्राफ एक्ट 1885 के सेक्शन 5(2) में ये प्रावधान है कि देश की एकता और अखंडता का नुकसान होने से रोकने के लिए संचार माध्यमों पर रोक लगाई जा सकती है.

इंटरनेट शटडाउन को लेकर हैं सख्त दिशा-निर्देश
हालांकि हर बार इसी नियम का ही सहारा नहीं लिया जाता है. आजकल धारा 144 के हवाले से संचार के माध्यमों पर रोक लगाई जाती है. धारा 144 के जरिए ही इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगाई जाती है. यूपी में 31 जनवरी तक के लिए धारा 144 लागू है. पिछले दिनों राज्य के कई हिस्सो में हिंसा भड़कने पर धारा 144 के आधार पर ही 21 जिलो में इंटरनेट शटडाउन कर दिया गया. आमतौर पर डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट धारा 144 लागू करने और इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगाने का आदेश जारी करते हैं. केंद्रशासित प्रदेशों में इंटरनेट शटडाउन करने का अधिकार गृहमंत्रालय के पास होता है.

2017 के नियमों के मुताबिक टेलीकम्यूनिकेशन सर्विस को सस्पेंड करने का फैसला भारत सरकार में गृहमंत्रालय के सचिव ले सकते हैं. इसी तरह से राज्यों में गृह विभाग के सचिव इस तरह के फैसले ले सकते हैं. नियमों के मुताबिक अगर योग्य अधिकारी के द्वारा इंटरनेट शटडाउन का फैसला नहीं आता है तो ऐसे हालात में 24 घंटे से ज्यादा वक्त के लिए इंटरनेट सेवा बंद नहीं की जा सकती. साथ ही इंटरनेट सेवा बंद रखने की वाजिब वजह भी लिखित तौर पर रिव्यू कमिटी को सौंपनी होगी.

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First published: January 10, 2020, 2:11 PM IST
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