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अमेरिका में क्यों ज्यादातर लोगों को कोविड वैक्सीन पर भरोसा नहीं

अमेरिका (US) में बहुत से लोग वैक्सीन (Vaccine) लगवाने की जल्दबाजी से परहेज करना पसंद कर रहे हैं.  (फोटो- AP)
अमेरिका (US) में बहुत से लोग वैक्सीन (Vaccine) लगवाने की जल्दबाजी से परहेज करना पसंद कर रहे हैं. (फोटो- AP)

अमेरिका (US) में कोरोना वैक्सीन (Corona Vaccine) लोगों के लिए उपलब्ध होना शुरू हो गई है, लेकिन बहुत सारे लोग अभी वैक्सीन लगवाने से परहेज कर रहे हैं जिसके लिए उनकी अपनी दलील भी है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 13, 2021, 8:15 PM IST
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जब दुनिया में कोविड-19 (Covid-19) महामारी (Pandemic) अपने पैर पसार रही थी और उसकी वैक्सीन (Vaccine) का नामोनिशान नहीं था, तब बचाव ही सुरक्षा का एकमात्र उपाय था. ऐसे में पूरी दुनिया में सोशल डिस्टेंसिंग (Social Distancing) और मास्क (Mask) के उपयोग पर जोर दिया जा रहा था. तब अमेरिका (US) में आम लोग मास्क के प्रति सहज नहीं हो सके थे. शायद अब भी ना हों, लेकिन अब कोरोना वैक्सीन आने पर भी बहुत सारे लोग उसे लगवाने की जल्दी में नहीं हैं.

कितने अमेरिकी नहीं चाहते हैं अभी वैक्सीन
ऐसा नहीं अमेरिका के लोग लापरवाह हैं या हो गए हैं. वे कोविड-19 बीमारी के प्रति सतर्क हैं. यहां तक कि जो कोविड-19 से संक्रमित हो भी चुके हैं उनमें भी बहुत सारे लोग वैक्सीन लगवाने के लिए अभी इंतजार करना पसंद कर रहे हैं. टाइम के मुताबिक प्यू रिसर्च सेंटर के दिसंबर में किए गए सर्वे के मुतबिक 40 प्रतिशत अमेरिकी वैक्सीन फौरन लगवाने के पक्ष में नहीं हैं. इतना ही नहीं गैलप पोल्स का आंकड़ा 37 प्रतिशत है.

यह अविश्वास क्यों
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर लोगों वैक्सीन लगवाना क्यों नहीं चाहते हैं. इसके कई कारण बताए जा रहे हैं.  कुछ लोगों के लिए जहां वैक्सीन न लगना ही सुरक्षित या स्वीकार्य है तो कई लोगों को इसमें षड़यंत्र भी दिखाई देता है. एक वर्ग के द्वारा कोविड-19 वैक्सीन के लिए कई तरह की कॉन्पिरेसी थ्योरी भी गढ़ी जा रही हैं. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसे लोगों की संख्या कम है.



मजबूत तर्क भी हैं
वैक्सीन के प्रति उदासीन लोगों में ज्यादातर के तर्क मजबूत हैं, वे अफवाहों और तथाकथित बेकार के कारणों में तो विश्वास नहीं कर रहे हैं, लेकिन वे वैक्सीन लगवाने के लिए पहली पंक्ति में नहीं आना चाहते हैं. कई लोगों को लगता है कि वे अभी ज्यादा स्वस्थ हैं और वे वैक्सीन के लिए और ज्यादा आंकड़ों का इंतजार कर सकते हैं.

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कई लोगों को लगता है कि वैक्सीन (Corona Vaccine) जल्दबाजी में लाई गई है. (सांकेतिक तस्वीर)


समय लगता है वैक्सीन बनने में
समस्या यह है कि वैक्सीन लगाने की आपात जरूर महसूस करने के खिलाफ होने के पीछे की दलील कमजोर नहीं है. फिलाडेलफिया के एक बाल रोग विशेषज्ञ का कहना है कि उन्हें लगता है कि अपने शरीर में किसी चीज को जाने देने के प्रति संदेह करना तार्किक रूप से गलत नहीं होगा. वहीं कुछ लोगों का तर्क है कि आमतौर पर वैक्सीन विकसित होने में 15 से 20 साल का समय लगता है कि जबकि कोरोना वैक्सीन विकसित एक साल में ही हो गई. ऐसे में लोगों का चिंतित होना स्वाभाविक है.

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कितनी प्रभावी है वैक्सीन
इसके बाद प्रभावोत्पादकता भी का एक सवाल है. अमेरिका द्वारा स्वीकृत फाइजर बायोएनटेक और मोडर्ना का प्रभाव क्रमशः 95 और 100 प्रतिशत है. इसे कई लोग बाजार में पहुंचने की जल्दबाजी मान रहे हैं. प्रतिभागियों को केवल दो से तीन महीने ही फॉलोअप लिया जाना इस पर विश्वास करना जल्दबाजी साबित हो सकता है. ऐसे लोगों का मानना है कि वैक्सीन कितनी प्रभावी होगी यह तय करने में 9 से 12 महीने में कहना संभव नहीं हैं.

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वैक्सीन (Vaccine) की प्रभावोत्पादकता (Efficency) पर भी कई लोगों ने संदेह है.


साइड इफेक्ट का सवाल
इसके अलावा वैक्सीन के साइड इफेक्ट भी हैं हर वैक्सीन में एनाफिलिक्स या गंभीर एलर्जी रिएक्शन के रूप में साइड इफेक्ट होने की संभावना होती है. फिलहाल कोरोना वैक्सीन के मामले में किसी भी तरह के गंभीर साइड इफेक्ट्स या फिर व्यापक हलके साइड इफेक्ट के मामले सामने नहीं आएं हैं. कुछ साइड इफेक्ट जो दिखे हैं वे बहुत ही कम लोगों में दिखे हैं. इसमें सबसे चर्चित बेल्स पाल्सी है जिसमें चेहरे पर हलका पैरालिसिस हो जाता है. इसकी दर हर साल प्रति दस हजार में 8 है. जो अब तक मारे गए लोगों और बीमारी की गंभीरता को देखते हुए बहुत ही ज्यादा कम माना जा रहा है.

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बेशक वैक्सीन लगवाना एक चुनाव है खास तौर पर अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देशों में लेकिन सही जानकारी इस मामले में बहुत नाजुक और अहम हो जाती है. उम्मीद की जा सकती है कि समय के साथ लोगों के भ्रम दूर हो सकेंगे जब और ज्यादा आंकड़े आएंगे. ऐसे में सरकारी जानकारी की विश्वस्नीयता को कायम रखना और अफवाहों और गलत जानकारियों का सही तरह से खारिज करना भी एक बड़ा काम हो जाएगा.
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