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वाराणसी का नाम काशी और बनारस भी क्यों है

वाराणसी का नाम काशी और बनारस भी क्यों है

1956 के बाद बनारस नाम से रेलवे स्टेशन की फिर वापसी हुई है. ये शहर वाराणसी भी है बनारस भी और काशी भी

1956 के बाद बनारस नाम से रेलवे स्टेशन की फिर वापसी हुई है. ये शहर वाराणसी भी है बनारस भी और काशी भी

banaras City Name : वाराणसी (Varanashi) के मंड़वाडीह (Manduadih) स्टेशन का नाम अब आधिकारिक तौर पर बनारस हो गया है. इसके साथ इस शहर के सबसे लोकप्रिय नाम बनारस को एक तरह से सरकारी मान्यता मिल गई है. मुगल और अंग्रेज शासनकाल में ये शहर बनारस के नाम से ही जाना जाता था.

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कई बार ये सवाल उठता था कि जब वाराणसी का लोकप्रिय नाम बनारस है तो इसका आधिकारिक नाम वाराणसी क्यों हो गया. इसका काशी नगरी से क्या रिश्ता है. ये भी बहस होती थी कि दुनियाभर में इस शहर को बनारस के नाम से जानते हैं तो आधिकारिक तौर पर इस नाम पर यहां ना तो स्टेशन है और ना ही कोई चीज. ले-देकर बस यहां के विश्वविद्यालय का नाम जरूर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय जरूर है.

वाराणसी में वाराणसी कैंट और काशी के नाम से दो रेलवे स्टेशन भी हैं लेकिन बनारस के नाम से कोई स्टेशन भी नहीं. लंबे समय से हो रही इस मांग के बाद शहर के मड़वाडीह नाम से बने स्टेशन का नाम अब बनारस कर दिया गया है. इसके साथ बनारस के नाम को एक खास मान्यता भी सरकार ने दे दी है.

हालांकि ये रोचक बात है कि मुगलों और अंग्रेजों के जमाने में जब इस शहर का आधिकारिक नाम बनारस ही था तो ये वाराणसी कैसे हो गया. इसका क्या इतिहास है. वैसे तो इस प्राचीन शहर के कई नाम हैं.

डायना एल सेक की किताब बनारस सिटी ऑफ लाइट कहती है, वाराणसी का सबसे प्राचीन नाम काशी है. ये नाम करीब 3000 बरसों से बोला जा रहा है. तब काशी के बाहरी इलाकों में ईसा से 600 साल पहले बुद्ध पहुंचे. बुद्ध की कहानियों में भी काशी नगरी का जिक्र आता रहा है. दरअसल काशी का नाम एक प्राचीन राजा काशा के नाम पर पड़ा, जिनके साम्राज्य में बाद में प्रसिद्ध और प्रतापी राजा दिवोदासा हुए. ये भी कहा जाता है कि पहले लंबी ऐसी घास होती थी, जिसके फूल सुनहरे के होते थे. जो नदी के किनारे फैले हुए जंगलों में बहुतायत में थी.

सिटी ऑफ लाइट यानि काशी
काशी को कई बार काशिका भी कहा गया. मतलब चमकता हुआ. ये माना गया कि भगवान शिव की नगरी होने के कारण ये हमेशा चमकती हुई थी. जिसे "कशाते" कहा गया यानि "सिटी ऑफ लाइट". शायद इसीलिए इस नाम काशी हो गया. काशी शब्द का अर्थ उज्वल या दैदिप्यमान.

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इसे सिटी ऑफ लाइट कहा गया है. शिव की नगरी हमेशा उज्जवल रही है दैदिप्यमान.


वाराणसी नाम कैसे आया
वाराणसी भी प्राचीन नाम है. इसका उल्लेख भी बौद्ध जातक कथाओं और हिंदू पुराणों में है. महाभारत में बार बार इसका जिक्र हुआ है. दरअसल इसका पाली भाषा में जो नाम था वो था बनारसी. जो टूटते फूटते बनारस के नए नाम में आया. ये शहर बनारस के नाम से अधिक जाना जाता है. बेशक आधिकारिक तौर पर अब इसका नाम वाराणसी है.

आजादी के बाद नाम वाराणसी हुआ
मुगलों के शासन और फिर अंग्रेजों के शासनकाल में इसका नाम बनारस ही रहा लेकिन आजाद भारत में इसका आधिकारिक नाम हुआ वाराणसी. कोई भी बनारसी यही कहेगा कि चूंकि इस शहर के एक ओर वरुणा नदी है, जो उत्तर में गंगा में मिल जाती है और दूसरी ओर असि नदी. लिहाजा इन नदियों के बीच होने के कारण इसका नाम वाराणसी कहलाया.

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अगर पुराणों की बात करें तो इसमें हमेशा दो नामों का जिक्र हुआ वो है वाराणसी और काशी. हालांकि कहा जाता है वाराणसी को ही पॉली भाषा में बनारसी के नाम से संंबोधित किया गया है.


पुराण क्या कहते हैं
पदमपुराण कहता है, वरुणा और असि दो नदियां हैं. उन्हें भगवान ने बनाया औऱ उसके बीच ये पवित्र भूमि.दुनिया में जिससे बेहतर कोई जगह नहीं है. कुर्मा पुराण में सीधे सीधे लिखा है, वाराणसी वो शहर है जो वरुणा और असि नदियों के बीच है. हालांकि कुछ पुराना साहित्य ये भी कहता है कि वरुणा और असि नहीं बल्कि शहर के उत्तर में किसी जमाने में अकेली नदी बहती थी, जिसका नाम था रणासि , जिसका नाम हो सकता है कि बाद में वरुणा पड़ा हो.
पुरातात्विक दावा है कि राजघाट वो जगह है जहां रणासि नदी का मेल गंगा नदी से हुआ. शायद ये शहर वाराणसी नदी के दोनों ओर ही बसा होगा. ये गंगा के किनारे नहीं फैला होगा.

शासकीय तौर पर कब नाम वाराणसी हुआ
वाराणसी नाम का उल्लेख मत्स्य पुराण, शिव पुराण में भी मिलता है, किन्तु लोकोउच्चारण में यह 'बनारस' नाम से प्रचलित था, जिसे ब्रिटिश काल मे 'बेनारस' कहा जाने लगा. आखिरकार 24 मई 1956 को शासकीय तौर पर इसका नाम फिर वाराणसी कर दिया गया.

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वैसे इस शहर के कई नाम रहे हैं. मुगल और अंग्रेज शासन के दौरान इसे बनारस के आधिकारिक नाम से जाना जाता था.


जिन नामों से ये शहर जाना गया
ये शिव नगरी अलग अलग समय में और अलग लोगों द्वारा अलग नामों से जानी गई. इसके कई नाम हैं. जैसे- काशी, काशिक, बनारस, वाराणसी, वाराणशी, अविमुक्त, आनंदवन, रुद्रवास.

आजादी से पहले था ये बनारस रजवाड़ा
आजादी के पहले जब भारत में करीब 565 देशी रजवाड़े अस्तित्व में थे, उन्हीं में एक था बनारस. बनारस के राजा काशी नरेश या बनारस नरेश या काशी राज कहा जाता था. 15 अगस्त 1947 से पहले ही बनारस के तत्कालीन महाराजा विभूतिनारायण सिंह ने अपनी रियासत के भारत में विलय के पत्र का हस्ताक्षर कर दिए. आजादी के बाद जब उत्तर प्रदेश बना तो इसमें टिहरी गढ़वाल, रामपुर और बनारस रियासत को मिलाया गया.

तब बनारस के जाने माने कांग्रेस नेता श्रीप्रकाश ने बनारस का नाम बदलने की मांग करते हुए इसे इसका प्राचीन नाम देने की बात की. श्रीप्रकाश बाद में असम के राज्यपाल बनाए गए. तब इस बात का जिक्र हुआ कि इस प्राचीन शहर का नाम काशी या वाराणसी होना चाहिए. तब श्रीप्रकाश ने सरदार पटेल और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को इस बारे में कई पत्र लिखे.

संपूर्णानंद ने वाराणसी नाम पर मुहर लगाई
असल में जब इस शहर का नाम 24 मई 1956 को बदला गया तो उसमें मुख्य भूमिका संपूर्णानंद की थी. वो तब तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुके थे. उनका खुद का रिश्ता बनारस से था. संस्कृत के विद्वान इस नेता ने बनारस की जगह ज्यादा संस्कृतनिष्ठ नाम वाराणसी का चयन किया.

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Tags: Banaras, Kashi, Kashi Vishwanath, Modi, Varanasi news

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