क्या कोरोना महामारी बनेगी करोड़ों भारतीयों की भूख की वजह​?

न्यूज़18 इलस्ट्रेशन
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भारत में कोरोना वायरस के कन्फर्म मामले 11 लाख के आंकड़े के करीब पहुंच रहे हैं. ये भी आप जानते हैं कि इस महामारी के समय में इम्युनिटी कितनी ज़रूरी है. अब सोचिए कि देश में उन करोड़ों लोगों के सामने कितना बड़ा खतरा है जिन्हें दो वक्त की रोटी तक मयस्सर नहीं. क्या महामारी और भूख एक दूसरे के पूरक बन रहे हैं?

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कुपोषण को लेकर पिछले कुछ सालों में भारत की स्थिति सुधरी ज़रूर है, लेकिन दुनिया में सबसे ज़्यादा कुपोषित बच्चों वाला देश भारत ही है. इस साल Covid-19 के चलते हाल में इस दिशा में हुए सुधारों को बड़ा झटका लगा. जैसा कि संयुक्त राष्ट्र प्रमुख (United Nations) ने भी कहा कि यह हमारे जीवन में सबसे बड़ा मानव और आर्थिक संकट (Human Crisis) है. क्या इसका नतीजा ये होने वाला है कि भारत में भूख और कुपोषण (Hunger & Malnutrition) का संकट बहुत बड़ा होगा?

दीर्घकालिक विकास लक्ष्य (SDG) का 2020 का प्रोग्रेस कार्ड कहता है कि भूख, अंतर्राष्ट्रीय असमानता और क्लाइमेट चेंज की रफ्तार बढ़ी है. वर्ल्ड फूड प्रोग्राम का अनुमान है कि कोरोना वायरस महामारी को 2020 के आखिर तक भूख की बड़ी वजह माना जाएगा. पिछड़ी और संवेदनशील आबादी तक खाद्य वितरण और सुरक्षा का सवाल बहुत बड़ा हो गया है. जानिए कितनी भयानक हो सकती है तस्वीर.

भारत के आंकड़े सबसे खराब
SDG इंडेक्स 2019-20 में साफ दिखता है कि 2030 तक भूख को खत्म करने के लक्ष्य की दिशा में भारत का प्रदर्शन बेहद खराब रहा है. SDG2 के कंपोज़िट स्कोर के मामले में भारत सभी SDG में सबसे पिछड़ा देश दिखा. इसका मतलब ये है कि भारत में भूख से लड़ने के लिए सशक्त नीतियों की ज़रूरत है. ग्लोबल पैनल 2020 की रिपोर्ट भी कहती है कि महामारी के सेहत पर असर से लोगों को बचाने के लिए सरकारों को पोषण सुनिश्चित करना ही होगा.
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पूर्वी भारत में भूख और कुपोषण को लेकर हालात सबसे ज़्यादा चिंताजनक हैं.


राज्यवार कितना बदहाल है देश?
SDG के ही रिपोर्ट कार्ड में भारत की राज्यवार स्थिति बताई गई है. SDG2 के स्कोर के मुताबिक ओडिशा, बिहार और झारखंड पोषण के मामले में सबसे ज़्यादा पिछड़े राज्य हैं. जबकि पश्चिम बंगाल में भी हालात चिंताजनक हैं.

क्या कहती है इस साल की अहम रिपोर्ट्स?
हंगर रिपोर्ट 2020 के मुताबिक साल 2015 से दुनिया में भूख की दर लगातार बढ़ी है और इसका एक बड़ा कारण क्लाइमेट चेंज रहा है. चूंकि एक बड़ी आबादी भूख और कुपोषण से ग्रस्त है इसलिए स्वास्थ्य संकट बड़ा हो जाता है. कोविड 19 के दौर में कमज़ोर इम्युनिटी, प्रवासी और गंभीर बीमारी वाले लोग संवेदनशील हो जाते हैं. इसी साल की ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट कहती है :

खाद्य व्यवस्था को न्यायसंगत, लचीला और लंबे समय के लिए कारगर करने का ढांचा बनाना ज़रूरी है. साथ ही, विशेषकर प्रभावित और वंचित आबादी के​ लिए पोषण पर निवेश करना ही होगा.


'भारत में क्लाइमेट चेंज के आंकलन' पर आधारित ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक क्लाइमेट चेंज की वजह से बाढ़ और तूफान के खतरों के चलते खाद्य सुरक्षा और लोक स्वास्थ्य का संकट बढ़ा. वहीं, वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम का अनुमान है कि 2050 तक खाद्यान्न की मांग 60 फीसदी तक बढ़ेगी और खाद्य सुरक्षा का संकट विकराल होगा.

रही सही कसर के लिए ज़िम्मेदार रहे तूफान
भारत में इस साल जहां कोरोना वायरस का कहर टूटा, वहीं पश्चिम बंगाल व ओडिशा में अम्फान और महाराष्ट्र में निसर्ग नाम के तूफानों ने तबाही मचाई. इससे कई लोग बेघर हुए, मौतें हुईं और जीवन यापन का संकट खड़ा हुआ. इन तूफानों के कारण बड़ी आबादी, खास तौर से बच्चे भूख और कुपोषण के शिकंजे में फंस गए.

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यूएन की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 20 करोड़ लोग भूख और कुपोषण के शिकार हैं.


अन्य कारणों की बात करें तो लॉकडाउन और ट्रांसपोर्ट पर लगे प्रतिबंधों के कारण भी इन संवेदनशील लोगों को काफी दिक्कतें हुईं. कोरोना वायरस के कारण तेज़ी से बेरोज़गारी बढ़ी, जिसके कारण भी भूख का संकट और गंभीर हो गया.

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योजनाएं तो हैं, लेकिन अधर में
इस साल पेश किए गए केंद्रीय बजट में पोषण संबंधी कार्यक्रमों के लिए 35600 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया. वहीं, ओडिशा ने उदाहरण कायम किया और वह पोषण के मामले में अलग से बजट तैयार करने वाला पहला राज्य बन गया. लेकिन, दूसरी तरफ, कोविड 19 और लॉकडाउन के चलते कई कार्यक्रम अधर में लटक गए और ज़रूरतमंदों तक मदद पहुंची ही नहीं.

कुल मिलाकर, एक महामारी के कारण पोषण का मुद्दा देश की व्यवस्था और विचार के केंद्र में होने की मांग करता है. इस समय की मांग ​है कि ज़रूरतमंदों को मुफ्त भोजन, प्रवासियों के लिए रोज़गार और अर्थव्यवस्था के लिए मज़बूती के कदम उठाए जाएं. वंचित समुदायों के हित के लिए बनी योजनाओं को भी अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने में तेज़ी लानी होगी.

ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के लिए हेल्थ इनिशिएटिव की सीनियर फेलो डॉ. शोभा सूरी के लेख पर आधारित रिपोर्ट.
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