राज्यसभा में एक दशक पहले महिला आरक्षण विधेयक हुआ पारित, लोकसभा में अटका

साल 2010 में महिला आरक्षण विधेयक संसद की राज्यसभा में पारित हुआ था- सांकेतिक फोटो

साल 2010 में महिला आरक्षण विधेयक संसद की राज्यसभा में पारित हुआ था- सांकेतिक फोटो

साल 1996 में देवगौड़ा सरकार ने पहली बार महिला आरक्षण को विधेयक के तौर पर पेश किया (women's reservation bill in Indian parliament) था. तब संसद में भारी तूफान मचा और यहां तक कि गुत्थमगुत्था होने की नौबत आ गई थी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 10, 2021, 2:32 PM IST
  • Share this:
आज ही के दिन साल 2010 में महिला आरक्षण विधेयक संसद की राज्यसभा में पारित हुआ था. इसके साथ ही ऐसा लगा कि भारत की राजनीति में महिलाओं के प्रवेश का रास्ता आसान होने जा रहा है लेकिन ऐसा हुआ नहीं. ये विधेयक राज्यसभा से पारित होने के बाद भी तब से लोकसभा में लंबित पड़ा है. हालांकि पंचायतों में जरूर महिलाओं को 33 फीसदी रिजर्वेशन मिल चुका है.

देश में एक बार फिर विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. इस बीच कई मुद्दों पर बात हो रही है, जिनमें महिला सुरक्षा जैसी बातें सदाबहार हैं. हालांकि महिलाओं को राजनीति में आरक्षण के मुद्दे पर कोई बात नहीं हो रही है. बीच में कभी इसपर चर्चा हुई भी तो तुरंत दबा दी जाती है.

असल में राजनीति में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण की चर्चा यूं ही नहीं हुई, बल्कि इसके पीछे लंबी कहानी है. आमतौर पर चुनावों में महिला समानता की बात तो होती है लेकिन महिला उम्मीदवारों को टिकट देने के नाम पर पार्टियां पीछे हट जाती हैं. ऐसे कई कारणों से मुख्यधारा की राजनीति में महिलाएं काफी कम हैं. इसका सीधा असर महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर होता है और ऐसे मुद्दे अक्सर पीछे रह जाते हैं.

women's reservation bill in indian parliament
महिला उम्मीदवारों को टिकट देने के नाम पर अधिकतर पार्टियां पीछे हट जाती हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)

यही सब देखते हुए राजनीति में महिलाओं के प्रवेश को बढ़ाने के लिए टिकट देने के लिए आरक्षण की बात हुई. पहली बार साल 1974 में संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठा और सीटों के आरक्षण की बात चली. 1993 में संविधान में 73वें और 74वें संशोधन के तहत महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें रिजर्व तो हुईं लेकिन ये केवल पंचायतों और नगरपालिकाओं तक सीमित रहा.

Youtube Video


ये भी पढ़ें: बेहद कड़े हैं ब्रिटिश राजपरिवार के कायदे, शाही सदस्यों को वोट देने का नहीं है हक 



तीन सालों बाद महिला आरक्षण को विधेयक के तौर पर पहली बार संसद में पेश किया गया लेकिन तब देवगौड़ा सरकार अल्पमत में थी. सरकार गिरी और लोकसभा को भंग कर दिया गया, जिससे मामला ठंडे बस्ते में चला गया. वैसे इस सरकार के विधेयक पेश करने पर जेडीयू अध्यक्ष रहे शरद यादव ने इसका विरोध किया था. यहां तक कि बात मारपीट तक चली गई थी.

ये भी पढ़ें: क्यों सफेद साड़ी और रबर की चप्पल में दिखती हैं पश्चिम बंगाल की CM ममता बनर्जी  

साल 1998 में ये विधेयक दोबारा तत्कालीन वायपेयी सरकार के दौर में आया लेकिन भारी विरोध के बीच ये लैप्स हो गया. ऐसा लगातार होता रहा. साल 2010 में महिला आरक्षण विधेयक पहली बार राज्यसभा में पास तो हो गया लेकिन लोकसभा में अटक गया. तब से इसकी स्थिति यही बनी हुई है.

women's reservation bill in indian parliament
देश में महिला आरक्षण के रास्ते में कई रोड़े हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)


वैसे बता दें कि भारतीय राजनीति में महिलाओं के लिए आरक्षण वाकई एक गंभीर मुद्दा है. इसकी वजह है सक्रिय राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व केवल 11.8 फीसदी होना. जबकि देश की आधी आबादी के हिसाब से प्रतिनिधित्व भी ज्यादा नहीं तो कम से कम 33 फीसदी तो हो. यही सब देखते हुए आरक्षण पर बात होती रही लेकिन कई राजनैतिक पार्टियां इसके विरोध में रहीं.

ये भी पढ़ें: भारत किन देशों से सबसे ज्यादा क्रूड ऑयल खरीदता है?  

देश में महिला आरक्षण के रास्ते में कई रोड़े हैं, जिनमें से एक पुरुष मानसिकता है. विधेयक का विरोध करने वाले नेता हालांकि सीधे-सीधे ऐसा नहीं कहते हैं लेकिन वे विधेयक में खामियां बताते हुए इसका लागू होना टाल रहे हैं. विरोधियों का कहना है कि दलित और ओबीसी महिलाओं के लिये अलग कोटा होना चाहिए. इसके अलावा वे यह तर्क भी देते हैं कि आरक्षण से केवल शहरी महिलाओं को फायदा होगा. हालांकि मजे की बात ये है कि अब तक शहरी महिलाओं को भी टिकट देने में राजनैतिक पार्टियां कन्नी काटती रही हैं, ऐसे में विरोधियों का कोई भी तर्क गले नहीं उतरता है.

ये भी पढ़ें: Explained: कोरोना वैक्सीन का गर्भपात से क्या संबंध है?  

भारत से तुलना करें तो पड़ोसी देश बांग्लादेश में भी महिलाओं की सक्रिय राजनीति में भागीदारी के लिए आरक्षण की व्यवस्था चल रही है. जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों को लें तो यहां राजनीति में लगभग 40 प्रतिशत महिलाएं हैं. वहीं बेल्जियम, मैक्सिको जैसे देशों में ये भागीदारी लगभग 50 प्रतिशत है. फ्रांस में स्थानीय निकायों से लेकर मुख्य राजनीति में भी महिलाएं काफी एक्टिव हैं. हाल ही में ऐसा हुआ था कि पेरिस की लोकल बॉडी में महिलाओं का प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा हो गया था, जिसपर एतराज उठा था.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज